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कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

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(३२६)

कबीरपंथी—

मारि जगत यसलीन्हा । नरियर मोरि सुरहरि कीन्हा ॥ कहैं
कवीर सुन हंसपति राई । धर्मदास आरति सत्तु पाई ॥

साखी-नामी मिलि नामी भया, रही न दूजी आस । सुख
सागरमें घर किया, सत्यनाम विस्वास ॥

चौकाकी आरती ॥ ३ ॥

साखी-सत्य पुरुषकी आरती, जा घर होय प्रकास । कहैं
कविर सुनु धर्मनि, निर्मल होय सु दास ॥ १ ॥ जाघर आरती
दास करतु हैं, जन्म जन्मके पाप हरतु हैं ॥ टेक ॥ केदली दल
पुष्पनकी माला । सतसुकृत जाघर पगु चाला ॥ परिमल अगर
गुलाल सुवासा । जाघर हंस करे सुख वासा ॥ १ ॥ अनहद
ताल पखावज बाजे । श्वेत सिंहासन छत्र विराजे । नाम एको-
त्तर सुमिरे तबहीं । सतगुरु बैठे सिंहासन जबहीं ॥ २ ॥ तत्व
मता नरियर प्रमाना । सतगुरु कृपा होय निर्वाना ॥ नरियर
मोरत बास उड़ाई । पल यक साहिब विलमे आई ॥ ३ ॥ सत-
गुरु दया प्रगट जब होई । पाये प्रसाद महाफल सोई ॥ महा-
प्रसाद तत्व विधि पावे, कहहिं कविर सतलोक सिधाये ॥ ३ ॥

शब्द भोग

सत्यपुरुषको भोग लागे, सिंगी शब्द अनाहद बाजे ॥ टेका ॥
केदली पत्र साजो पनवारा । शीतल शब्द ज्योति उजियारा ।
नारियर मोरि सुररुहु कीना । आदि नाम अन्तर घट चीना १ ॥
मधुर मिठाई मधुर मिठाई । प्रीतिभावसे सन्त बोलाई ॥ लौंग
इलायची किसमिस मेवा । मधुर मधुर रस दाख घनेवा ॥ २ ॥
सुखसागरके निर्मल नीरा । जापर सतगुरु तृप्त शरीरा ॥ सत्य
पुरुषको अर्पण कीना शंख शब्द धुन बाजे वीना ॥ ३ ॥ सो
पनवार दासको दीना । जाते काल भयो है अधीना ॥ पान
प्रसाद जीवको पाव । अंकुरी सतलोक सिधावे ॥ ४ ॥ ऐसा भेद