कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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क्या मूड़ी भूमिहि शिर नाये क्या जल देह नहाये ।
खून करै मसकीन कहावै गुणको रहै छिपाये ॥ २ ॥
कबीरजी कहै हैं कि, हिंदू तूरुक तुमको बिसराइकै और और बिचार करै हैं
या चित्तमें न दीजै मिहर करिये काहेते कि, तुरुक मूड़ी भूमि जो गोर तामें
शिर नावै है औ हिन्दू बहुत जलसों नहायहै याते काहभयो आपको तो जनबै
न कियो औ जीवनकें गरकाटै है ऐसो खूनकरै तौन खून तौ छिपावै है आपतें
जे सर्वत्रपूर्ण हैं तिनको नहीं जानै है औ मसकीन जो फकीरसो कहावै है याते
कहाभयो ॥ २ ॥
क्या भो वजू मज्जन कीन्हे का मसजिद शिर नाये ।
हृदया कपट निमाज गुजारै कहाभो मक्का जाये ॥ ३ ॥
हिंदू एकादशि चौबिस रोजा मुसलम तीस बनाये ।
ग्यारह मास कहौ किन टारौ ये केहि माहँ समाये ॥ ४ ॥
हिन्दू बहुत प्रकारके मज्जनकरै हैं औ तुरुक वजूजो कुल्ला मुखारी करिकै
हृदयमें कपट सहित निमाज गुजारचो, मसजिद में माथ नवायो, मक्का गयो
यातें काह भयो ? आपको तों जनबै न कियो ॥ ३ ॥ हिन्दू तौ चौबिस
एकादशी रहै औ तुरुक तीस रोजा रहै यातें काहभयो ? काहेते यातो जनबै न
कियो कि और दिन ये काहेमें समायेंगे ई सब दिन साहिब के हैं ग्यारह
मास काके हैं ॥ ४ ॥
पुरुब दिशिमें हरि को बासा पश्चिम अलह मुकामा ।
दिलमें खोज दिलैमें देखो यहै करीमा रामा ॥ ५ ॥
जो खोदाय मसजिदमें बसतुहै और मुलूक केहिकेरा ।
तीरथ मूरति राम निवासी दुइमें किनहुँ न हेरा ॥ ६ ॥
हिंदू कहैहैं कि, पूरुब औ उत्तरके कोनेमें सुमेरुहै ताहीमें बैकुंठ है वहैंते सूर्य
उदय होईहै तहँ हरिको बासहै ताही ओर पूजा ध्यान करै हैं। औ पश्चिमकैति