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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

हित चौरासी • • १५३
ज्यौं सरिता साँवन जल उमगत सनमुख सिंधु सिधारै।
ज्यौं नादहि मन दियैं कुरंगनि प्रगट पारधी मारै।।
(जै श्री) हित हरिवंश हिलग सारँग ज्यौं सलभ सरीरहि जारै।
नाइक निपुन नवल मोहन बिनु कौन अपनपौ हारै॥४२॥
भावार्थ-प्रीति किसी की मर्यादा नहीं मानती। अरे ! प्रेम से विशेष विवश
मन को किसी मार्ग कुमार्ग की ओर जाने से कौन निवारण कर सकता है ?
श्रावण मास के जल से उमङ्गे भरती हुई नदी जैसे सीधे समुद्र की ही ओर
दौड़ती है और जिस प्रकार (बहेलिये के द्वारा गाये हुए मधुर) नाद में ही मन
दिये हुए कुरङ्ग (हरिन) को बहेलिया प्रत्यक्ष रूप से मार डालता है, परन्तु फिर
भी इनको बहने और मरने से कोई निवृत्त नहीं कर सकता। उसी प्रकार शलभ
दीपक की अटक (आसक्ति) में अपने देह को भी जला डालता है, (वह भी
किसी मर्यादा को स्वीकार नहीं करता।)
श्रीहित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभु पाद) कहते हैं कि नवल मोहन जैसे निपुण
नायक (प्रेमी) के सिवाय और कौन ऐसा है जो (प्रेम में) अपना
अपनापन-स्वाभिमान भी खो दे या हार जाय।
टिप्पणी—“मारग अपमारग विथकित मन को अनुसरत निवारै?”
प्रेमी के हृदय में जब किसी के प्रति दृढ़ आसक्ति का उदय हो जाता है
तब उसके पास उचित किंवा अनुचित का प्रायः विचार विवेक नहीं रह जाता।
वह अपने प्रेमास्पद के लिये प्रेम परवश जो कुछ करता है अपनी समझ में
सर्वथा उचित ही करता है अतः उसे उस पथ पर से विचलित या निवारित
करना कठिन होता है। ऐसा प्रेमी अपने प्रेमास्पद से प्रेम करके जगत् दृष्टि
शास्त्र दृष्टि एवं शिष्ट दृष्टि से अनुचित समझे जाने वाले कार्यों को करके भी
अनुचित समझता ही नहीं। अथवा यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि उसके
पास इस उचित अनुचित के विचारा विचार के लिये न समय है न बुद्धि और
आवश्यकता ही। वह तो अपने प्रेमास्पद से इतना तल्लीन हो जाता है कि दूसरों
के द्वारा कहा गया शास्त्रोक्त किंवा सामाजिक कथन उसके लिये व्यर्थ प्रलाप
से अधिक कुछ नहीं है।

१५४ • • हित चौरासी
वह अपने जिस प्रेम पथ पर चल रहा है, उसके लिये उसका वही अपना
सुपथ है। यदि इस 'प्रेम सुपथ' के सिवाय दूसरों के द्वारा इङ्गित किया हुआ
अन्य कोई सुपथ है भी; तो उस प्रेमी को उस सुपथ की आवश्यकता नहीं। वह
अपने एकान्त हृदय में जिस प्रेम और प्रेमास्पद को पाकर सुखी है, वे दोनों
उस प्रेमी के लिये कोटि कोटि ब्रह्मानन्द से भी महान् हैं अत्युच्च हैं। तभी तो
गोपियाँ श्रीकृष्ण की मधुर मुरली की तान पर और कर-स्पर्श मात्र पर
कोटि-कोटि ब्रह्म सुख को न्यौछावर कर देती हैं। वे कह उठती हैं-
ज्यौं करतल आभास कै कोटिक ब्रह्म लखाय।
सुधि बुधि सब मुरली हरी प्रेम ठगौरी लाय॥
प्रियतम सङ्ग और मिलन के समक्ष मुक्ति भुक्ति क्या वस्तु हैं ? मानों
उनकी कोई गणना ही नहीं ! वे प्रेम वावली गोपियाँ कह उठती हैं-
जौं नहिं लहियै सजन तौ धूरि मुकति मुँह दीन।
तभी तो गोकुल की इन कुल बधुओं पर गुरुजनों की उचित शास्त्रोक्त
शिक्षा का कोई असर ही नहीं हुआ; क्योंकि वे सभी प्रेमासक्त थीं न ! कविवर
विहारीलाल ने उनका प्रेम परिचय देते हुए कहा है-
किती न गोकुल कुल बधू काहि न केहि सिख दीन।
कौन जु तजी न कुल गली, ह्रै मुरली सुरलीन॥
ठीक भी तो है। जब प्रेम देवता किसी की कानि विचारें तब न। वे तो
किसी की कुछ मानते ही नहीं। अनन्तः गोकुल की कुल बधुओं ने भी वही
किया, जो उनसे प्रेम ने कराया; क्योंकि वे बेचारी विवश थीं, अशक्त थीं।
इस पद में श्रावण सरिता, नाद मुग्ध हरिण एवं दीपक मुग्ध शलभ के
उदाहरण मूढ़ जाति के प्रेमियों के हैं। अतएव यहाँ केवल यह समझने की
आवश्यकता है कि प्रेमी विवेक शून्य होता और प्रेम पर मिटना जानता है। जिस
प्रेम में लाभ हानि विचार पूर्वक प्रेम करने की प्रेरणा है वह प्रेम नहीं है केवल प्रेम
की भ्रमात्मक छाया है, क्योंकि वह प्रेम किया गया है, स्वभावतया हुआ नहीं है
और प्रेम तो वही है जो अपने आप प्रकट हो जाय। किसी शायर ने क्या ही
अच्छा कहा है-

३. पद ५१-७०: मान-लीला, सखी-भाव एवं अनन्य रस-उपासना

हित चौरासी • • १५५
इश्क पर जोर नहीं यह वो आतिश 'गालिब'।
जो लगाये न लगे और बुझाये न बुझे॥
अहा ! क्या ही सुन्दर?
जो लगाये न लगे और बुझाये न बुझे।
तात्पर्य यह कि प्रेम साधन से प्राप्त नहीं होता, अपने आप प्रकट होता है
और प्रकट होने के पश्चात् उसका तिरोभाव भी नहीं होता। महात्मा कबीरदासजी
कहते हैं-
प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रुचै सीस देय लै जाय॥
प्रेम किसे कहते हैं ?
छिनहिं चढ़ै छिन ऊतरै, सो तो प्रेम न होय।
अघट प्रेम पिंजर बसै, प्रेम कहावै सोय॥
—कबीर
देवर्षि नारद भी अपने प्रेम दर्शन (भक्ति सूत्र) में कुछ ऐसा ही कह रहे हैं-
प्रकाशते क्वापि पात्रे
सूत्र ५३
अर्थात् 'यह प्रेम किसी विरले (योग्य) पात्र में ही प्रकट होता है।'
वह प्रेम प्रतिक्षण वर्द्धन शील है-
प्रतिक्षण वर्द्धमानम् सूक्ष्मतर सूक्ष्ममनुभव रूपम्।
—नारद भक्ति सूत्र ५४
अर्थात् 'यह प्रेम प्रत्येक क्षण बढ़ने वाला, सूक्ष्म से सूक्ष्म और अनुभव
रूप है।'
जिस किसी भाग्यशाली के हृदय में इन प्रेम भगवान् का उदय होता है
उसका हृदय उसके वश का नहीं रह जाता, वह तो सर्वथा प्रेम के अधीन हो
जाता है। वह प्रेमी नाद मुग्ध मृग एवं दीपक आसक्त शलभ की तरह अपने
प्रेमास्पद पर मर मिटने के लिये तत्पर रहता है प्रतिक्षण, प्रसन्नता पूर्वक।
प्रियतम से एकाकार होने के पूर्व जितने क्षण जुदाई के बीतते हैं वास्तव में वही

१५६ • • हित चौरासी
उसके लिये मौत के क्षण है। परवाना कहता है-
शमे को फानूस में देखा तो परवाने यूँ बोले।
क्यों जलाते हो नाहक कि हमें जलने नहीं देते।।
इस जल जाने या प्रेम पर मिट जाने की बात इन प्रेमियों से ही पूछी जा
सकती है कि उन्हें इस वलिदान में क्या सुख है ?
'कोई परवाने से पूछे कि जलने में मजा क्या है ?'
बस, यही उत्सर्ग ही प्रेमियों का जीवन है। इस प्रेम का गन्तव्य लक्ष्य है
द्वैत की सृष्टि मिटाकर प्रियतम से एक हो जाना। इस प्रेम के अद्वैत पद तक
पहुँचने के लिये प्रेमी सब कुछ कर सकता है। लोक और वेद की सुदृढ़ बेड़ियों
को वह सरलता पूर्वक तड़ातड़ तोड़ फेंकता है तब उसके मार्ग का कण्टक
कोई भी नहीं बन सकता। वह पूर्ण निष्कण्टक निरङ्कुश बनकर जिस मार्ग से
चल पड़ता है वही उसका सुपथ होता है। ऐसे ही दीवाने आशिक के लिये रसज्ञ
जन मुग्ध कण्ठ से सराहना कर उठते हैं-
कोई न पहुँचा वहाँ तक आसिक नाम अनेक।
इश्क चमन के बीच में आया मँजनू एक।।
-श्रीनागरीदासजी
और ऐसा आशिक ताज मँजनू ही परवर दिगार अल्लाह से कह भी
सकता है कि यदि हुजूर को जरूरत थी कि कैश (मँजनू) हुजूर के कदमों से
मुहब्बत करे तो हुजूरे आलम लैला बनकर इस दीवाने के सामने क्यों न आ
गये ? ख़ता मुआफ हों इसने तो अपना सब उसी एक माहरू पर निसार कर
दिया है।
धन्य है प्रेम देव ! तेरी दीवानगी !!
सचमुच कोई तेरा मार्ग नहीं रोक सकता। तभी तो तुमने अखिल लोक
चूड़ामणि निपुण नायक नवल मोहन के स्वाभिमान-अपनपै को किसी के चरणों
में चढ़ा देने के लिये वाध्य कर दिया !
अस्तु; प्रेम तो प्रेम है। उसमें ईश्वरीय और मानवीय (हकीकी और मजाजी)
का भेद व्यर्थ और बुद्धि कृत है। तभी तो इसमें चलने वाले के लिये

हित चौरासी • • १५७
'मार्ग-अपमार्ग' का भेद उठाकर श्रीहिताचार्य्य पाद प्रेमी का मार्ग प्रशस्त कर
रहे हैं।
– ४३ –
अवतरण—मानवती श्रीप्रियाजी को मना कर ले आने के लिये श्रीलालजी
अपनी निज सखी हित सजनी दूतिका से चिरौरी कर रहे हैं। किसी कारण वश
आज पुनः श्रीप्रियाजी रूठ गयी हैं; इसलिये प्रियतम उनके वियोग में अत्यन्त
व्याकुल हैं। प्रियतम सखी को अपनी प्रियतमा के समीप भेज रहे हैं; क्योंकि
उन्हें अच्छी तरह विदित है कि भले ही वे इस समय मान किये बैठी हैं पर
उनका स्वभाव कोमल है, वे भोली हैं। यही बात उन्होंने दूतिका को समझायी
है। श्रीलालजी इस पद में दूतिका से कह रहे हैं-
सारङ्ग
मूल-अति नागरि वृषभानु किसोरी।
सुनि दूतिका चपल मृगनैनी, आकरषत चितवत चित गोरी।।
श्रीफ़ल उरज कंचन सी देही, कटि केहरि गुन सिंधु झकोरी।
बैंनी भुजंग चंद्र सत वदनी, कदलि जंघ जलचर गति चोरी।।
सुनि 'हरिवंश' आजु रजनी मुख, बन मिलाइ मेरी निज जोरी।
जद्दपि मान समेत भामिनी, सुनि कत रहत भली जिय भोरी।।४३।।
भावार्थ- (श्रीलालजी ने कहा-) “हे दूतिके ! सुन; वृषभानु किशोरी अत्यन्त
चतुर है; जब वह चपल मृगलोचनि गोरी अपने मनोहर नेत्रों से अवलोकन
करती है तो मानो उसी क्षण-देखते ही चित्त का आकर्षण कर लेती है। उस
नागरी की देह प्रभा स्वर्ण की सी है तथा उरोज हैं श्रीफल की भाँति। कटि सिंह
जैसी है और (उसमें इतने गुण हैं) मानो वह गुण रूप समुद्र में अच्छी तरह
सराबोर की हुई है। उस शत शत चन्द्र जैसे मुखमयी-शत मयङ्क मुखी वेणी
क्या है; मानो भुजङ्ग ! (चिकनी-चिकनी) कदली जैसी जङ्घाएँ है और चरणों
में ऐसी गति है मानो उसने जलचर-हंस की चाल ही छीन ली है।”
हे हरिवंश दूतिके ! (ध्यान पूर्वक) सुन ! आज संध्या समय मेरी अपनी
जोड़ी (अत्यन्त अन्तरङ्ग प्रिया आत्म स्वरूपा श्रीराधा) को वन में अवश्य ही

१५८ • • हित चौरासी
मिला। यद्यपि वह भामिनि मानवती है फिर भी वह (अपने स्वभाव से) भली और
भोली है। (तेरे द्वारा मेरा निवेदन) सुन कर भी भला वह वहाँ कैसे बैठी रह
सकती है ? अवश्य आ मिलेगी।"

  • ४४ -
    अवतरण-श्रीलालजी के उक्त सन्देश को लेकर दूती नायिका श्रीराधा
    के समीप गयी और नायिका के रूप, गुण, यौवन, स्वभाव आदि की प्रशंसा
    करती हुई उसे नायक के समीप चलने के लिये प्रोत्साहित करने लगी।
    दूतिका-श्रीहित सजनी ने मानिनि नायिका श्रीप्रियाजी से कहा-
    सारङ्ग
    मूल- चलि सुंदरि बोली वृंदावन।
    कामिनि कंठ लागि किन राजहि,
    तूँ दामिनि मोंहन नौतन घन॥
    कंचुकी सुरंग विविध रँग सारी,
    नख जुग ऊन बने तरे तन।
    ये सब उचित नवल मोंहन कौं,
    श्रीफल कुच जोवन आगम धन॥
    अतिसै प्रीति हुती अंतरगत,
    (जैश्री) हित हरिवंश चली मुकुलित मन।
    निविड़ निकुंज मिले रस सागर,
    जीते सत रति राज सुरत रन॥४४॥
    भावार्थ-(दूतिका ने श्रीप्रियाजी से कहा-)"हे सुन्दरि ! चलो !! तुम्हें
    (प्रियतम ने) वृंदावन में बुलाया है। हे कामिनि ! तुम तो हो दामिनि जैसी और
    मोहन नूतन घन की भाँति। तब फिर तुम उनके कण्ठ में (घन में दामिनि की
    भाँति) लग कर क्यों नहीं शोभित होतीं ? हे प्यारी ! तुम्हारे तन पर जो यह
    सुरङ्ग कञ्चुकि, विविध रँगमयी साड़ी और सोलह शृङ्गार शोभित हैं तथा
    श्रीफल जैसे कुच मण्डल नवीन यौवन रूप धन, यह सभी कुछ नवल मोहन के
    ही लिये तो उचित है !"

हित चौरासी • • १५६
श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं कि (श्रीप्रियाजी के) हृदय में (श्रीलालजी
के लिये) अत्यन्त प्रीति थी; इसलिये प्रसन्न मन होकर (प्रियतम के निकट) चल
पड़ी और दोनों रस सागर, सघन निकुअ भवन में मिले; पश्चात् उन्होंने सुरत
युद्ध में शत शत काम देवों को जीत लिया।
टिप्पणी-
'नख जुग ऊन बने तेरे तन'
हाथ और पावों के क्रम से दस, दस के योग से सम्पूर्ण नखों की संख्या
बीस है। हाथों के नखों जुग ऊन अर्थात् दो कम कर देने से हाथ के आठ नख
और इसी प्रकार पैर के दस नखों में से जुग (=दो) ऊन (=कम) कर देने पर
आठ पैर के नख हुए इस तरह गणना सोलह (आठ+आठ) रही। "यही सोलह
हे राधे तेरे तन पर शोभित हैं।" यह कहने का भाव है कि तू सोलह शृङ्गारों से
युक्त है। इन सोलह शृङ्गारों का परिचय इस प्रकार है-
प्रथम सकल सुचि, मज्जन, अमल वास,
जावक सुदेश, केश पाश कौ सुधारिवौ।
अंग राग, भूषन विविध, मुख बास, राग;
कज्जल कलित, लोल लोचन निहारिवौ।।
बोलनि, हँसनि, चित चातुरी, चलनि चारु;
पल पल प्रति पतिव्रत प्रति पारिवौ।
'केसौदास' सविलास कहत प्रवीन राय;
यहि विधि सोरह सिंगारहू सिंगारिवौ।।
-केशवदास जी

  • ४५ -
    अवतरण-निभृत निकुअ भवन से निकल कर रसिक किशोर किशोरी
    ललित गल बहियाँ दिये मन्द मधुर गति से सखियों की ओर चले आ रहे हैं।
    साथ में ललिता आदि प्रवीण सखियाँ शोभा पा रही हैं; जिन्होंने इस युगल को
    नवीन नवीन दिव्य आभूषणों से अच्छी प्रकार सुसज्जित किया है। दर्शन करने

१६० • • हित चौरासी
वाली सखियाँ युगल की मनोहर शृङ्गार पूर्ण छवि का दर्शन करके मुग्ध हो
जाती है। तभी श्रीहित सखीजी अन्यान्य सखियों से श्रीप्रियाजी की उक्त दर्शनीय
छवि का वर्णन करती हुई, कहती हैं-
सारङ्ग
मूल-आवति श्रीवृषभानु दुलारी।
रूप रासि अति चतुर सिरोमनि अंग अंग सुकुमारी।।
प्रथम उबटि मज्जन करि सज्जित नील बरन तन सारी।
गुंथित अलक तिलक कृत सुंदर सैंदुर माँग सँवारी।।
मृगज समान नैन अंजन जुत रुचिर रेख अनुसारी।
जटित लवंग ललित नासा पर दसनावलि कृत कारी।।
श्रीफल उरज कँसूभी कंचुकि कसि ऊपर हार छवि न्यारी।
कृस कटि उदर गँभीर नाभि पुट जघन नितंबनि भारी।।
मनौं मृनाल भूषन भूषित भुज स्याम अंस पर डारी।
(जै श्री) हित हरिवंश जुगल करिनी गज विहरत वन पिय प्यारी।।
भावार्थ-(श्रीहित सखी ने कहा- हे सखियो !) अत्यन्त चतुर शिरोमणि,
रूप की राशि (अपार रूपवती) एवं अङ्ग-अङ्ग में परम सुकुमारी श्रीवृषभानु
दुलारी आ रही हैं। उन्होंने प्रथम तो उबटन पूर्वक स्नान किया है और तत्पश्चात्
अपने श्रीअङ्ग पर नील वर्ण की सारी सज्जित की है। उनकी अलक-लटें गुँथी
हुई हैं, ललाट पटल पर सुन्दर तिलक किया गया है और सिन्दूर से माँग भी
सँवारी गयी है। श्रीराधा के मृग छौने के से सुन्दर नयन अञ्जन से युक्त कजरारे
है और (उन नयनों की नोकों से आगे क्रमशः आगे बढ़ती हुई) रुचिर (कज्जल)
रेखा (नेफा) अनुसारी गयी है। सखि ! ललित नासिका पुट पर मणि-जटित
लवङ्ग (स्वर्ण पुष्प) शोभित है और दन्त पंक्ति भी (ताम्बूल, मिस्सीआदि रङ्गों से
रँगी हुई गहरी ललामी से) राग रञ्जित सी दिख रही है। कँसूभी कञ्चुकि के
द्वारा कसे हुए श्रीफल जैसे उरोजों के ऊपर लहराते हुए हारों की छवि कुछ
न्यारी (विलक्षण) ही है। अहा ! कटि तो अत्यन्त कृश (पतली) है, उदर पर
गम्भीर नाभि कुण्ड है और जघन तथा नितम्ब पुष्ट हैं-विशाल हैं।"

हित चौरासी • • १६१
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं "वृषभानु दुलारी विविध भूषणों से
भूषित अपनी कमल नाल सी कमनीय बाहु लता को श्रीश्याम सुन्दर के कन्धे
(अंस) पर डाल कर ऐसे विहार कर रही हैं जैसे कोई गज गजी-करि करिणी
युगल। हे सखि ! इस प्रकार श्रीवन में पिय प्यारी (सदा) विहार ही करते रहते हैं।"
– ४६ –
अवतरण-श्रीवृन्दावन के सघन निकुञ्ज में युगल किशोर किसी
अनिर्वचनीय एकान्त सुरत विहार में निमग्न हैं। श्रीहित सखी उसका अवलोकन
करके परम आनन्दित हो रही हैं और सखियों से वर्णन करके उस रस का
मानों प्रवाह प्रवाहित कर रही हैं-
सारङ्ग
मूल-विपिन घन कुंज रति केलि भुज मेलि रुचि,
स्याम स्यामा मिले सरद की जामिनी।
हृदै अति फूल समतूल पिय नागरी,
करिनि करि मत्त मनौ विविध गुन रामिनी॥
सरस गति हास परिहास आवेस बस,
दलित दल मदन बल कोक रस कामिनी।
(जै श्री) हित हरिवंश सुनि लाल लावन्य भिदे,
प्रिया अति सूर सुख सुरत संग्रामिनी॥४६॥
भावार्थ-(श्रीहित सहचरि ने कहा-"सखी ! आज) शरद की रात्रि में
श्रीश्याम और श्यामा वृन्दावन की सघन कुञ्ज में मिले हैं, वे परस्पर गलबहियाँ
दिये रुचि पूर्वक रति विलास की क्रीड़ा कर रहे हैं। अरी! रस विलास में
समतुल्य (बराबर) प्रियतम एवं नागरी दोनों के हृदयों में अपार प्रसन्नता है
[वे रति केलि की रुचि के कारण ऐसे प्रतीत होते हैं] मानो मत्त करि एवं
करिणि नाना प्रकार की गुण कला पूर्वक रमण कर रहे हों। (उस रति केलि में)
कामिनि (श्रीप्रियाजी) ने अपनी सरस गति, हास परिहास (प्रेम) आवेश और
कोक रस के बल से कामदेव के दल के दल (समूहों को) दलित कर दिये-मथ
डाले हैं।"

१६२ • • हित चौरासी
श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं" हे सखी ! सुन !! सुरत सुख सङ्ग्राम में
अत्यन्त शूर वीर प्रियाजी के लावण्य-अनुपम सौन्दर्य पर प्रियतम तल्लीन हो
गये-भिद गये।
– ४७ –
अवतरण-इस पद में वन विहार के अवसर पर श्रीलालजी के मन में
उत्पन्न हुए संभ्रम का वर्णन है। श्रीलालजी के मन में श्रीप्रियाजी से मिलने-
आलिङ्गन करने की तीव्र अभिलाषा जाग उठी है और प्रियाजी उनकी उस
अभिलाषा को समझ कर भी पूर्ण न करके अपितु छिपकर, झमक कर एक
प्रकार से धोखा दे रही हैं। वे वृन्दावन के पत्र पत्र, पुष्प पुष्प में अपना रूप
प्रकाशित कर देती हैं जिससे लालजी उनके यथार्थ रूप को नहीं पहचान
पाते-धोखा खा जाते हैं, तब वे सखियों के उपहास के पात्र भी बन जाते हैं
किन्तु फिर भी भेंट करने का लोभ संवरण न कर सकने के कारण वे भ्रमर का
रूप धारण करते और तब पत्र पुष्प राजित प्रिया रूप का आलिङ्गन करना
चाहते हैं...इत्यादि।
'प्रीति-विवश प्रेमी की स्थिति कैसी होती है ? इसका परिचय यही 'श्याम'
है' ऐसा सब परिकर ने स्वीकार किया। इस लीला और सिद्धान्त का पूर्ण
रसास्वाद श्रीहिताचार्य्य के श्रीवचनों से कीजिये-
सारङ्ग
मूल-वन की लीला लालहिं भावै।
पत्र प्रसून बीच प्रतिबिंबहिं नख सिख प्रिया जनावै।।
सकुच न सकत प्रकट परिरंभन अलि लंपट दुरि धावै।
संभ्रम देति कुलकि कल कामिनि रति रन कलह मचावै।।
उलटी सबै समझि नैननि में अंजन रेख बनावै।
(जै श्री) हित हरिवंश प्रीति रीति बस सजनी स्याम कहावै।।४७।।
भावार्थ-श्रीलालजी को वन की लीला बड़ी प्यारी लगती है, तभी तो
उन्हे वहाँ के फूल पत्तों पर पड़े हुए प्रति बिम्बों में भी नख सिख प्रिया रूप ही

हित चौरासी • • १६३
ज्ञात होता रहता है। वे (पत्र प्रसूनों के प्रतिबम्ब पर प्रकट प्रिया प्रतिबिम्ब को
देखकर भी) सङ्कोच वश प्रकट रूप से परिरम्भण कर नहीं सकते तब रस
लम्पट भ्रमर (अलि) का रूप धारण कर छिप छिप कर दौड़ते हैं; (उनके
श्रीमुख कमल के रस का पान करने के लिये) किन्तु सुन्दरी कामिनि (श्रीराधा)
चञ्चलता पूर्वक चमक कर उन्हें फिर फिर विशेष भ्रम में डाल देती है इस
प्रकार निरन्तर एक) रति रण का कलह मचा रही है।
श्रीहित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभु सखी रूप से अपनी सहचरियों के प्रति)
कहते हैं–"सखियो ! (आज श्याम सुन्दर की आँखे प्रिया रूप की वास्तविकता
को पहचानने में बड़ा धोखा खा रही हैं, अतः वे) अपनी सारी समझों को उलटी
(विपरीत) ही मानकर (आँखों के भ्रम को मिटाने के लिये कि जाने इनमें ही कोई
त्रटि तो नहीं है, अपनी) आँखों में अञ्जन रेखा बनाते हैं। इसी से हे सजनी
स्पष्ट है कि प्रीति-रीति वश स्याम यही (ऐसी ही भाव मग्नश्याम) कहलाता है
(कि जिसे अपने समक्ष दर्शन पर भी विश्वास न होकर भ्रम हो रहा है।")
टिप्पणी–"उलटी सबै समुझि"
इन अन्तिम दो पंक्तियों का अर्थ दूसरे प्रकार से यों भी हो सकता है–
सम्भ्रम के अवसर में सखियों न श्रीप्रिया रूप के पहिचानने में श्रीलालजी
की कोई सहायता नहीं की, अतः उन्होंने निश्चय कर लिया कि ये सब मेरे
उलटी (विपरीत) हैं और श्रीप्रियाजी की पक्षपाती हैं। इसलिये अब मेरे लिये
यही उचित है कि मैं भी अब पुरुष का रूप परित्याग करके 'सजनी' बन जाऊँ;
तो सम्भव है कि सादृश्यता के कारण इन सबके हृदय में मेरे प्रति सहानुभूति
के भाव उदय हो जायें। ऐसा विचार कर श्रीलालजी अञ्जन लगाकर तत्काल
'सजनी' बन गये।
– ४८ –
अवतरण–श्रीवृन्दावन की नित्य रास स्थली है। वहाँ रास नृत्य परायण
युगल किशोर शोभा पा रहे हैं। रास नृत्य में श्री किशोरी जी की अभूत पूर्व छवि
प्रकट हो रही है जिसका वर्णन श्रीहित सखीजी कर रही हैं अपनी सखियों से–

१६४ • • हित चौरासी
सारङ्ग
मूल-बनी वृषभानु नंदिनी आजु।
भूषन वसन विविध पहिरे तन पिय मोंहन हित साजु।।
हाव भाव लावन्य भृकुटि लट हरति जुवति जन पाजु।
ताल भेद औघर सुर सूचत नूपुर किंकिनि बाजु।।
नव निकुंज अभिराम स्याम सँग नीकौ बन्यौ समाजु।
(जै श्री) हित हरिवंश विलास् रास जुत जोरी अविचल राजु।।४८।।
भावार्थ-आज श्रीवृषभानु नन्दिनी कैसी सुन्दर बनी हैं। उन्होंने अपने
प्रियतम मोहन के लिये विविध भूषण वस्त्र सज्जित करके अपने श्रीवपु में
धारण कर रखे हैं। वे (रास में अपने) हाव भाव, लावण्य एवं भृकुटियों के नर्तन
से युवति जनों के (सौन्दर्य) अभिमान को हरण कर रही हैं। (नृत्य में) ताल,
भेद एवं अवघर स्वर की सूचना वे केवल अपने नूपुर किङ्किणियों की झनकार
(शब्द) मात्र से कर रही हैं।
श्री हित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभु) कहते हैं आज अभिराम नव निकुञ्ज में
श्याम सुन्दर के साथ (आपका) बड़ा ही सुन्दर समाज (सामञ्जस्य) बना है।
इस प्रकार यह जोड़ी (सर्वदा) रास एवं विलास से युक्त रह कर अविचल रूप
से विराज रही है-शोभित है।

  • ४९ -
    अवतरण-इस पद में श्रीहित सखी जी अपनी सखियों से युगल सरकार
    की विहार केलि का वर्णन कर रही हैं-
    सारङ्ग
    मूल- देखि सखी राधा पिय केलि।
    ये दोउ खोरि खरिक गिरि गहवर,
    विहरत कुँवर कंठ भुज मेलि।।
    ये दोउ नवल किसोर रूप निधि,
    विटप तमाल कनक मनौ बेलि।

हित चौरासी • • १६५
अधर अदन चुंबन परिरंभन,
तन पुलकित आनँद रस झेलि।।
पट बंधन कंचुकि कुच परसत,
कोप कपट निरखत कर पेलि।
(जै श्री) हित हरिवंश लाल रस लंपट,
धाइ धरत उर बीच सँकेलि।।४९।।
भावार्थ-(श्रीहित सखी ने कहा-) "हे सखी ! राधा और उनके प्रियतम
की (सम्मिलित) केलि तो देखो ! ये दोनों कुमार (श्रीवन की) गलियों, खिरक
एवं गिरि गुहाओं में गल बहियाँ दिये विहार कर रहे हैं। अरी ! ये दोनों नवल
किशोर रूप की निधि हैं। (जब ये कंठ भुज देकर मिले हुए चलते हैं तब ऐसे
दीखते हैं) मानों तमाल तरु के साथ स्वर्ण की लता लिपट रही हो।
अधर पान, चुम्बन एवं परिरम्भण के रस को झेल कर दोनों के तन
आनन्द पुलकित हो जाते हैं।"
श्रीहित हरिवंश चन्द्र कहते हैं ("जब श्रीलालजी प्यारी के) पट बन्धन,
कञ्चुकि एवं कुचों का स्पर्श करते हैं; तब प्यारी (श्रीराधा) उनकी ओर बनावटी
क्रोध की मुद्रा से देखतीं और हाथों से उन्हें दूर ढकेल-ठेल देती हैं; उस समय
रस लम्पट लाल उन्हें शीघ्रता पूर्वक सँकेल कर अपने हृदय से चिपका लेते हैं।"
– ५० –
अवतरण-रात्रि का प्रथम प्रहरान्त है। सखियों ने युगल सरकार के
शयन की वेला जानकर उन्हें निभृत निकुञ्ज भवन तक पहुँचा दिया है। निकुञ्ज
भवन में युगल किशोर अपने करों से कमनीय कोमल कमल दलों की शय्या
रचकर उसमें विराज रहे हैं। पश्चात् सुरत केलि का रस भी अवगाहन करते
हैं। जिसका वर्णन श्रीहित सजनी इस प्रकार कर रही हैं-
सारङ्ग
मूल-नवल नागरि नवल नागर किसोर मिलि,
कुंज कौंमल कमल दलनि सिज्या रची।

१६६ • • हित चौरासी
गौर स्यामल अंग रुचिर तापर मिले,
सरस मनि नील मनौं मृदुल कंचन खची॥
सुरत नीबी निबंध हेत पिय, मानिनी-
प्रिया की भुजनि में कलह मोंहन मची।
सुभग श्रीफल उरज पानि परसत, रोष-
हुंकार गर्व दृग भंगि भामिनि लची॥
कोक कोटिक रभस रहसि 'हरिवंश हित',
विविध कल माधुरी किमपि नाँहिन बची।
प्रनयमय रसिक ललितादि लोचन चषक,
पिवत मकरंद सुख रासि अंतर सची॥५०॥
भावार्थ-नवल नागरि श्रीराधा एवं नवल नागर किशोर श्याम सुन्दर
दोनों ने मिलकर कुञ्ज भवन में कमल के कोमल कोमल दलों से शय्या तैयार
की और उस शय्या पर गौर एवं श्याम रुचिराङ्ग इस प्रकार मिल गये जैसे
कोमल कञ्चन में सरस नील मणि खचित कर दी गयी हो। सुरत क्रीड़ा के
अवसर पर नीबी बन्धन का मोचन करने के लिये प्रियतम तत्पर होते हैं तब
मानिनि प्रिया की भुजाओं में (श्याम सुन्दर की बाहुओं के साथ) बड़ी ही
मनोहर कलह मचती है। (प्रियतम) प्रिया के सुभग श्रीफल से उरोजों को अपने
करों से जब स्पर्श करते हैं तब भामिनि, रोष पूर्ण हुङ्कार, गर्व एवं दृग भङ्गिमा
के साथ झुक जातीं अर्थात् अनखा जाती हैं।
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद कहते हैं कि इस ऐकान्तिक आनन्द
विलास रूप मिलन में कोटि कोटि कोक की विविध एवं सुन्दर मधुरिमाओं में
से कोई एक भी न बचीं—सभी यहाँ पूर्ण हो गयीं। प्रेम मयी रसिक ललिता आदि
सखियों ने अपने लोचनों का पान पात्र बनाकर इस रस का पान करते हुए
अपने अन्तर (हृदय) में इस सुख की मकरन्द राशि का मानों सञ्चयन करती हैं।
– ५१ –
अवतरण—श्रीलालजी की चित्तवृत्ति, श्रीप्रियाजी के अनुपम, अद्वितीय
रूप लावण्य का दर्शन करके उसी में तन्मय सी हो गयी है। अब वे अपने

हित चौरासी • • १६७
सामने निरन्तर उसी अनूप रूप को देखना चाहते हैं; इसके लिये उन्होंने
दूतिका श्रीहित अलि से अनेकों प्रार्थनाएँ भी की हैं। दूतिका श्रीप्रियाजी के
समीप आकर नुति पूर्वक प्रियतम की अभिलाषा प्रकट करती है कि—“माँगवत
लाल लाड़िलौ नागर;”
“क्या माँगता है ?”
“आपके रूप यौवन का दान-कर ।”
“क्यों ?”
“क्योंकि आपने अपने पास बहुत सी सौंज सम्पत्ति एकत्र कर रखी है ।”
“तो सखी ! उन्हें मेरी सम्पत्ति का परिचय भेद बताया किसने ?
“आप नहीं जानतीं । स्वामिनि ! आपके ही वाचाल नूपुरों ने । शरणागत हैं
न ये आपके ?”
प्रियतम के सन्देश को प्रियाजी ने सुना और वे मुस्करा गयीं ।
अस्तु; अब आप इस वचन माधुरी का आस्वादन श्रीहित अलि के श्रीवचनों
में कीजिये-
सारङ्ग
मूल-दान दै री नवल किसोरी।
माँगवत लाल लाड़िलौ नागर, प्रगट भई दिन दिन की चोरी।।।
नव नारंग कनक हीरावलि, विद्रुम सरस जलज मनि गोरी।
पूरित रस पीयूष जुगल घट, कमल कदलि खंजन की जोरी।।
तोपैं सकल सौंज दामिनि की, कत सतराति कुटिल दृग भोरी।
नूपुर रव किंकिनी पिसुन घर, ‘हित हरिवंश’ कहत नहिं थोरी।।५१।।
भावार्थ-(दूतिका ने कहा-) “हे नवल किशोरी ! लाड़िले नागर श्रीलालजी
के समीप तुम्हारी दिन दिन की चोरी (-छिपाई हुई यौवन सम्पत्ति) प्रकट हो
गयी है; वे अब (तुमसे तुम्हारी सम्पत्ति पर) दान-कर माँग रहे हैं अतः तुम उन्हें
कर दो अवश्य । तुम्हारे पास (अनेकों प्रकार की सम्पत्ति भी तो है टैक्स देने
योग्य; जैसे-) नवीन नारङ्ग कनक फल, हीरों की पंक्ति, रस मय मूँगा (विद्रुम)
मणि, जलज (मुक्ता) मणि, अमृत रस से परिपूर्ण दो दो कनक कलश, युगल

१६८ • • हित चौरासी
कमल, युगल कदलि स्तम्भ और खञ्जनों की जोड़ी। स्वामिनि ! यह सब कुछ
है भी तो तुम्हारे पास !"
श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु कहते हैं-"अरी सखी !(तू मेरी बात सुनकर)
क्यों मुझ पर टेढ़ी भृकुटि और तिरछी आँखें करके सतरा रही है ? (वास्तव में)
तेरे पास दामिनि की सम्पूर्ण सम्पत्ति (गौरता, तेज, चपलता, तरलता, प्रताप,
प्रकाश आदि) तो है भी। अहो ! इसका ढिंढोरा पीटा है तुम्हारे ही घर बसे चुगल
खोर नूपुर और किंङ्किणियों के मधुर रव ने।"
टिप्पणी-
(१) व्रज भाषा में 'दान' शब्द का प्रयोग कर या महसूल के अर्थ में हुआ
है। उक्त पद में श्रीलालजी श्रीप्रियाजी की रूप सम्पत्ति पर कर माँग रहे हैं।
श्रीकृष्ण रस राज्य के रसिक नरेश हैं, उन्होंने नूपुर रव और किङ्किणियों की
झनकार से ही श्रीप्रियाजी के गुप्त यौवन धन की सूचना पा ली, अतः तत्काल
दान की आज्ञा निकाल दी। दूतिका रूप सिपाही ने आज्ञा सुनाते समय अपनी
भी राय दी कि ठीक तो है
"तोपैं सकल सौंज दामिनि की; कत सतराति... ?"
जब तुम्हारे पास सम्पत्ति है तो फिर दान माँगने पर नाराज होने की क्या
आवश्यकता ? शायद तुम यह समझ रही होगी कि मैंने ही तुम्हारे यौवन धन का
पता उन्हें दिया है किन्तु सरकार ! बात ऐसी है नहीं। यह पता तो दिया है
आपके ही चरण सेवकों ने-इन नूपुरों ने। मैंने तो एक शब्द भी नहीं कहा।
इस पद में-
(२)
नव नारंग कनक हीरावली, विद्रुम सरस जलज मनि गोरी।
पूरित रस पीयूष जुगल घट कमल कदलि खंजन की जोरी।।
.....................सकल सौंज दामिनि की................................।
इन उपमाओं के द्वारा श्रीप्रियाजी के यौवन लावण्य और रूप की ओर
सङ्केत किया गया है किन्तु उपमेय का नाम भी नहीं है। यह शैली अन्य शैलियों

हित चौरासी • • १६६
से कुछ विलक्षण है। यह रसिक जनों की अनोखी एवं साङ्केतिक वाणी है। इस
उक्त वचन रचना से चतुर एवं रसवती नायिका, नायक के सम्पूर्ण भावों को
समझ लेती है। यही ठीक भी है कि ऐसी गोप्य शृङ्गार रस पूर्ण बातों को अधिक
स्पष्ट करके कहने में उसकी शोभा नष्ट हो जाती है। पर्दे की बातें पर्दे में ही
फबती हैं। महात्मा सूर दासजी ने भी इसी प्रकार श्रीप्रियाजी के रूप लावण्य
का वर्णन किसी दूती सखी के द्वारा प्रियतम श्रीलाल जी के समीप कराया है।
क्या ही अनूठे ढँग से सखी कह रही है।
अद्भुत एक अनुपम बाग।
जुगल कमल पर गज क्रीड़त है, तापर सिंह करत अनुराग।।
हरि पर सर वर सर पर गिरिवर, गिरि पर फूले कंज पराग।
रुचिर कपोत बसै ता ऊपर, ता ऊपर अमृत फल लाग।।
फल पर पुहुप पुहुप पर पल्लव, तापर सुक पिक मृगमद काग।
खंजन धनुष चंद्रमा ऊपर ता ऊपर इक मनिधर नाग।।
अंग अंग प्रति और और छवि, उपमा ताकौ करत न त्याग।
सूरदास प्रभु पियहु सुधा रस मानौं अधरनि के बड़ भाग।।
इस पद में श्रीप्रियाजी के नख शिख रूप का वर्णन केवल उपमाओं से ही
कर दिया गया है। इसी प्रकार इंक्यावनवें पद में भी 'नव नारंग से.......।
दामिनी की' तक वर्णन में रूप, लावण्य यौवन का ही वर्णन है जिसका
स्पष्टीकरण इस प्रकार है-
१. दान-यौवन सम्पत्ति पर कर या टैक्स।
२. नवल किशोरी-नव यौवन सम्पन्न नवोढ़ा नायिका श्रीराधा
३. लाड़िलौ नागर-धीर ललित नायक, रसिक शेखर श्रीकृष्ण, प्रियतम।
४. प्रकट भई दिन दिन की चोरी- नायिका के नव यौवन का पूर्ण
विकास हो चुका है और उसकी ख्याति भी हो चुकी है जिसका श्रवण करके
नायक श्रीलालजी पूर्ण मुग्ध हैं, प्रेमातुर हैं।
५. नव नारंग- नारङ्ग फल सदृश अरुणाभ कपोल जो अंग गौरता से
मिलकर पीतारुण हो रहे हैं।

१७० • • हित चौरासी
६. कनक—स्वर्ण जैसी देह-द्युति।
७. हीरावलि— हीरों जैसी दन्तपंक्ति।
८. विद्रुम सरस— रस पूर्ण विद्रुम (मूँगा) मणि जैसे लाल-लाल, रस
भरे अधर।
९. जलज मनि— उज्ज्वल मोतियों जैसी नख मणियों की छटा-ज्योति।
१०. पूरित रस पीयूष जुगल घट— अमृत रस से भरे दो कलश;
श्रीप्रियाजी के युगल स्तन कलश, जो रस की राशि हैं।
११. कमल—कमल पुष्प के उपमान कोमल शीतल एवं अरुणिम चरण
तल, कर तल।
१२. कदलि— कदलि स्तम्भ की भाँति सचिक्कन, रोम रहित, पुष्ट,
शीतल, मनोहर एवं सुन्दर जङ्घा।
१३. खंजन की जोरी—खञ्जन पक्षी के जैसे युगल चञ्चल, मनोहर
नयन।
१४. सकल साँज दामनि की—दामों की (मूल्यवान) जिस पर दान लेना
न्याय संगत है।
उक्त वर्णन में श्रीमुख से लेकर श्रीचरणों तक उपमाओं का यथाक्रम
सङ्केत है।
१. कहीं-२ दामिनि पाठ हैं
किन्तु श्रीप्रेमदासजी ने अपनी टीका में दामनु (द्रव्य अर्थ) किया है और
प्रसंगानुसार अधिक उपयुक्त है।
— ५२ —
अवतरण—इस पद में सर्वेश्वरी स्वामिनि श्रीराधा के अखिल विश्व वन्दित
सर्वोपरि रूप की महिमा का वर्णन लक्ष्यार्थ एवं अभूतोपमा से किया गया है।
श्रीहित सजनी अपनी सखियों से कह रही हैं—

हित चौरासी • • १७१
मलार
मूल–देखौ माई सुंदरता की सीवाँ।
ब्रज नव तरुनि कदंब नागरी, निरखि करतिं अधग्रीवाँ।।
जो कोउ कोटि कलप लगि जीवै रसना कोटिक पावै।
तऊ रुचिर वदनारबिंद की सोभा कहत न आवै।।
देव लोक भूलोक रसातल सुनि कवि कुल मति डरिये।
सहज माधुरी अंग अंग की कहि कासौँ पटतरिये।।
(जै श्री) हित हरिवंश प्रताप रूप गुन वय बल स्याम उजागर।
जाकी भ्रू विलास बस पसुरिव दिन विथकित रस सागर॥५२॥
भावार्थ–(श्रीहित सखी कहती हैं–) ‘हे सखियो ! सुन्दरता की सीमा
(श्रीराधा) को तो देखो ! जिस नागरी को देख कर समस्त व्रज की नव युवती
गण (उसकी सौन्दर्य राशि के सामने लज्जावश अपना) सिर झुका लेती हैं
अर्थात् उनके रूप के सामने अपने रूप की लघुता स्वीकार करके सिर नीचा
कर लेती हैं लजाकर। (उस अपार श्रीप्रिया रूप की शोभा का वर्णन करने के
लिये) यदि कोई कोटि कोटि कल्पों तक जीवित रहकर कोटि कोटि जिह्वायें
प्राप्त कर भी ले तो भी उस रुचि पूर्ण मुख कमल की शोभा का वर्णन वह नहीं
कर सकता (उससे वह शोभा कहते ही न आवेगी।) देवलोक, भूलोक एवं
रसातल के समस्त कवि कुल (समुदाय) की बुद्धि (उस रूप की महिमा का
वर्णन) सुन सुन कर डरती रहती है कि हम उस अङ्ग प्रत्यङ्ग के सहज माधुर्य
की उपमा दें तो दें किससे ? (अथवा श्रीहित जी कहते हैं कि जिसके वर्णन
करने में समस्त कवि कुल की मति चौंधया रही है फिर मैं ही उस रूप की
उपमा कैसे और किससे दूँ ?”)
श्रीहित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभु) कहते हैं-“श्रीश्याम सुन्दर तो प्रताप,
रूप, गुण, आयु (वय) एवं बल सभी बातों में उजागर हैं–प्रगट हैं फिर भी वे रस
समुद्र श्याम जिसकी भृकुटियों के इशारे के वशवर्त्ती पशु की भाँति निरन्तर
लाचार से रहे आते हैं, (उस रूप की सीमा–श्रीराधा–को देखो, समझो।”

१७२ • • हित चौरासी

  • ५३ -
    अवतरण-यद्यपि नारी जाति अबला है किन्तु फिर भी उसके पास एक
    'महान् बल है। वह है उसका नारीत्व। जिसके सामने बड़े बड़े बली अपना सिर
    झुका देते हैं-
    सूल कुलिस असि अँगवनिहारे। .
    ते रतिनाथ सुमन सर मारे।।
    और-
    मृगनयनी के नैन सर को अस लागि न जाहि ?
    इत्यादि वाक्य अबला की बल राशि के ही परिचायक हैं।
    श्रीराधा अनन्त शक्तिमती होने पर भी हैं तो अन्ततः शृङ्गार रस की गुण
    गण भूषिता नायिका ही न ? अतः उन्हें 'अबला' नाम से स्वीकार करना
    पड़ेगा। यह श्रीराधा अनन्त बला होकर भी अबला हैं और अबला के पास वह
    धनराशि भी है जो अति निरङ्कुश गजराज मोहन श्रीकृष्ण को भी केवल एक
    केश लट के बन्धन में सर्वदा के लिये बाँध ले सकती है।
    इस पद में उस बल राशि-अनन्त सौन्दर्य्य का वर्णन बड़ी कुशलता से
    क्रीड़ा व्याज से किया गया है-
    मलार
    मूल- देखौ माई अबला के बल रासि।
    अति गज मत्त निरंकुस मोंहन;
    निरखि बँधे लट पासि।।
    अबहीं पंगु भई मन की गति;
    बिनु उद्यम अनियास।
    तबकी कहा कहौं जब प्रिय प्रति;
    चाहति भृकुटि बिलास।।
    कच संजमन व्याज भुज दरसति;
    मुसकनि वदन विकास।