कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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कबीरकृष्णगीता ।
कोटिन जीवन हतन करावा । सब फल दे मोहि नरक भोगावा ॥
लोहड रूप धर मोहिं चेताऊं । केते रामचंद्र लख पाऊं ॥
तब रघुनाथ देह बन तेजा । देह गुप्त धरनीमह भेजा ॥
लैगौ दुतन निजपतिधामा । भक्ष कीन्ह तब राखेउ नामा ॥
कृष्ण नाम घर कथेऊं बाया । देह धरे व्यापे अब कामा ॥
राजा मनु तब कीन्ह बहूता । करता होहु हथारे पूता ॥
तब मोहि कहा निरंजन राई । दशरथके घर जन्मो जाई ॥
तब जन्मेउं कौसल्या पोटा । गरजत कहायेउं दशरथ बेटा ॥
तहैं बहु दुख सुख चिंता परऊ । अब कृष्ण देउ मजुरी दियऊ ॥
द्वापर केलि करहु तुम भाई । देवकी वसुदेव घर जाई ॥
जो मनु भये सो दशरथ राजा । जो दशरथ सो नंद विराजा ॥
केकई देवकीके घर जाये । प्रेम भक्ततवसा नंद घर आये ॥
नंदके घर कृष्ण अनंदा । पै कच्चा सुख तन यह गंदा ॥
कछु दिन सुख बहुते दुख दीन्हा । लडत बधत जिवघात बहु कीन्हा ॥
टीका पुरे यदुवंश मरावा । गोपी सब मारजाट लुटावा ॥
तब मोहि व्याधा हाथ मरावा । बहुर बौध रूप फरमावा ॥
कर ताको आज्ञा सिर मानी । बौधरूप जग धरायउं आनी ॥
जैसे गऊ हत्या काहु लगे । रहै मरुट तीरथ व्रत भागे ॥
कहिनकी मारेहु ब्राह्मण भांटा । और अनेक जीव तुम काटा ॥
परनारीसे तुम रति कीन्हा । कहा जताय जात जू लीन्हा ॥
आप कहायऊ सिरजनहारा । ताते विष्णु चैविस तनधारा ॥