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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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(८३२)

कवीरपंथी-

भागसे आतम चीन्हा ॥ बडे भागसे आतम जागे । कहें कवीर
जबही भरम भागे ॥

शब्द १८५-साधू यो संसारमें, कमला जल माही ॥ सदा
सर्वदा संग रहहे, जल परसत नाहिं ॥ टे० ॥ जुगत जान जलकूकरी,
जल मध्य रहाई । पानी पंख न लागई, कछु कसरत पाई ॥
मीन तेर जल ऊपरे, कछु लगत न भारा । आड अटक माने
नहीं, पैरे जल सारा ॥ जुगत जमूरा पाइया, सरपे लपटाई ।
वाको बिष व्यापे नहीं, गुरुगम्य बताई ॥ स्वीर खांड घृत भोजना,
करसो लपटाई । जिभ्याको लागे नहीं, वाका चिकनाई ॥ भगल
कला नट खेलेई, घर न्यारा न्यारा । खंड बिहंडल होरहे, ज्योंका
त्यों सारा ॥ जैसे सीष समुद्रमें, चित धरत अकाशा । ऐसे पपीहा
स्वातीको, नित प्यासा प्यासा ॥ कुंज ग्रह का संचरे, वाका को
रखवारा । भौमें गलते राखिया, ऐसे गुरु हमारा ॥ बंबीमें बिषधार
बसे, कोई पकर न पावे । कहें कवीर गुरु मंत्रसो, सहजे चलि आवे ॥

शब्द १८६-वा घरमें तुम घर करो, घर बहुर न होई ॥ कोट
कल्प जुग बीतिया, बिनसे नहीं कोई ॥ टे० ॥ सैतन नीव गहरी
दई, दे विवेकको गारा । सारशब्द ईंटे दई, गुरु राज हमारा ॥
भक्ति महल ऊंचे बने, धीरज घर पाटे । सत सुकित छहियां करो,
पावे सिरके साटे ॥ प्रेम संदला गारके, गच प्रीतिसों डारे ।
शील दुलीचा डारके, साधुन बैठारे ॥ दया क्षमा चौकी करो,
राखो घर बारा । कहे कवीर सतगुरु मिले, तब होय उबारा ॥

शब्द १८७-गुरुजी समुझ पकड़ियो बाँहीं ॥ जो बालक झुन-
झुनियां खेले, सो बालक हम नहीं ॥ टे० ॥ हमतो लेहीं सत्तका
सौदा, परपंच पूजत नहीं । चौदासो चेला तुम जो कीन्हे, ले
धरिहो केहि ठाहीं ॥ जियत ठिकानो सर्बहि बतावे, सुए ठिकानो