कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
शब्द १९०—चलोरी वहि देशवा जहाँ बरषत रंग अपार ।
वहि देशकी औघट घाटी, बिरले पावे पार ॥ टे० ॥ सतगुरु सिंधु
नाम पहिचानो, तन मन धन सब वार ॥ वहि देशमें नौबत बाजे,
तत मत झीनो तार ॥ सरवन सुनत कटे जम बाधा, साध सबद
अधार ॥ वहि देशमें जगमग जगमग, वहि शोभा उजियार ॥
तहवां हंस करे कौतूहल, पुरुषको रूप निहार ॥ एक हंसकी
बरनो शोभा, षोडस रवि छिटकार ॥ भोजन सुधा पुहुषकी सज्या,
आनंद अखंड अपार ॥ उबरे नाम पायते जगते, भगते होय
नियार ॥ कहें कवीर सुनो भाई साधो, आवागमन निवार ॥
शब्द १९१—यो मन ऐसा नीच संचाती ॥ डोलत फिरत नीच
नीचनमें, आठ पहर दिन राती ॥ टे० ॥ बिषकी बात लगत अति
शीतल, हरि चरचा लग ताती । शुभ करमनको भगे पीठ दे,
कुकरमन रोपे छाती ॥ वे जीव जाय परत नरकमें, मन सुख बांधे
गाती । कहें कवीर सुनो भाइ साधू, जाको जोन सजाती ॥
शब्द १९२—भले आये सतगुरु मैं बलि जाय । आतम अंध
जगायो आय ॥ टे० ॥ अंधरी आतमके भरम भगाय । लख
चौरासीकी बंद छुडाय ॥ अंधरी आतम जब उतरे पार । कोट
करम फंदा भरमजार ॥ पूरन सतगुरु प्रगटे आय । नौ लख तारे
गये छिपाय ॥ पूरे गुरुनकी पूरी कला । और कला दीसे ना भला ॥
और कला त्रिगुनकी ओट । सतगुरु कला परम संतोष ॥ येही
कला मन राखो थीर । जनम जनमकी मेटो पीर ॥ दस मास
जननीको मारो बोझ । भगति बिना भये बनके रोझ ॥ साहब
कवीर गुरु जीत लियो सार । पाये हम सतगुरु दीनदयाल ॥
शब्द १९३—माई मैं जनम जनम अहिवाती ॥ टे० ॥ अब हम
रांड होवें ना कबहुँ, वर पायौ अविनाशी ॥ तुलसीकी माला