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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

परम सुखद सुशील सुन्दर पाहि स्वामिन् मम धनी।
जय जय श्री हरिवंश प्रसंसित सब दुनी॥३।
जय जय श्री हरिवंश नाम गुन गाइ है।
प्रेम लक्षना भक्ति सुदृढ़ करि पाइ है॥
अरु बाढ़ै रसरीति प्रीति चित ना टरै।
जीति विषम संसार कीरति जग बिस्तरै॥
बिस्तरै सब जग विमल कीरति साधु संगति ना टरै।
वास वृन्दाविपिन पावै श्रीराधिका जु कृपा करै॥
चतुर युगल किसोर सेवक दिन प्रसादहिं पाइ है।
जय जय श्री हरिवंश नाम गुन गाइ है॥४।
श्रीहित पद पद्मैकनिष्ठ श्रीहरिराम व्यास
राधावल्लभ व्यास के इष्ट मित्र गुरुदेव।
श्री हरिवंश प्रगट कियौ, कुंज महल रस भेव॥
व्यास आस हरिवंश की, तिनहीं को बड़ भाग।
वृन्दावन की कुंज में, सदा रहत अनुराग॥
हित हरिवंश कृपा बिना, निमिष नहीं कहुँ ठौर।
व्यासदास की स्वामिनी, प्रगटी सब सिरमौर॥
गो. श्री कृष्णचन्द्रजी:
स्फुरद् वदन पंकजः कनककूट देहद्युतिः।
प्रशस्त सुख सम्पदां निधिरपूर्व मानप्रदः॥
सकृष्ण वृषभानुजा चरणमाधुरी चंचुरः।
सदा मधुर वाक्पटुर्जयति साधुवैयासकिः॥
प्रेमानन्दो पुलकित गात्रौ विद्युद्धाराधर समकान्तिः।
राधा कृष्णौ मनसि दधानं वन्देऽहं श्रीहित हरिवंशम्॥
श्रीहित वृन्दावनैकनिष्ठ श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती :
त्वमसिहि हरिवंश श्यामचन्द्रस्य वंशः।
परम रमद नादै मोहिताशेष विश्वः॥

हित चौरासी • • ६
अनुपम गुणरत्नै र्निर्मितोऽसिद्विजेन्द्र।
मम हृदि तव गाथाश्चित्रलेखवेलग्ना।।
श्रीहरिलाल जी व्यास
राधैवेष्टं सम्प्रदायैककर्त्ताचार्य्यो राधा मन्त्रदः सद्गुरुश्च।
मंत्रो राधा यस्य सर्वात्मनैवं वन्दे राधापादपद्मप्रधानम्॥
श्री नाभा जी का छप्पय
श्रीराधा चरन प्रधान हृदय अति सुदृढ़ उपासी।
कुंज केलि दंपति तहाँ की करत खवासी॥
सर्बसु महा प्रसाद प्रसिद्ध ताके अधिकारी।
विधि निषेध नहिं दासि अनन्य उत्कट ब्रत धारी॥
श्रीव्यास सुवन पथ अनुसरै सोइ भले पहिचानि है।
(श्री) हरिवंश गुसाँई भजन की रीति सकृत कोउ जानि है॥
श्री स्वामी चतुर्भुजदास जी
हरिवंश चरण बिनु बल गहौं काकौ।
कुँवरि कुँवरवर केलि समागम वृन्दाविपिन सुखद धन जाकौ॥
मन क्रम वच सुमिरौं व्यासनन्दन मुरलीधरन इष्ट है जाकौ।
कृपा करैं श्रीराधा रानी छत्रभुज जानि गह्यौ यह नाकौ॥
श्री नागरीदास जी
प्यारौ श्री हरिवंश न होतौ।
तौ रसरीति समीति प्रीति कौ भेद भजन अधिकारी को तौ॥
लाड़िलीलाल विमल जस रस विनु जग अंधेर पर्यौ हुतौ सोतौ।
नागरीदास प्रभु प्रगट पुकार्यौ अविवेकिन कौं अजहूँ अछोतौ॥१॥
बिना कृपा राधा रानी की क्यौंव शरण हित तू की पावै।
जाकौ नाम सुनत परवस ह्वै श्याम सहित श्यामा उठि धावै॥
दम्पति रूप रसासव पीवत धर्मी धर्म बिनु और न भावै।
नागरीदास श्रीव्याससुवन बल नित्यबिहार औरनि दरसावै॥२॥

१० • • हित चौरासी
श्री हरिवंश चरण विश्राम।
साधन आराधन पुरुषारथ श्री हरिवंश चरन सुख धाम।।
सीतल रसद विसद गुन गन मय श्री हरिवंश भजन निहिकाम।
श्री हरिवंश सेइवौ स्वारथ सुधा विमल वानी अभिराम।।
जो चाहै वृन्दाविपिन माधुरी श्री हरिवंश सुमिर वरनाम।
श्री हरिवंश रति कियें नागरीदास सदा सुगम सुख स्याम स्याम।।३।।
श्रीध्रुवदास जी
प्रगट प्रेम कौ रूप धरि, श्री हरिवंश उदार।
श्रीराधावल्लभ लाल कौ, प्रगट कियौ रस सार।।१।।
करुणानिधि अरु कृपानिधि, श्रीहरिवंश उदार।
वृन्दावन रस कहन कौं, प्रगट धर्यौ अवतार।।२।।
प्रथम नाम हरिवंश हित, रटि रसना दिन रैन।
प्रीति रीति तब पाइयै, अरु वृन्दावन ऐन।।३।।
हरिवंश चरण उर धरनि धरि, मन बच करि विश्वास।
कुँवरि कृपा ह्वै है तबहि, अरु वृन्दावन वास।।४।।
अगम तें अगम अगाध अति, पहुँचत नहिं मन वेद,
श्री हरिवंश प्रताप बल, पावत सुगम सुभेद।।५।।
श्री कल्याण पुजारी जी
जाके सिर ऊपर श्री व्यासनन्द से धनी हैं
ताहि न परवाह कछू काहू और ठौर की।
चलत सु पथ साधु लक्षन तें जानियत
वानी मुख कहत रसिक सिरमौर की।।
श्रवन सुनत नैन देखत हैं रूप मन
ध्यावत स्वरूप शोभा-सिन्धु में झकोर की।
सदाई कल्याण रस फूले फिरैं प्रेमी जन
गुनन गम्भीर धीर मिटी सब रौर की।।१।।

हित चौरासी • • ११
श्रीवंशी अली जी
श्री हरिवंश की यह वानि।।
करत जे अनसहन निन्दक तिनहिं हित सरसान।।
जान रस वस आस राधा वास महल निदान।
कुंज सेवा पुंज विलसत गुंज गहि गहि पान।।
सूर्य तनया निकट निजपुर नूत पल्लव वान।
सखीजन की भीर भाजन लियें वहु विधि आन।।
चरण चंचल पलक अचंल ढाँकि प्यारी पान।
वदत वंशी अलिहि अंशी मत्त मुख रसखान।।
श्रीकिशोरी अली जी
हित विन कैसौ विपिन विहार।
हित राजत प्यारी पिय के हिय हित ही सकल सुखन आधार।
हित ही सौं सिंगार करावत हित ही भूषन वसन अपार।
छिन छिन चोंज होत हितही के जुगल खिलौना हित खिलवार।
हित की सेज बिराजत दोऊ हित कौ नवल निकुंज अगार।
हित सौं फूलि रहीं बेली तरु शुक कोकिल गावत हितसार।
यमुना पुलिन रास रचनादिक फैलि रह्यौ हित कौ विस्तार।
श्री वनमें हित व्यापि रह्यौ है हित सौं हित ही कौ व्यौहार।
सोई प्रगट भयौ हित हरि कौ सकल जगत कीनौ उद्धार।
हित हरिवंश नाम के ऊपर अली किशोरी वलि वलिहार।
श्रीप्रियादास जी गौड़िया
श्रीहरिवंश गोसाई भजौ।। कुंजकेलि रस ही में सजौ।।
हितजू की रीति कोऊ लाखनि में एक जानैं,
राधा ही प्रधान मानै पाछै कृष्ण ध्याइयै।
निपट विकट भाव, होत न सुभाव ऐसौ,
उनहीं की कृपा दृष्टि नेंकु क्यौं हूँ पाइयै।।

१२ • • हित चौरासी
बिधि औ निषेध छेदि डारे; प्रान प्यारे
हिये जिये निज दास निसिदिन वहै गाइयै।
सुखद चरित्र, सब रसिक बिचित्रन के
जानत प्रसिद्ध, कहा कहिकैं सुनाइयै॥
आए गृह त्यागि, राग बढ्यौ प्रिया प्रीतम सों,
बिप्र बड़भाग हरि आग्या दई हरि जानियै।
तेरी उभै सुता, ब्याहि देवौ लेवौ नाम मेरौ,
इनिकौ जौ बंस प्रसंश जग जानियै॥
ताही द्वार सेवा बिस्तार निज भक्तिनि की
अगतिन गति, सो प्रसिद्धि पहिचानियै।
मानि प्रिय बात गह गह्यौ सुख लह्यौ तब,
कह्यौ कैसें जात यह मन मन आनियै॥
राधिका बल्लभ लाल आग्या सो रसाल दई
सेवा मो प्रकास औ बिलास कुंज धाम कौ।
सौई बिस्तार सुखसार दृग रूप पियौ,
दियौ रसिकनि जिनि लियौ पक्ष बाम कौ॥
निसदिन गान रस माधुरी कौ पान उर
अंतर सिहान एक काम स्यामा स्याम कौ।
गुन सो अनूप कहि, कैसे कै सरुप कहैं
लहै मनमोद; जैसे ओर नहीं नाम कौ॥
श्रीभगवत मुदित जी गौड़िया
जै जै श्री हरिवंश हंस हित कोबिद वानी।
ललिता ललित प्रशंस केलि कल दशा बखानी॥
जयति जयति वन जयति जयति श्री राधारवनी।
जयति जयति ललितादिक जयति हित कौतिक कवनी॥

हित चौरासी • • १३
चाचा श्रीहित वृन्दावनदास जी
रसिक सभा-भूषण द्विजवर-कुल,
व्यासनंद-पद सुरतरू रस कौ।
भाग्य भलौ जग प्रगट प्रकाश्यौ,
किधौं चिन्तामणि राधा-जस कौ॥
परम अलौकिक कामधेनु मनु,
दाइक मिथुन गुपत-गुण गंस कौ।
वृन्दावन हित रूप जाऊँ बलि,
दियौ कर सीस प्रेम पारस कौ॥
को दाता नित्यविहार कौ।
श्री हरिवंश उभय रस मूरति बिनु को जग उपकार कौ॥
को वपुरा गुन गुपत कहैगौ वन रस रसिक उदार कौ।
को भेदी हिय हिलग मिथुन कौ बिनु उहि परिकर लार कौ॥
जननि भाग कौ उद्भव जानौ कलि वंशी अवतार कौ।
वृन्दावन हित जिहिं दत प्रापति कुंज केलि सुख सार कौ॥
श्रीप्रियादास जी रीवाँ
जापै कृपा करै श्री हरिवंश सु तापै दयाल सदा हरि राधा।
जाकौ नहीं हित सौं हित है टुक ताकी न मेटि सकें हरि बाधा॥
याकौ तौ भेद अनन्य लखैं अरु औरन कौं अति गूढ़ अगाधा।
प्रियादास कृपा हित की तें मिल्यौ रस कुंज कौ दर्श पुरी मन साधा॥
श्रीरतनदास जी
नमो नमो जै श्री हरिवंश।
जुगल मूल रस फूल झूल लगे गौर श्याम हित हेत निसंस॥
नेति नेति रस सबनि जु गायौ खोजत किनहुँ न पाई गंस।
करी कृपा वपु प्रेम रूप धरि दियौ दरशाय यह गूढ़ प्रसंस॥
चरण शरण जे हित के अनुसरे तोरि जगत सब माया फंस।
सबनि लहे अरु अबहू लहंत हैं नित नवीन यह प्रेम सतंश॥

१४ • • हित चौरासी
गुरु सहचरि गोवर्धन स्वामिनि परस्यौ पदनि कृपा भयौ हंश।
प्रेम पुलक तन मन आनन्दित रतनदास के हिय अवतंश॥
परम भागवत स्वामी श्री हितदास जी महाराज
वन्दे तारा तनय मुदारम।
आगम निगम अलक्ष्य अगोचर,
प्रगटित विसद सु विपिन विहारम्॥
रसिक सभा मंडन रस भूषण,
निज हित रीति प्रीति विस्तारम्।
श्रीराधा रति केलि कुंज रस,
रसिक अनन्य वहन रसभारम्॥
निरभिमान करुना-वरुनालय,
आरत सरनागत प्रतिपारम्।
'नेहलता हित' देहि दयामय,
निज पद-पल्लव रसघन सारम्॥
श्री हित चौरासी वाणी प्रशस्ति
गो. श्री हित रूपलाल जी महाराज
भव-जल-निधि कौ नाव काम पावक कौ पानी।
प्रेम-भक्ति कौ मूल मोद मंगल सुखदानी॥
निगम सार सिद्धांत संत विश्राम मधुर वर।
रसिकन कौ रस-सार सकल अक्षर रस कौ घर॥
चौरासी (श्री) 'हरिवंश' कृत पढ़ै सुनै निसि-भोर।
छुटै-चौरासी भ्रमनि तें निरखै जुगल किशोर॥
निरखै जुगल किशोर भोर अरु रैन न जानै।
पियै रूप रस मत्त भयौ कछु मनहि न आनै॥
प्रेम लक्षना भक्ति होय हिय आनन्द कारी।
अरु वृन्दावन वास सखी सुख कौ अधिकारी॥
कुञ्ज महल की टहल सुख सम्पत्ति दम्पति पाइहै।
(जयश्री) रूप लाल हित प्रीति सौ जो चौरासी गाइहै॥

हित चौरासी • • १५
श्रीनेही नागरीदास जी
गिरा गंभीर गुननि गरबीली।
सुजन सनेहिन के मन आवै, औरन कौ ओरठ अरबीली।।
श्री हरिवंश वचन वर कल, कढ़ी स्वच्छ सुछंद सुछैल छबीली।
नागरीदास मकरंद माधुरी रूप रंग रस रसिनि रसीली।।
वानी विमल लाड़ की परावधि।
श्री हरिवंश वचन वर निकसी बड़भागिनु जो आवै कहाँ सधि।।
रूप रंग रस कुसल कुलाहल जामहि अमित-अगाध लवधि लधि।
नागरिदास भजन कौ मरमी सुख निधि-व्याससुवन पद आरधि।।
श्री हरिवंश गिरा पद अष्टक।
कहत सुनत ताकौ मन सुधरै कपटी होइ कुटिल खलु निष्टक।।
प्रबल प्रताप ध्वंस असुभ निकर रहत न पावै कंटक किष्टक।
सदगद नागरीदास रसिक मनि कैसेहूँ करि-रमै मिटै मति भिष्टक।।
श्री किशोरी अलीजी
जय श्री चतुरासी रस रासी।
हित हरिवंश चन्द्र तैं प्रगटी दम्पति-प्रेम प्रकासी।।
ललित केलि की सरिता मानौं उमड़ि चली अनयासी।
रसिक उपासक रुचि सौं पीवत जीवत श्रीवन बासी।।
वक्ता-श्रोता कौ अपनावै नवल निकुंज विलासी।
ताही छिन परिकर तन दैकै करत किशोरी दासी।।
श्रीहित कल्याण पुजारी जी
श्री हरिवंश गिरा घन बरसै।
प्रेमी रसिक उपासक सींचे, सरस सुजस मन करषै।।
छिन-छिन चौप कोंप उर बाढ़ति, भजन भावना हरषै।
यह 'कल्याण' प्रेम जल उमग्यौ, नेम-मरजादनि न रखै।।

॥ श्रीहित ॥
॥ श्रीराधा वल्लभो जयति ॥
मङ्गलाचरण
नवल चंद प्रिया बदन, अति अनूप रूप सदन,
हँसनि नवल मंद चपल चितवन सुखदाई।
नवल अधर सरस लाल दसन झलक छबि रसाल,
छिन छिन छबि होत नवल मन नहिं ठहराई॥
निरखत सोभा गँभीर बिसरे पिय नैन चीर,
मनहुँ कमल रहे फूलि तरनि उदय माई।
नवल प्रिया नव किसोर नवल सखी चहूँ ओर,
विमल प्रेम ऊपर 'हित ध्रुव' बलि जाई॥

  • हितदास

निभृत निकुञ्ज विलासी
ठाकुर श्रीश्रीराधावल्लभलालजी महाराज

वंशी अवतार, प्रेमस्वरूप, रसिकाचार्य
अनन्त श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु जी महाराज

रसिकावतंश
श्रीदामोदरदासजी महाराज
(श्रीसेवकजी)

१. पद १-२५: श्रीराधा-माहात्म्य, निकुञ्ज-लीला एवं शृंगार-रस

श्रीहित कृपामूर्ति परमभागवत
स्वामी श्रीहितदासजी महाराज

॥ श्रीहरिवंश ॥
॥ श्रीराधा वल्लभ ॥
श्रीगुरु-वन्दना
नमो० नमो जय श्रीहरिवंश।
रसिक अनन्य बेनु कुल मण्डन,
लीला मान सरोवर हंस॥
नमो जयति वृंदावन सहज माधुरी,
रास विलास प्रसंस।
आगम-निगम अगोचर राधे
चरन सरोज व्यास अवतंस॥

  • दास
    हितदास
    श्रीइष्ट देव वन्दना
    शृंगार रस माधुर्य्य सार सर्वस्व विग्रहे।
    नमो नमो जगद्वन्द्ये वृन्दावन महेश्वरि॥
    हे वृन्दावन की महामहिम स्वामिनि ! हे जगत् वन्दनीया! हे श्रृङ्गार, रस,
    माधुरी की सार सर्वस्व मूर्ति !! आपके श्रीचरणों में बार-बार नमन है।
  • कृपा भिखारी
    दीन हितदास

श्रीराधा
लेखक के भावोद्गार
जाने किस अज्ञात प्रेरणा ने मुझे यह सब लिखने के लिये फिर से बाध्य
कर दिया और फल स्वरूप यह गलत-सही 'हित चौरासी' की टीका आज
लिख कर पूर्ण हुई।
'तेरे मन कछु और है कर्त्ता के कछु और,' मेरे कुछ प्रेमी वैष्णवों की
इच्छा थी कि 'श्रीराधा सुधा निधि' की ही तरह श्रीहित ध्रुवदास जी की समस्त
कृतियों का एक संग्रह ग्रन्थ प्रकाशित हो और मैं उस पर शब्दार्थ एवं आवश्यकीय
टिप्पणियाँ लिख दूँ प्रेमियों की सद्भावना के अनुसार मैंने उक्त ग्रन्थों (व्यालीस
लीला समुच्चय) पर शब्दार्थ एवं टिप्पणियाँ लिखना प्रारम्भ भी कर दिया।
कार्यरम्भ करने के कुछ ही दिनों पश्चात् अकस्मात् एक दिन 'हित चौरासी'
एवं 'सेवक वाणी' पर भी टीका टिप्पणी लिखने की भावना जागी। मैंने इस
भावना को ज्यों ज्यों रोकना प्रारम्भ किया त्यों त्यों यह बलवती होती गयी और
प्रारम्भ किए गये कार्य को शिथिल करके इसने अपना कार्य आरम्भ करा
लिया। कार्य की प्रगति कहूँ या कुछ और, न कुछ डेढ़ मास में ही 'हित चौरासी'
की टीका सम्पूर्ण लिख गयी।
ग्रन्थ तो लिख गया किन्तु मेरे मन में बार-बार आता है कि मैंने 'श्रीराधा
सुधा निधि की टीका लिखकर रसिक समाज का एक अपराध किया था, और
'हित चौरासी' पर टीका टिप्पणी लिखकर यह दूसरा अपराध है क्योंकि यह
लेखन, प्रकाशन के विचार से हुआ है, यों तो बहुत से पूर्वकालीन सन्तों ने इस
ग्रन्थ पर टीकायें लिखी हैं किन्तु उनका उद्देश्य निज रसास्वाद था, मेरी तरह
लोक ख्याति किंवा व्यापार नहीं। इसके लिये मैं उन रसिक सन्तों, आचार्यों एवं
वैष्णवों से क्षमा की भीख माँगता हूँ।
मैं इस कार्य में अपराध तो तब मानता हूँ, जब इस विहार रस वृन्दावन
विलास को शास्त्रीय शब्दों में गोपनीय स्वीकार करता हूँ और जब यह देखता
हूँ कि हमारे पूर्वज रसिकाचार्यों ने जिस वृन्दावन रस को प्रकट किया है वह

हित चौरासी • • १६
सत्यं शिवं सुन्दरम् है तो उसके मूल में एक चरम सत्य का दर्शन करता हूँ। वह
सत्य उज्ज्वल है, शान्तिपूर्ण है, कल्याणमय है और अमलात्मा मुनिजन वंदनीय
है। तब मैं निर्भय होकर एक आनन्द का अनुभव करता हूँ अपनी इस सेवा वृत्ति
के द्वारा।
अस्तु; इसी अवलम्ब को लेकर इस अल्पमति ने अपने इस लघु एवं
असफल से प्रयास में रसिकावतंस आचार्य्य वर्य गोस्वामी श्रीहित हरिवंश चन्द्र
महाप्रभुपाद द्वारा प्रकाश किये गये दिव्य एव परमोज्ज्वल शृङ्गार रस को अपनी
शक्ति भर उसके अपने यथार्थ रूप में ही ला रखने की कोशिश की है। उस
रस-प्रवाह के विशुद्ध सम्पतन में कोई विकृति न आ जाय इस भय से मैं सदा
भयभीत रहा हूँ। हित चौरासी के दिव्य पदों के भावार्थ लिखने में केवल शब्दों के
पर्याय वाची दूसरे शब्द लिखने का ही मेरा आग्रह रहा है। कहीं कहीं तो ब्रज भाषा
के प्राचीन शब्दों को वर्त्तमान खड़ी बोली का रूप देकर पंक्ति के शेष शब्द ज्यों के
त्यों रख दिये गये हैं। ऐसा करने में पद के मूल भाव की रक्षा ही लक्ष्य में रही है।
इस बात की और भी रक्षा करने के लिये मैंने भावार्थ के साथ अपना मत जो भी
कुछ लिखा है उसे [ .... ] इस कोष्ठ में रख दिया है और जहाँ कहीं मूल के शब्द
या पंक्ति के अर्थ लिखने की आवश्यकता पड़ी है, वहाँ (....) इस लघु कोष्ठ का
प्रयोग किया है। कहीं कहीं किसी शब्द, वाक्य या क्रिया के भाव को अधिक स्पष्ट
करने के लिए - शब्द, वाक्य, क्रिया - इस शैली का प्रयोग किया गया है।
सम्पूर्ण ग्रन्थ में प्रत्येक पद के पूर्व, 'अवतरण' नाम से पद के भीतर
आये हुए भावों की परिचय रूपा भूमिका सी है। यह 'अवतरण'-या पद परिचय
मेरी अपनी भावना का है। इन अवतरणों में पद के लिये जो भूमि निर्माण की
गयी है, वह एक दम ठीक ही है, मैं ऐसा दम भरने का दुस्साहस नहीं कर
सकता। इन अवतरणों को प्रत्येक व्यक्ति रस विलास सिद्धान्त का ध्यान रखते
हुए अपने भावानुसार अलग-अलग भी निर्मित कर सकता है।
दूसरी बात पदों के मूल पाठ की है। इस ग्रन्थ में प्राचीन से प्राचीन
प्रतियाँ जो मुझे मिल सकी हैं, उन्हीं से यहाँ पाठ लिया गया है। वर्त्तमान्
प्रकाशित प्रतियों में और निकट भूतकाल में लिखित प्रतियों में मूल प्रायः
अशुद्ध है; क्योंकि ब्रज-भाषा के विचार से शब्दों का जो रूप होना चाहिये

२० • • हित चौरासी

इनमें वह न होकर शुद्ध संस्कृत के अनुसार है। यह बात ब्रजभाषा के सारल्य
स्वाद और लावण्य को न्यून सी करती है, अतः मुझे ही क्यों सब भाषा मर्मज्ञों
को अनुचित ही प्रतीत होगी। ब्रजभाषा के रूप इन प्रतियों में शुद्ध होकर
संस्कृत किंवा हिंदी में किस प्रकार हुए कुछ इसके उदाहरण देखिये-

ब्रजभाषावर्तमान हिन्दी
भाँमतीभावती
प्राँनप्राण
जाँमिनीयामिनी
रमनरमण
जुद्धयुद्ध
सैनशयन
अंकअङ्क
राइराय
सुरस्वर
मंजुलमञ्जुल

– इत्यादि
यद्यपि यह शब्द रूपान्तर अर्थ रूवान्तर नहीं करता, तथापि ब्रज-वाणी
की रसात्मक धारा एवं लालित्य में अवश्य एक कण्टक है, जिसे मनीषी गण
समझ सकते हैं।
मूल पाठ में आये हुए कुछ पारिभाषिक शब्दों के अर्थ प्रसंग में जैसे
घटित हो रहे हैं उसी तरह लिखे गये हैं, इससे साहित्यिक सज्जनों को विचार
तो अवश्य होगा किन्तु इन शब्दार्थों से पद का भाव समझने में पर्याप्त सहायता
मिलेगी और वह सहायता उसी दिशा में होगी जो रसिकाचार्य्य गोस्वामी श्रीहित
हरिवंश चन्द्र की रस विहार की किंवा 'हित चौरासी' की दिशा है। पहले इन
पारिभाषिक शब्दों पर स्वतन्त्र टिप्पणियाँ लिख दूँ ऐसा मन हुआ किन्तु ग्रन्थ
का कलेवर बढ़ जाने एवं रस विहार का अत्यन्त स्पष्टीकरण हो जाने के भय
से मैने ऐसा नहीं किया।

हित चौरासी • • २१
इस नित्य विहार रस पूर्ण ग्रन्थ के प्रणेता हैं – रसिकाचार्य्य वर्य्य गोस्वामी
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभुपाद इस सम्पूर्ण ग्रन्थ में कुल चौरासी ही पद हैं,
शायद इसी से हित चौरासी नाम दिया गया है। ग्रन्थ के सम्पूर्ण पद मुक्तक हैं।
प्रत्येक पद अपने लिये स्वतंत्र है, वह दूसरे पद की अपेक्षा नहीं रखता, तथापि
सम्पूर्ण ग्रन्थ में आद्यन्त केवल एक ही विषय, परमोज्वल शृंगार-विशुद्ध वृन्दावन
रस विलास वर्णित है; यह वर्णन कितना जागृत वर्णन है, कहने की आवश्यकता
नहीं। संस्कृत साहित्य में जिस प्रकार श्रीजयदेव कविराज का गीत गोविन्द
महाकाव्य शृङ्गार रस वर्णन के सर्वोच्च सिंहासन पर आसीन है, उसी प्रकार
ब्रज भाषा साहित्य में हित चौरासी का स्थान है। काव्य के गुण, अर्थ, अनुप्रास,
उक्ति चोज, अलङ्कार, भाव व्यञ्जना, प्रसाद, शब्द माधुर्य्य, अर्थ माधुर्य्य
मौलिकता आदि गुणों में यह ग्रन्थ अपने समान आप ही है। वर्तमान् युग के
साहित्य महारथी श्रीवियोगी हरि जी “ब्रज माधुरी सार में लिखते हैं-
“भाषा में हित चौरासी एक अनुपम ग्रन्थ है। पढ़ते-पढ़ते कहीं-कहीं तो
कवि कोकिल जयदेव का स्मरण हो आता है। श्री गोसाईं जी ने ब्रज साहित्य
का भारी उपकार किया है। श्रीहितजी ने आध्यात्मिक पक्ष के अर्थानुसार
श्रीराधाकृष्ण का विशुद्ध शृङ्गार वर्णन किया है। इनका वर्णित रास विहार
प्रकृति पुरुष का एक दिव्य रहस्य कहा जाता है....।” अस्तु, उपासना और
भक्ति के क्षेत्र में श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु भगवान् श्रीकृष्ण की वंशी के
अवतार माने जाते हैं। यह वंशी साक्षात् प्रेम रूपा है अतः यह बात निर्विवाद
सिद्ध हो जाती है कि श्रीहित जी युगल किशोर श्रीराधा वल्लभ लाल के
पारस्परिक प्रेम के ही दिव्य अवतार हैं। इनकी इष्टाराध्या हैं नित्य रास रस
विहारिणी, वृन्दावन निभृत निकुञ्ज विलासिनी, नित्य नव किशोरी प्रेम प्रतिमा
श्रीराधा। अतः श्रीहित हरिवंश चन्द्र ने सर्वत्र ही अपने पद एव श्लोकों में रस
मूर्त्ति श्रीराधा के रूप, गुण, लीला, प्रभाव एवं स्वविलास आदि का ही गान
किया है, क्योंकि श्रीकृष्ण की वंशी भी तो यही सब कुछ करती है।
वंशी स्वरूप श्रीहिताचार्य्य की वाणी रसिक अनन्यों का जीवन है, वे इस
वाणी रस गान का पान करके उन्मत की भाँति गा उठते हैं-

२२ • • हित चौरासी
रास रस रचित बानीं जु प्रगटित जगत,
सुद्ध अविरुद्ध परसिद्ध जानी।
स्याम स्यामा प्रगट प्रगट अक्षर निकट,
प्रगट रस श्रवत अति मधुर बानी।।
सो जु बानीं रसिक नित्य निसिदिन रटत,
कहत अरु सुनत रस रीति जानी।
ताहि तजि और गाऊँ न कबहुँ कछू,
प्रान रमि रही (श्री) हरिवंश बानीं।।
–सेवकजी
अस्तुः श्रीहितजी की रसोपासना का साधन भी विशुद्ध प्रेम ही है। इस
प्रेम के लक्ष्य और स्वरूप हैं श्रीवन विहारी श्रीराधा और श्रीकृष्ण। इस तत्व की
उपासना करने वाले उपासक 'रसिक अनन्य' कहे जाते हैं। इन रसिक अनन्यों
का लक्ष्य मोक्षादि न होकर रस स्वरूप नित्य विहार की प्राप्ति है। नित्य विहार
में उनका स्वरूप दिव्य नव किशोरी है। इनका भाव दासी है और सुख–तत्सुख
है। हित चौरासी में इसी तत्सुख पूर्ण दासी भाव की रस धारा है। पाठकों को
इसका विशद वर्णन 'प्राक्कथन' में मिलेगा।
अन्त में इतना ही कहना अलं होगा कि यदि मेरे इस प्रयास से किसी भी
सहृदय को कुछ लाभ मिल सका तो मेरा सम्पूर्ण श्रम सफल है– मैं धन्य हूँ।
वृन्दावन – विनयावनत
कुंजगली हितदास
गुरु पूर्णिमा २००७ वि०

॥ श्रीहित राधावल्लभ ॥
प्राक्कथन
'रस' एक ऐसा विलक्षण तत्व है जो एक होकर भी अनेक रूपों में
प्रतिभासित होता रहता है। इसी लिये रस को ब्रह्म कहा गया है- रसो वै सः;
(श्रुति...)। भोजन के छः और साहित्य के नव (नौ) रस तो प्रसिद्ध ही हैं किन्तु
इनके सिवाय रस के और भी भेद प्रभेद हो सकते हैं। इसी विचार से श्रीरूप
गोस्वामी ने भक्ति को एक रस स्वीकार किया है जो साहित्य के नौ रसों से परे
है। महाप्रभु श्री हित हरिवंश चन्द्र कृत 'हित चौरासी' में जिस रस का गान
किया गया है वह भक्ति रस से अत्यन्त परे है। जिसके लिये श्रीहरिराम जी
'व्यास' ने कहा है-
नवधा लौं सब भक्ति उबीठी रति भागौत कथा की।
रहनि कहनि सबहिनु तें न्यारी 'व्यास' अनन्य सभा की॥
नवधा में अन्तिम आत्म निवेदन और श्रीमद् भागवत कथित रति-गोपी
प्रेम से भी श्रेष्ठ है रसिक अनन्यों की रहनी एवं करनी। जिस रस को धारण
करके उपासक 'रसिक अनन्य' कहलाते हैं; वह है वृन्दावन रस। यह वृन्दावन
रस सबसे विलक्षण है। इसके समक्ष धर्म अर्थ, काम, मोक्ष, योग ध्यान, धारणा,
ज्ञान कर्म सब निस्तेज हो जाते हैं।
इस 'वृन्दावन-रस' का स्वरूप क्या है ? इसके प्राकट्य-कर्त्ता आचार्य्य
कौन हैं ? इत्यादि प्रश्न पाठकों के लिये आवश्यकीय हैं; अतः इस विषय में
प्रथम हम रसिकाचार्य्य वर्य गोस्वामी श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभुपाद का
संक्षिप्त जीवन परिचय देकर फिर उनके द्वारा प्रकाशित 'श्रीवृन्दावन रस' की
चर्चा करेंगे-
रसिकाचार्य्य गोस्वामी श्रीहित हरिवंश चन्द्र का परिचय -
"श्रीराधा चरण प्रधान हृदय अति सुदृढ़ उपासी" श्रीहित हरिवंश चन्द्र
महाप्रभु पाद का यथार्थ परिचय तो भक्तमाल कार श्रीनाभा स्वामी के इस
छप्पय से मिलता है-