कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
समै--नीवके बिचले सब घर बिचला, अब कछु नहीं बसाय ।
कहै कवीर जो कोइ समझे, तेहिको काल न खाय ॥
रमैनी २०४--कहो पंडित तुम निगम बिचारी । काहे ते पुरुष
काहे ते नारी ॥ कहाँ ते पुरुष कहाँ ते राती । काहे ते जात काहे ते
पाती ॥ कहाँ ते गुरु कहाँ ते चेला । काहे ते बृच्छ काहे ते भेला ॥
काहे ते हिंदू तुर्क कहाये । काहे ते नरक सरग बतलाये ॥ कहो
पंडित अनेक व्योहारा । सत् मितमें है संसारा ॥
समै--एके यह तन जीउरा, एक बृच्छ एक बेल ।
कहै कवीर एक जो समझे, एक अनंत अकेल ॥
रमैनी २०५--अचरज एक सुनो तुम भाई । बिंद चोराइ स्व-
पचका लाई ॥ उठी बेल फल तामे लागा । माय बहिन सब
गावें रागा ॥ छठी भरी तहें बाजन बाजे । बंदनवार मंडलमें छाजे ॥
पर लडका मरम काहु न पाया । तैंतिस कोट देवतन खाया ॥
जेहिका सुत तेहि राख दुराई । पर पुत्र पर तात खिलाई ॥
समै- पेडे मूल बिगाडिया, सुत आगे भरमाय । कहै कवीर
जेहिका सब कीना, तेहिका कछु न बसाय ॥ आद भई अब नाही,
पराबीजपर खेत । कहै कवीर समझे नहिं कोई, विरथा जीव मृग देत ॥
रमैनी २०६--भरत भूत एक खेले भाई । ऐसा भूत लखा न जाई ॥
दिवस एक भूत लपटाना । दूसर होयके पिंड समाना ॥ नावत
भौहा करे दवाई । भर्म भया पै भरम न जाई ॥ नित उठ पीर
वो देव मनावें । आप भरम आप थित लावें ॥ जहांते भरम
उठा यह भाई । तहां भरम वह जाय समाई ॥
समै--मथुरा नगर भरम एक प्रानी, कविराके उपदेश ।
कहै कवीर वहां कोइ नहीं, झूठा बहुत संदेश ॥