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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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(६०६)

कवीरपंथी-

ढाढस तजे, लखे सो अविगत भेव ॥ जेहि करता तिन दीन ढाढस,
ढाढस वहाँ न होय । अंग विहूना जो रहे, अहंकार करे सोय ॥

रमैनी १९७--नर सा चतुर न दूजा होई । चतुरे चतुर मिला
सब कोई ॥ पाप न चतुर चतुर व्योहारा । चतुर चतुर ठगे संसारा ॥
चतुरे सुत चतुरे मिल जोई । चतुर विहूना मिला न कोई ॥ एक
न तजे करे चतुराई । माता एक जोनि ठहराई ॥ चतुरे मिल
चतुरा समझावे । चतुरको भेद चतुर होय पावे ॥ एक न चतुर
चतुर संसारा । सब चतुरनते करता न्यारा ॥

समै--चतुराईको छोडदे, सद्वरुको मिल बूझ ।
कहैं कवीर दीपक बिना, अंधेरे परे न सूझ ॥

रमैनी १९८--यह नर उतर पारको जाई । कहो पंडित मोहिं
तैं समुझाई ॥ नाव न करिया न खेवनहारा । नदी विकट जेहि
बार न पारा ॥ जल अगाध तहैं लहर गंभीरा । औघट घाट सब
उतर कवीरा ॥ रैन अंधेरी संग न कोई । आप आप चले सब
सोई ॥ दिवस न रजनी पुरुष न नारी । हरि ब्रह्मा तहैं नहि त्रिपु-
रारी ॥ सुख ना भोग गुरु ना चेला । पार उतर जग चला अकेला ॥
निरगुन ब्रह्म कछु ना भाई । सुन्न सेयके सुन्न समाई ॥

समै--गुन टूटे बेरा बहा, उठ गया खेवनहार । औघट घाटी
नर गया, कासों कहों पुकार ॥ फुलवा भार न ले सके, कहैं सखिन
सो रोय । ज्यों ज्यों भीजे कामरी, त्यों त्यों भारी होय ॥

रमैनी १९९--बाट विकट नहिं कोइ बटवानी । तौने बाट चले
ब्रह्मज्ञानी ॥ नगर दूर तहैं संग न कोई । गैल सलसली उदो ना
होई ॥ भेद अभेद न त्रिगुन माया । पांच तत्त्वकी हती न काया ॥
बोल चाल न पीव न खाई । अंकार नहिं नगरमें रहाई ॥ सुख
अनंद ना निद्रा भाई । समझ भूल नहि आवे जाई ॥