सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 339, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 339

शब्दावली

(३२५)

गुरुके शब्दलै मोरहू सुनु साजना । यम शिर मर्दहु मान, संत
सुनु साजना ॥ सखियाँ पांच सहेलरी, सुनु साजना । नौन री
विस्तार, संत सुनु साजना ॥ कहहिं कवीर बघेलसे, सुनु साजना।
इन्द्रमती शिर ताज संत, सुनु साजना ।

आरती चौकाकी १ ।

सारखी-पुहुप दीपमें बैठिके, सुख सागरमें पान । अंबु दीपमें
बैठिके मूल करी पहिचान ॥ २ ॥ आदिनामचित चेतो भाई ।
आरति साजो जोत बराई ॥ पाट पटम्बर अम्बर छाया ।
तहवाँ हंसकरे गवनाया ॥ सेत सिघाँसन अगम अपारा । सत-
सुकृत तहवाँ पगु धारा ॥ भाजा तिभिर भया परगासा । दूत-
भूत जम आगम नासा ॥ बाहँ पकरि जिव सौपो भाई । सत-
सुकृतकी फिरी दुहाई ॥ सुरत निरत हैं सतगुरु पासा । जराम-
रनकी छूटी आसा ॥ तौन सुरतिले करो विचारा । सोहँ सोहँ
हंस उबारा ॥ अहिनिंसि सुभिरे जो कोई । सुख सागर पहुँचे
जन सोई ॥ हंस रूपका भेद बताऊँ । कहो तो आपन अंस
दिखाऊँ ॥ सुरति हँस सत्य है भाई । अगर बासमें रहे समाई ॥
कहैं कवीर सुनो भाइ साधो । पद परचे आरति आराधो ॥

सारखी-आरति चौका कर धरो, जीव उधारन काज । कहैं
कवीर धर्मदाससों, जुग जुग अविचल राज ॥ अगर विदेही
पायकरि, जगते रहे निनार । सुख सागरमें घर करे, सत्य नाम
आधार ॥ ४ ॥

आरती चौकाकी ॥ २ ॥

मृत लोक जम थान सर्वाँरा । तब सत सुकृत जुगति विचारा
सावधान बान यक कीन्हा । ताते काल भयो अधीना ॥ ले नरि-
यर जब तिलक बनाया । काल शीघ्र शरनागत आया ॥ नरि-
यर लीना हाथ उठाई । दूत भूत जग गये पराई ॥ कालहिं