कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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कबीरकृष्णगीता ।
विष्णुके भक्त लावनी होई । खेतंगी माता भक्त विलोई ॥
उसर भक्त आये शिवकेरा । ब्रह्मा भये अपूज्य सकेरा ॥
भूतनी उंकनी भैरो काली । यह जीव अयस्वानी जंजाली ॥
सवा लक्ष जिव नित प्रति चाही । निरंकार तर भोजन खाही ॥
दोहा-क्या पापी क्या पुण्य कर, काह न छड़ि काल ॥
सवा लक्ष जिव रात दिन, नित खाहीं निराकार ॥
पापी घींच नरकमें दीन्हा । पुण्यी जीव चूस सो लीन्हा ॥
ज्यो नरको भोजन है निका । खाय जुडाय तपन गई जिवका ॥
तैसे काल चवावे रस पुच्छका । पुण्य क्षीन तब जीव भये सुन्यका ॥
थुथक लीन्ह सीठ जब भयऊ । दूतन आन चित्र पंह दियऊ ॥
सुचि बचाय जमावै धाई । पाप पुण्यके लेख चुकाई ॥
चित्र गोपित्र कह ले कछु बांचा । सब फासिक देवन घर जांचा ॥
तब जत पुण्य बांच सो दीन्हा । डारेउ नरक जन्म संग लीन्हा ॥
दोहा-पुण्य करावे छलके, जीवनको निराकार ।
पुण्य चूस ले आपनो, जीव नरक ले डार ॥
कबीरके शरण कालते बांचा । कबीर शरण बिन जमवर नाचा ॥
यह कछु बात कहनकी नाही । रही सोच मनही पछताहीं ॥
जेहि लख परे गहे गुरु पूरा । कबीरको मनुष्य कहे कोइ कूरा ॥
सुखदेव सुनत यगन मन भयऊ । व्यास पितासो विनती कियऊ ॥
जन कबीर देहु गुरु मोरा । सत्त कबीर रक्षक बंदीछोरा ॥