कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचौतीसी । ( ४३६ )
फफा फल लागो बड़ दूरी । चखैं सतगुरु देइ न तूरी ॥
फफा कहैं सुनहुँ रे भाई । स्वर्ग पताल कि खवारि न पाई २३
फ कहिये फलको फा कहिये निष्फल भाषण कों । सो हे जीव! जौने फल-
को तैं भाषण करैहै कि ऐसोफल होइगो सो या तेरो भाषणो निष्फल है फल जे
साहब हैं ते बहुत दूरि हैं सतगुरु जेहैं जे साहब को जानै हैं तेईचाखै हैं व
फल वे तूरिकै काहूको नहीं देइहैं काहे ते वे साहब मन बचन के परे हैं आपही
ते आप जाने जाइ हैं अपनी दई इन्द्रि ते आप देखे जाइहैं सतगुरु जे बतावै
हैं ते साहबके प्रसन्न होबेकी राह बतावै हैं सो हे भाई ! लोकनमें फल की
चाहकरिकै निष्फल के भाषणवाले जे गुरुवा लोगहैं ते कहै हैं कि स्वर्ग पाताल
में साहब की खबरि हमहूं कहूँ नहीं पाई अर्थात् साहब हई नहीं हैं । फ फल
को औ फा निष्फल भाषण को कहै हैं तामें प्रमाण ॥ “झंझावातेफेत्कारः
स्यात्फःफलेऽपिमकीर्त्तितः । फकारोऽपि च फःमोक्तस्तथा निष्फलभाषणे”॥२३॥
बबा बर बर कर सब कोई । बर वर किये काज नहिं होई ॥
बबा बात कहै अरथाई । फलके मर्म न जानेहु भाई ॥ २४ ॥
ब कहिये बरुणको बा कहिये घटको । सो बरुण जलके भीतर रहै हैं ऐसे
हे जीव! तुहुं बाणी के भीतर हैकै घटकी नाईं भकभकाइ बरबर सब कोई करौहौ
सो बरबर के किये काजनहीं होइ है अर्थात् साहब नहीं मिलैहैं। सो हे बबा !
घटकी नाईं भकभकान वारे बात तो बहुत अर्थायकै कहै हैं परन्तु हे भाई !
लोकनके फलको मर्म नहीं जानौहौ कि वा फल भोगकरि कछुदिन में गिरही
पैरेंगे । ब बरुणको औ कलशको कहै हैं तामें प्रमाण॥ “प्रचेता बैः समाख्यातः
कलशो ब उदाहृतः ” ॥ २४ ॥
भभा भर्म रहा भरि पूरी । भभरेते है नियरे दूरी ॥
भभा कह सुनौ रे भाई । भभरे आवै भभरे जाई ॥ २५ ॥
१-'फ' आँधी, फल, फ अक्षर और, व्यर्थभाषीको कहते हैं ।
२-'ब' वरुण और कलशको कहते हैं ।