कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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समै-चिउँटी जहाँ न चढि सके, राई ना ठहराय ।
आवागमनकी गम नहीं, तहाँ सकल जग जाय ॥
रमैनी २००-वहाँकी कोई कहे न बाता । सुन्न नगर की जो
कुसलाता ॥ पुरुष साथ जरे जो जोई । वहाँकी बात कहे न कोई ॥
निरगुनमें जो जीव समाया । तेहि की खबर न कोई लाया ॥
समै-स्वाद ना पाये कंदका, सब कोइ करे बखान । मीठा मीठा
जग कहे, मीठेमें भइ हानि ॥ बात पराई को कहे, परदा लखे न
कोय । सहना छिपा पयारमें, को कह बैरी होय ॥
रमैनी २०१-प्रेम प्रीति सुनत जग आया । सरगुन छोड़ निरगुन
गुन लाया ॥ निरगुन पदमें बैठा जाई । निरगुन रहा सुन्न ठहराई ॥
निरगुनका गुन लखे न कोई । प्रेम लगाय पुरुष औ जोई ॥ प्रेम
प्रेम सकल जग बंधा । प्रेमका गुन कछु लखे न अंधा ॥ प्रेम प्रेम
मुवा सब कोई । प्रेम बूझ प्रीतम है सोई ॥
समै-साध बसें हरि भीतरे, हरि बस साधन मांझ ।
कहे कवीर देश वह ऐसा, जहां भोर नहि सांझ ॥
रमैनी २०२-सब पंडित मिल कहे विचारी । केकर बाप काकी
महतारी ॥ हमना कोइके कोइ न हमारा । उड़ जैहै जब बोलन-
हारा ॥ सुन्न नगरका पवन यह भाई । सुन्न नगरमें जाय समाई ॥
संग साथ नहि कोई आया । बीचहिं माया बीच मिलाया ॥
यह कह गुरुवा जग भरमावे । सहर छुटाय सुन्न ले जावे ॥
समै-वहाँ की आसा लाय ना, झूठी यहां की आस ।
यह तज घर बन मांडिया, जुग जुग फिरे निरास ॥
रमैनी २०३-एक दिवस वो एके राती । सात रैन दिन कहो
केहि भांती ॥ एक पुरुष वो एके जोई । दो संजोग जगत सब
होई ॥ एके प्रान वो एके काया । बहुत जीव घर कहां ते आया ॥
एक ऊखकी एक मिठाई । अनेक नाम कैसे घर भाई ॥