कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवस्तु नहीं है परन्तु काहूके थहाये नहीं थहाय जायहै । शिलासमूह
मनहै सो आगेपदमें कहियाये हैं ॥ “पाहनफोरि गंगयकनिकसी चहुंदिशि
पानीपानी” ॥ सो यह मनथिर होइ तो यह जीवहू थिररहै । ताते तैं थोरे
थोर साधन करु जाते मन थिर होइ । जो साधन न करैगो तौ मन न थिर
रहैगो कैसे ? जैसे बिना थंभकहे खंभा देवाऊ और जो कौनौ यशौवाली बात
न करै तौवह यश बनै रहतैहै ? मन्दिरथँभै है ? अर्थात् नहींथँभै है । अथवा
थोरे थोरे साधनकार मन थिर कैले जब मन थिर ह्वै जाइगो तब साधन न
करन परैगो। कैसे जैसे कौनौ यशवाली बातकियो फिर वा यश रूप मंदिर बिना
थम्भै बनोरहै है । थ शिलासमूहको औ रक्षाकोकहे हैं तामें प्रमाण ॥ “शिलो-
च्चये थंकारस्स्यात्थकारोभयरक्षणे” ॥ १८ ॥
ददा देखो बिनशनहारा । जस देखौ तस करौ विचारा ॥
दशौ द्वारमें तारी लावै । तब दयालको दर्शन पावै ॥१९॥
द कहिये कलत्रको औ दा कहिये दानको। सो हेजीव! या सबकहे यहलोकमें
जो कलत्रादि औ वहलोक स्वर्गादिक बिनशनहारा है अर्थात् सब नाशमानहै ।
सो जस देखो कहे जैसा नाशवान् देखतेहौ तैसा तुहूँ अपने को विचारकरों
कि, हमहूं नाश ह्वै जै हैं । दशौ द्वारको महा मुद्रा करि बंदकरि ताली लावै
कहे समाधिकरै तबदयालु जे साहबहैं तिनको दर्शन तैं पावैगो । द कलत्रको
औ दान को कहै हैं तामें प्रमाण॥“दैःकलत्रे बुधैरुक्तो छेददानेपि दातरि”॥१९॥
धधा अधे माहँ अँधियारी । जस देखै तस करै विचारी ॥
अधौ छोड़ि उरध मनलावै। अ पा मेटिकै प्रेम बढ़ावै॥२०॥
ध कहिये बंधनको औ धा कहिये धाताको । सोहेजीव ! मायाके बंधनमें
परिकै अपनेको धाताकहे ब्रह्मा मानिलियो है। सोहेजीव ! तैं अधः कहे अधोग-
तिकी अंधियारीमें परो है । तोकोनहीं सूझिपरै अज्ञानमें परो है । सो जस
देखैहै सुनै है तैसही बिचार अज्ञान पूर्वक करैहै सो तैं न करु अधो जो है अधो-
१-'थ' पर्वत और सङ्कटसे बचाने को कहतेहैं।
२-'द' स्त्री, काटना, देना और दानकरनेवालेको कहते हैं।
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