कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 27, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकविरत्नकल्पगीता ।
१३
जब हत्या छूटे हरि केरा । निहकलंक औतार साधु वस चैरा
चारों जुग आयेंउं कइ वारा । जुग जुग२ आय धरैव औतारा॥
मैं तो बोइल देव पितु पाहीं । मैं कस न बोइल जीवपै चाहौ ॥
बोइल न छूटे कोट उपाई । कोट अनेक जिन सांसत पाई ॥
जो मैं करों सो पिताके आज्ञा । तापर श्रेष्ठ सो सद्गुरुसंगा ॥
सद्गुरुके संग कपे काला । सद्गुरु सत्तकवीर दयाल्ला ॥
कर्म भोग फल सब जिव पावे । कयों नहिं सुखकी राह चलावे ॥
वेद शास्त्र सब तनका वाणी । करने चले वाट पहिचानी ॥
चित सोई जो पर उपकारी । नार सोई पिव दरश अघारी ॥
सोई शिष्य गुरु शब्द जो माने । सोई पुत्र पितु सेवा ठाने ॥
सोई बहु जो सास सहेली । खसम सहेली सो बेलि चमेली ॥
पुत्री मातसे दुतिया वाणी । तम फल बीज जो बोवे प्राणी ॥
औरहिं देय जो भोजन करहीं । सो प्राणी वैकुंठे तरहीं ॥
भूखे अन्न प्योसेको पानी । नांगे वस्तर देय सुखखानी ॥
सुखी सोई जो पर तन पोषे । आनहिं वंचित पावे सोइ मोषे ॥
कोट जग्य पुण्य फल पावे । कसाई सो जो गाय छोडावे ॥
काहु जीव सो द्रोह न करई । जीवद्रोह कर नकें परही ॥
भूखा विष्णु अन्नजेवावे । गऊ कोट मुक्त फल पावे ॥
सकल देह व्यापे सतनामा । रमता राम सकल विश्रामा ॥
विष्णु बडे भागते होई । विष्णुपंथविन तरे न कोई ॥
इह बांधो सतभक्त कबीर । औ जस खेती पान शरीरा ॥