कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४३० ) बीजक कबीरदास ।
टटाविकट बात मन माहीं । खोलि कपाट महलमें जाहीं ॥
रहेलटपटेजुटितेहिमाहीं।होहिंअटलतेहिकतहूँ न जाहीं १२॥
एक ट कहे जो नाभीमें रेफकी ध्वनि उठैहै औ दूसरो टाकहे जो सुराति
कमलमें गुरुरकार ध्वनिकरै है । सोदनों ध्वनि जामें होइँ सो टटाकहावैहै सोहे-
टटाजीव ! बिकटबातकी जेबासना तेरेमनमें तेई कपाटहैं ताकोखोलिकै दोनों रकारकी
ध्वनि एक कै रामनामकौ छइउ मात्रा जपत अर्थ बिचारत महल जो साकेत
तहांको जाइ रहै । लटपटे कहे जैसे होय तैसे राम नाममें जुटिरहु तौ साकेतमें
जाई कैतैं अटलह्वै है। अथवा बिकट बासननको तेरे मनमें टटाह्रै रहा है सो टटाको
खोलिकै महलमें जा। हे लटपटे! जौने संसारमें लटपट ह्वैरहे है कहे नरक स्वर्गमें तैं
गिरे उठै है सो तैं साकेतमें जुटिरहु जे साकेत में जुटिरहे हैं कहे प्रवेश करिरहे
ह तेई अटल ह्वैरहे हैं उनको जनन मरणनहीं होय। वे कतहूं नहीं जाय हैं। टध्व-
निकोकहैहैंतामेंप्रमाण॥ “टः पृथिव्यां च करंके टो ध्वनौ च प्रकीर्त्तितः” ॥१२॥
ठठा ठौर दूरि ठग नीरे। नितके निठुर कीन्ह मन धीरे ॥
जेहिठगठगसवलोगसयाना।सोठगचीन्हिठौरपहिचाना १३
ठ कहिये बृहद्ध्वनिको औ ठाकहियेचंद्रमंडलको । सो बृहत्है ध्वनिकहे
कीर्त्तिजिनकी तीनों तापके हरणहारे चंद्रमण्डलकी नाईं ऐसे परमपुरुषपरजे
श्रीरामचन्द्र हैं तिनको ठौर दूरि है । औ ठग जो मनहै सोनेरे है अथवा हेठ-
ठहा मसखराजीव साहबसों मसखरी करनवारो जाते जननमरण छूटै है वा
साहबको ठौर दूरि है । ठगजे मन बुद्धि चित्त अहङ्कार ते नेरे हैं । तैं नित्यको
निठुरहै याजो माया ताको ना धीरे करत भे सोकहै तेजकरते भये ऐसो जो
ठग मन जौनसब सयाने लोगनको ठगतभो तौने ठगमनको चीन्हिकै साहब कें
ठौरको पहिचानौ । अथवा ठग जे हैं गुरुवालोग ते साहबते छोड़ायकै और
औरमें लगायो ते कहां तेरे मनको धीरे किये नहीं किये । औ ठ बृहद्ध्वनिको
औ चंद्रमंडलकोकहै हैं तामें प्रमाण ॥ “बृहद्ध्वनिश्च ठः प्रोक्तस्तथा चंद्र-
स्यमंडले” ॥ १३ ॥
१-‘ट’ भूमि, करकपात्र और शब्दकरनेमें कहागया है ।
२-‘ठ’ बड़े शब्द और चन्द्रमाके घेरेको कहते हैं ।