कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 618, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६०४ )
कबीरपंथी—
बानी ॥ बिन बूझे नाहीं गुन पैहो । बिन बूझे तुम हरिहिं समेहो ॥
सत् होय तेहि तजो न भाई । औ सत् तजो जन रहो समाई ॥
तजो नहिं बाप तजो नहिं माया । तजो नहिं कर्म तजो नहिं
काया ॥ छाडो न आपन लोग व्योहारा । छाडों न यह सुखको
दरबारा ॥ बापहिं चीन्हों चीन्हों फिर माई । तातै चीन्हों तत्त्व समाई ॥
समे—जात पात जिन छोडो, छोडो गांव न ठांव । शब्द हमारा न
छोडो, जनि फेर धरावो नाम ॥ षट् दरशन भूले जात पांत तज, मिला
न सद्गुरु कोय । कहैं कबीर भर्म ऊपजा, थित काहे ते होय ॥
रमैनी १९१—यहि विध बूझो पंडित ज्ञानी । जहां अगिन तहां
धूम निसानी ॥ जहां जीव तहं होइहै देही । जहां पुरुष तहं होइहै
जोई ॥ घटके आधार नीर घट होय । जहैं देही तहैं जीव संजोय ॥
जहां संशय तहं होइहै रोगा । जहां प्रीत तहैं होय वियोगा ॥
समे—एक एक ते होय नहीं, जो पै दूसर नाहिं ।
दूसर मिला एकै भया, इसमें संशय नाहिं ॥
रमैनी १९२—समझो शब्द होय जिय चैना । जिन परछि पाय
न देखो नेना ॥ षट् शास्त्र यह करत लड़ाई । मिमांसा रहा कर्म
ठहराई ॥ वेदान्त कहे ब्रह्म जग करता । जैन मते बोध चित धरता ॥
करताको ठहराया अन्याई । मंत्र शास्त्र शिव सकती ठहराई ॥
पातंजली अनेक ठहरावे । झगरा मेटे जो न्याय चुकावे ॥
समे—न्याय करे यह सोय जिन, पाया पुरुष अलेख ।
कहैं कबीर सोई जिव मुकुत, जिन यह किया विवेक ॥
रमैनी १९३—षट् दरशन यह करें बिचारा । निराकार सो
सिरजनहारा ॥ निराकार दस दिशा बनाई । दसो दिशामें रहा
समाई ॥ पूरव भगति पच्छिम करे ज्ञाना । उत्तर जोग दच्छिन
कर्म ठहराना ॥ अग्ने काल वायव्य भई संसा । नित नेम ईसान