कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४३६ ) बीजक कबीरदास ।
भ कहिये आकाश शून्यको भा कहिये भ्रमणको । सो हे जीव ! भ भरिबो
कहावै है, डेराबो धोखा या ज्यहि मतन में फल शून्य है तेही मतनमें तैं
भ्रमण करि रह्यो है कहे सो विचार को भ्रमण तेरे पूरिरहो है, सो तोको गुरुवा
लोग साहबते डेरवाइ दियो औ धोखा में लगाइ दियो सो तोको डरही डर
सर्वत्रदेखो परै है जब आवै कहे जन्महोइहै तबहूं भभरे आवैहै कहे डरैमें
आवैहै औ जब जाइहै तबहूं भभरे कहे डरैमें जाइहै वोहू नानाप्रकारके दुःख
होइहैं । सो या भभरे ते नियरे जे साहबहैं ते दूरिहैगये । सो भभाजेहैं धोखा
ब्रह्मके भ्रमणवाले तेई कहैहैं सो हे भाई ! सुनो भ्रमैते आवैहै भ्रमैते जाइहै महा-
प्रलयमें लीनहोइहै पुनिसृष्टि समयमें संसारमें आये है । भ आकाशको औ भ्रम-
णको कहैहैं तामेंप्रमाण ॥ “ नैक्षत्रं भं तथाकाशेभ्रमणेभः प्रकीर्त्तितः । दीप्ति-
र्भाभूस्तथाभूमिर्भीर्भयेकथिता बुधैः ” ॥ २५ ॥
ममा से ये मर्म न पाई । हमरेते इन्ह मूल गँवाई ॥
ममा मूल गहल मन माना।मर्मी होइ सो मर्महि जाना॥२६॥
म कहिये लक्ष्मीको मा कहिये बन्धन को । सो हे जीव तैं लक्ष्मीके बन्धन
में परिकै ऐश्वर्य में परिकै साहब को मर्म्म तू न पायो हमरेते कहे यह सब
हमारेहै कहे यह विचारते यह सब साहब को पहन जानोइहै आपनमानतें
इन्हमूल जे साहब हैं तिनको गवाँइदियो सो हे ममा ! मायाबन्धनमें बँधो
जीव ! जौन तेरमन में मानाहै ताहीको मूलमानि गहिलीन्होंहै सो तैं मूल न पायो-
काहे ते कि मर्मीकहे जो कोई साहबको मर्मीहोइ है सोई साहब के मर्मकों
जानैहै । म लक्ष्मीको औ बन्धनको कहै हैं तामें प्रमाण ॥ “ मः शिरश्चन्द्रमा
वेधा मा च लक्ष्मीः प्रकीर्त्तिता । मच मात्रि माने च बन्धने मः प्रकीर्त्तितः”॥२६॥
यया जगत रहा भरि पूरी । जगतहु ते यया है दूरी ॥
यया कहै सुनौ रे भाई । हमरे सेये जय जय पाई ॥२७॥
१-‘भ’ भं नक्षत्र और आकाशको,‘भः’ घूमनेको‘भाः’ शोभाको‘भी’ डरकोकहते हैं।
२-‘म’ शिर, चन्द्रमा, ब्रह्मा, माता, तौल, और बांधनेको कहते हैं ‘मा’ लक्ष्मीको
कहवै हैं ।