कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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नीवंसा ॥ पाताल भर्मे अकाश निराकारा । मृत्युलोकका झूठ
षसारा ॥ घरकी नारि तज भया वियोगी । दसों दिशामें भया
विरोगी॥ समाधलायजोतको ध्याया। अलख न चीन्हा जीव गँवाया॥
समै--दसों दिसा खाली परी, सुन्न ब्रह्म ठहरान ।
कहे कवीर यह बूझ जगतकी, यहि ठहरा गुरुज्ञान ॥
रमैनी १९४--देव निरंजन पुरुष न दूजा । वेद पुकारे पंडित
कर पूजा ॥ मसजिद मुलना करे पुकारा । स्वास वेद करे निरं-
कारा ॥ जवाब सवाल न पावे कोई । पुकार पुकार जन्म सब खोई॥
समै--आखंडिया झाई भई, पंथ निहार निहार ।
जीभड़िया छाले परे, अलख पुकार पुकार ॥
रमैनी १९५--षट दरशन मिल समझो बानी । केहि ठहराया
आदि भवानी ॥ अलख बड़ा कि, जिन अलख लखाया । करम
बड़ा कि जिन ककर कराया ॥ दसो दिशामें दस व्योहारा ।
दिशा बडीकी बूझनहारा ॥ जो सब बूझे करे करावे । तौन बड़ाकी
जो नहि पावे ॥
समै- बीजक बतावे बित्तको, जो विज्ञ गुप्ता होय ।
शब्द बतावे जीवको, बिरला बूझे कोय ॥
रमैनी १९६--नरका ढाढस अगम अपारा । गहे न जाय
जाय संसारा ॥ जनक आद जिव देह जराई । सनकादिक बसे
बन जाई ॥ रावन आदि जिन सीस कटाया । हरनाकुस आदि
जिन उदर फराया ॥ बलि आदिक जिन पीठ नपाई । कस आदि
जिन कीन उपाई ॥ गौतम आदि जिन तप कियो भाई । विश्वा-
मित्र आदि सृष्टि करि आई ॥ जमदग्नि आदि जिन तप कीना
भाई । जड़भरत आदि जिन सरब गंवाई ॥
समै--षट दरशन ढाढस मरे, गन गंधर्व मुनि देव । कहे कवीर