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हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

प्रकाशकीय
A Nation that forgets the glory of itspast, loses the
mainstay of its National Character. —Maxmuler
‘जो राष्ट्र अपने प्राचीन गौरव को भुला देता है, वह अपनी
राष्ट्रीयता के आधारस्तम्भ को खो बैठता है।’ इसी शाश्वत् सत्य
को लेकर यह पुस्तक लिखी गई है। राष्ट्र का इतिहास एक अमूल्य
सम्पत्ति है जिसे सुरक्षित रखने में ही देश का मंगल है। ‘हिन्दू-
पद-पादशाही’ नाम ही पुस्तक के आशय को प्रकट कर देता है।
हिन्दवी राज्य के स्थापन करने का जो सफल प्रयत्न सतरहवीं,
अठारहवीं शताब्दी में किया गया, उसी का यह चित्रण है।
✕ ✕ ✕
कालेपानी की नारकीय यातना सहन करने के बाद जब स्वा-
तन्त्र्य-वीर सावरकर जी रत्नगिरि जिले में नजरबन्द थे, उस समय
उन्होंने यह पुस्तक लिखी। पंजाब-केसरी स्व० लाला लाजपतराय
जी, ‘इंडियन एजुकेटर’ मदुरा तथा ‘इंडियन हिस्टारिकल कल्चर’
ने इस पुस्तक की मुक्त-कंठ से प्रशंसा की है। आज हिन्दू-राष्ट्र
के सामने जो काली घटाएं छाई हैं, उनको दूर कर स्वतन्त्रता के
सूर्य को फिर से देदीप्यमान करने के लिये जिन घटनाओं का
सिंहावलोकन करने की आवश्यकता है, वह इस पुस्तक में है।
आशा है यह पुस्तक अपने उद्देश्य को पूरा करेगी !
✕ ✕ ✕
यह पुस्तक श्री सावरकर जी की विशेष आज्ञा से प्रकाशित
हो रही है, अतः मैं उनका हार्दिक धन्यवाद करता हूँ।
—विश्वनाथ एम. ए.
──────────────────────────
मुद्रक—श्री विश्वनाथ एम० ए०, आर्य प्रैस लिमिटेड, लाहौर
प्रकाशक—म० राजपाल एण्ड सन्ज, अनारकली, लाहौर।

लेखक के दो शब्द
• ज्यों ज्यों समय बीतता जाता है प्राचीन इतिहास की सत्यता
की परख करना कठिन हो जाता है, परन्तु श्रीयुत् राजवाड़े आदि विद्वानों
के सतत् प्रयत्नों से महाराष्ट्र का इतिहास आज पर्याप्त रूप से स्पष्ट हो
गया है । इससे पहले तो हमें अपने इतिहास की जानकारी के लिए
केवल विदेशी इतिहासकारों की खोज पर ही आश्रित रहना पड़ता था ।
नई खोज के बहुत से काग़ज़-पत्रों और शाही दस्तावेजों के मराठी
में होने के कारण श्रीयुत् जस्टिस रानाडे के अतिरिक्त किसी भी और
विद्वान् ने महाराष्ट्र के इतिहास को ऐसी भाषा में लिखने का यत्न नहीं
किया जिससे भारतवर्ष की जनता अथवा सारा संसार महाराष्ट्र के
राष्ट्रीय आंदोलन के महत्त्व को समझ सकता । मेरे दिल में बड़ी देर से
यह इच्छा थी कि लोगों के सामने एक ऐसी पुस्तक रखी जाय जिससे
महाराष्ट्र के इस महान् आंदोलन का और क्रांति के संदेश का कुछ थोड़ा
बहुत ज्ञान हो सके । सन् १६१० में, सिखों के इतिहास को लिखने के
बाद, जो कि शुरू में क्रांति के आन्दोलन के थपेड़ों में ही कहीं नष्ट भ्रष्ट
हो गया, मैने मराठों के इतिहास को अंग्रेजी में लिखना शुरू किया ।
परन्तु उस समय कुछ ऐसे आवश्यक कर्तव्य आ पड़े जिनके कारण
जीवन के बहुत से दिन अन्डमान की निर्जन काल-कोठरियों में मृत्यु
और अन्धकार से मुठभेड़ में बीत गए और इस साधना को पूरा करने की
आशा भी जाती रही ।
अन्ततः ईश्वर को यह मन्जूर था कि मैं पुनः इस काम को हाथ
में लूं और अपने महान् पूर्वजों के प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पण करूं
जिन्होंने कि सत्राहवीं और अठारहवीं शताब्दी में बड़ी वीरता से अपनी
आन और हिन्दू-राष्ट्र की स्वतन्त्रता की रक्षा की । मैं कारागार से मुक्त
हुआ और इस पुस्तक को लिखा ।
किसी भी प्रान्तीय जागृति की, महत्ता की छाप हिन्दू-राष्ट्र के

[ ४ ]
इतिहास पर अपना प्रतिबिम्ब डाले बिना नहीं रह सकती चाहे वह
जागृति की लहर राजपूतों में उमड़ उठी हो या सिखों में, मराठों में
अथवा मद्रासियों में। एक अंग की सफलता समस्त जाति की निहित
शक्तियों की द्योतक होती है। इस दृष्टिकोण के अतिरिक्त भी मरहठों की
जागृति का आंदोलन तो प्रांतीय सीमाओं को लांघ कर 'अखिल हिन्दू
आन्दोलन' का महत्व रखता है। इसलिए इस विवेचनात्मक पुस्तक
लिखने का मुख्य उद्देश्य महाराष्ट्र के बाहर अन्य-प्रान्त-वासियों को
इस मरहठा आंदोलन का सम्पूर्ण हिन्दू-इतिहास के दृष्टिकोण से
दिग्दर्शन कराना है। अतएव इस में महाराष्ट्र के हिन्दू साम्राज्य की पूरी
कहानी तो नहीं दी गई,केवल उन मुख्य आदर्शों और उद्देश्यों का ही चित्रण
किया गया है जो इस आंदोलन के आत्मा थे।
हिन्दू-साम्राज्य के उत्थान और पतन की कहानी हमें एक महान्
संदेश देती है जो इस पुस्तक के पन्ने २ पर अंकित है। अतएव
हिन्दुओं को इस पुस्तक का विशेष परिचय कराने की कोई बड़ी
आवश्यकता नहीं।
परन्तु मुसलमान पाठकों से इस विषय में दो शब्द कहना ज़रूरी
है। इतिहासकार का यह कर्त्तव्य है कि वह अपने पात्रों की आकां-
क्षाओं, भावनाओं और कारनामों का भी यथारूप चित्रण करे। यह
तभी सम्भव है जब कि वह अपनी पहले से बनाई धारणाओं को एक
ओर रख दे और इस बात की भी परवाह न करे कि उसके इस चित्रण
से वर्तमान् के हितों पर कैसा प्रभाव पड़ेगा। वर्तमान के हितों की रक्षा
के लिए इतिहास की घटनाओं को हल्का, गहरा अथवा नकली रंग दे
देना कदापि उचित नहीं। उदाहरणतया, हज़रत मुहम्मद के जीवन को
लिखने वाला अपना कर्त्तव्य ठीक प्रकार से नहीं निभाएगा यदि वह
बुतपरस्तों और काफिरों के प्रति मुहम्मद की तीव्र चोटों को इस विचार से
चुभते ढंग से वर्णन न करे कि इससे गैर-मुसलमानों की भावनाओं को
ठेस पहुंचेगी। दूसरों की भावनाओं की रक्षा का ठीक ढंग तो यह है
कि लेखक स्वयं अन्यमतावलम्बियों के प्रति सहिष्णु हो और अपनी

[ ५ ]

रचनाओं के अन्त में अपने मतभेद और स्वतन्त्र विचार भी लिख दे ।
परन्तु इतिहास की घटनाओं को ज्यूं का त्यूं ही लिखना चाहिए । यदि
वह ऐसा न कर सके तो बेहतर है कि वह मुहम्मद का जीवन ही न
लिखने बैठे । ठीक इसी तरह उसके पाठकों का भी एक कर्त्तव्य है और
विशेषकर उन पाठकों का जिन्हें मुहम्मद की शिक्षाओं पर कोई आस्था
नहीं । पाठकों को यह भ्रान्ति नहीं होनी चाहिए कि मुहम्मद,
बावर अथवा औरंगजेब की अच्छी-बुरी आकांक्षाओं, भावनाओं और
कारनामों का यथारूप चित्रण करने वाला लेखक, आज का अच्छा
नागरिक नहीं हो सकता । सम्भवतया वह लेखक अपने देश के अन्य
धर्मावलम्बियों के प्रति बहुत उदार और सहिष्णु हो । हिन्दू इतिहास
के उस काल का वर्णन करते हुए जब कि हिन्दू, मुसलमान शक्तियों
के साथ जीवन और मरण के भीषण संघर्ष में उलझे हुए थे, हम-
एक सच्चे लेखक के आदर्श से नहीं गिरे । सभी घटनाओं के
कारणों की निष्पक्ष खोज की है और जहां तक बन पड़ा है
घटनाओं के पात्रों के भावों को उनके अपने शब्दों द्वारा ही व्यक्त
किया है । परन्तु इससे मुसलमानों को लेखक पर यह दोषारोपण
नहीं करना चाहिए कि उसके हृदय में उनके प्रति कोई द्वेषभाव है ।'
हालांकि यह इतिहास के उस भाग का विश्लेषण है जबकि मुसलमानों के
पूर्वजों के प्रति हिन्दुओं ने एक भारी आवाज़ उठाई और एक ऐसी
ज़बरदस्त टक्कर ली, जिसे लेखक न्यायपूर्ण समझता है । बीती बातों
और पुरानी शत्रुताओं के आधार पर आज भी लड़ते रहना उतना ही
हास्यास्पद है और घातक भी, जितना कि हिन्दू और मुसलमान आपस
में गले मिलते हुए केवल इसलिए एक दूसरे को मारने का दाँव करें
क्योंकि आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व शिवाजी और अफ़ज़लखान ने ऐसा
किया था ।
इतिहास का मनन इसलिये नहीं करना चाहिये कि हम पुराने
झगड़े और फ़साद को चिरस्थायी रखने के लिये कोई कारण ढूँढ
निकालें और आज भी 'मातृभूमि' या 'खुदा' के नाम पर खून की नदियाँ

६ ]
बहा सकें। इतिहास का काम तो उन मूल कारणों की खोज करना है,
जो झगड़े, फ़साद और खूंरेज़ियों को मिटाकर, मनुष्य को मनुष्य से—
जो एक ही प्रभु के पुत्र हैं और एक ही माता वसुन्धरा की गोद में
पले हैं—मिला दें, और अन्ततः सार्वभौम मानव-प्रजातन्त्र स्थापित
कर सकें।
परन्तु दूसरी ओर, इस दूरस्थ आशा की चमक से हमारी आँखें
चुंधिया कर इस सनातन सत्य को ओझल न कर दें कि इस संसार में
मनुष्य और जातियां समुदायों में बंटी हुई हैं और, युद्ध और संघर्ष की
भट्टी में से गुजर कर ही परस्पर एकरूप हो सकती हैं। जो जातियाँ इस
कठिन परीक्षा में अपनी नैतिक और शारीरिक योग्यता के बल पर
सफल होती हैं, उन्हें ही संसार में जीने का अधिकार है। अतः एकता
की दुहाई देने से पहले अपने को एक जीवित राष्ट्र की हैसियत में
खड़े देख लेना उचित होगा। इसी कठिन कसौटी पर पूरा उतरने के लिये
हिन्दुओं को मुसलमानों से भीषण संघर्ष करना पड़ा। स्वामी और
गुलाम में आदरपूर्ण मेल नहीं हो सकता। यदि हिन्दुओं ने उठकर अपनी
शक्ति का परिचय न देकर अपने पर किए गए अत्याचारों का मुंहतोड़
उत्तर न दिया होता, तो उस समय मुसलमान मित्रता का हाथ
बढ़ाते भी, तो उसमें मित्रता की अपेक्षा दया का भाव होता था! और
हिन्दू भी उसे आत्म-विश्वास, अधिकार और समानता से न ग्रहण कर
सकते थे। मित्रता समान शक्तियों में होती है। सच पूछो तो, उस
महान संघर्ष ने ही, जो कि हिन्दुओं ने देश और धर्म की रक्षा के लिये
किया, इन दो बड़ी शक्तियों में परस्पर समान मित्रता का द्वार खोल
दिया। इसी कारण अपनी पुस्तक 'सन् १८५७ का स्वातन्त्र्य-संग्राम'
में मैंने लिखा था कि हिन्दू-मुस्लिम एकता केवल उस दिन से थोड़ी
बहुत संभव होने लगी जब सन् १७६१ में हिन्दू राष्ट्र के वीरों ने दिल्ली
में विजय-पताका लहराई और मुग़लों का तख़्त, ताज और झण्डा वीर
सेनानी भाऊ और नवयुवक विश्वास राव के चरणों में टुकड़े टुकड़े हो
कर धूल में मिल गया। क्योंकि उस दिन हिन्दुओं ने अपनी खोई
हुई स्वतन्त्रता प्राप्त की और इस विश्व के रंग-मंच पर एक जीवित राष्ट्र

[ ७ ]
के रूप में खड़े रहने के अधिकार का प्रमाण दिया । उन्होंने विजेता
पर विजय पाई—और तब वह समय था जब यदि मुगल चाहता तो
देशवासी और मित्र के नाते उसे गले लगाया जा सकता था । इस
दृष्टिकोण से देखा जाय तो मरहठों का इतिहास, हिन्दू-मुस्लिम
एकता की राह में बाधक होने के स्थान पर चिरस्थायी-एकता के मार्ग
का निर्देश करता है जो कि इससे पहले दुर्गम था । इसलिये भार-
तीय इतिहास का यह स्वर्णिम समुल्लास सभी भारतीय देशभक्तों—
हिन्दुओं और मुसलमानों—के विशेष रूप से अध्ययन करने के योग्य है।
साधारण पाठकों के लिए भी स्वातन्त्र्य-संग्राम में उलझे हुए राष्ट्र
की यह गौरव-गाथा कुछ कम दिलचस्प न होगी जिसमें सुभट योद्धाओं,
दूरदर्शी राजनीतिज्ञों, साम्राज्य-निर्माताओं, सन्तों और कवियों—
शिवा जी और बाजीराओ, भाऊ साहब और जनको जी, नानाजी और
महादजी सन्त रामदास और मोरोपन्त-ने—भाग लिया ।
शिरगांव —सावरकर
१५ फरवरी १६२५

विषय-सूची
पूर्वार्द्ध
विषय पृष्ठ संख्या
१. नवीन युग ६
२. हिन्दवी स्वराज्य १३
३. शिवाजी के उत्तराधिकारी २०
४. संभा जी का धर्मार्थ बलिदान २३
५. संभा जी की मृत्यु का बदला २६
६. महाराष्ट्र मण्डल ३१
७. बाजीराव का कर्मक्षेत्र में पदार्पण ३४
८. दिल्ली की ओर प्रस्थान ४०
९. हिन्द सागर की ओर ५३
१०. नादिरशाह और बाजीराव ६६
११. नाना तथा साऊ ७५
१२. सिन्ध की ओर प्रस्थान ८७
१३. हिन्दू-पद-पादशाही ९६
१४. पानीपत १०६
१५. पराजय जिसने विजेता को भी नष्ट कर दिया १२५
१६. धर्मवीर माधवराव १३३
१७. पानीपत की लड़ाई का बदला १३८
१८. गृहकलह और सर्वप्रिय क्रांति १४७
१९. अंग्रेज़ भी झुके १६४
२०. सर्वप्रिय पेशवा-सवाई माधवराव १६८
उत्तरार्द्ध-सिंहावलोकन
१. आदर्श (महाराष्ट्र के प्रभुत्व में अखिल-भारत-हिन्दू-साम्राज्य) १
२. सबसे उत्तम मार्ग ११
३. प्राचीन और वर्तमान इतिहास के प्रकाश में सिंहावलोकन २२
४. मरहठों की नवीन युद्ध कला ३०
५. हिन्दू-जाति का काया-कल्प ३६
६. प्रेम और कृतज्ञता का ऋण ४६
७. पटाक्षेप ५३

१.
नवीन युग
"स्वधर्मराज्यवृद्धि करणें ! तुम्हीं सुपुत्र निर्माण झाला" ❀
[ शिवाजी के नाम शाह जी का पत्र ]
महाराज शिवा जी का जन्म सन् १६२७ ई० में हुआ । उन के
जन्म के कारण ही यह साल एक नये युग का प्रारंभिक काल बन गया ।
शिवा जी के जन्म से पहिले सैंकड़ों ही वीर आत्माएं, मुसलमान शत्रुओं
के आक्रमणों को रोकने के लिए तथा हिन्दू-जाति की मान रक्षा के लिए
लड़ते लड़ते अपना बलिदान दे चुकी थीं । अपने देश पर मर मिटने
वाले इन योद्धाओं की तरह, शिवा जी बड़ी वीरता से लड़ते हुए विजय-
लक्ष्मी को घर लाए । वह विजय पर विजय प्राप्त करने लगे । इस
विजय-तरंग ने सारे भारत के हिन्दुओं में नव-जीवन भर दिया । देश में
एक अपूर्व शक्ति उत्पन्न हो गई जो क्रमशः बढ़ती २ इस योग्य बन गई
कि सैंकड़ों वर्षों तक लगातार शत्रुओं पर विजय पाता रही और हिन्दू-
धर्म-ध्वजा उन्नति के उच्चतम शिखर पर लहराती रही ।
महमूद गज़नवी के आक्रमण से लेकर यवनों की विजय-लहर
इतने प्रबल वेग से बही कि उस का कोई मुक़ाबला न कर सका । यह
लहर तब तक बढ़ती गई जब तक कि सारा भारत उस में विलीन न हो
गया । शिवा जी सर्व प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने विधर्मियों की इस विजय-
लहर से अपना सिर ऊपर निकाला और इस लहर को दृढ़ता पूर्वक
संबोधित करते हुए कहा--'बस जहां तक तुम्हें चढ़ना था तुम बढ़ चुकी
अब और आगे नहीं बढ़ सकती' । शिवा जी के राजनैतिक रंगमंच पर
प्रकट होने से पहले--अर्थात् सन् १६२७ से पहले हिमालय से ले कर
❀ मेरे सुपुत्र ! तुम्हारा जन्म अपने धर्म और राज्य की वृद्धि के
लिए ही हुआ है ।

[ १० ]

समुद्र पर्यन्त जहाँ कहीं हिन्दू और मुसलमान सेनाओं में मुठभेड़ हुई
वहां हार हिन्दुओं को ही हुई। हिन्दुओं की यह पराजय कभी उन के
नेता के सहसा गुम हो जाने या मर जाने के कारण होती थी, अथवा
कहीं कभी किसी मंत्री अथवा किसी सेनापति के विश्वासघात के कारण।
इस प्रकार जब कभी दोटूक युद्ध आरंभ होता तभी वह हिन्दुओं के लिए
दुर्भाग्य का कारण ही सिद्ध होता। दाहर के दुर्भाग्य, जयपाल के युद्धों,
अनंगपाल की दृढ़ता, पृथिवीराज की अवनति तथा कालिंजर, सांकरी
अथवा तालीकोटा की घटनाओं को स्मृतिपट पर लाने से ऊपर कहे हुए
तथ्य की सत्यता प्रकट हो जाती है। पर जब शिवा जी ने हमारी जाति
के भाग्य को अपने हाथ में लिया तो उस का पासा ही पलट दिया।
जो बुरे दिन हिन्दुओं को देखने पड़ते थे वे अब विधर्मियों के सामने आने
लगे। इस के पश्चात् हिन्दुओं की ध्वजा को फिर कभी यवनों के हलाली
परचम के आगे झुकना नहीं पड़ा।
सन् १६०७ के बाद, हिमालय से लेकर समुद्र तक, जहां कहीं
हिन्दुओं को मुसलमानों के साथ युद्ध करना पड़ा, वहीं हिन्दू
विजयी रहे और मुसलमानों को सदा मुंह की खानी पड़ी, यद्यपि उन
की शक्ति हिन्दुओं से दुगुनी-चौगुनी होती थी, और 'उनके अल्ला हो
अकबर'-'ईश्वर विजयी हो'-के नारों से आकाश भी गूंज उठता था।
इस में कोई सन्देह नहीं कि विजय ईश्वर की ही हुई, पर अब की बार
ईश्वर हिन्दुओं का था। सन् १६२७ के पश्चात् ईश्वर हिन्दुओं की ओर
सम्मिलित हो गया था-उन हिन्दुओं की ओर जो कि मूर्ति-पूजक थे।
अब वह मूर्ति-तोड़ों को घृणा की दृष्टि से देखने लग गया था। इस
तथ्य की सत्यता भी सिंहगढ़ की विजय और पावनखण्ड की रक्षा की
घटनाओं तथा गुरु गोविन्दसिंह, बंदा बहादुर, छत्रसाल, बाजीरावों,
नानासाहिव, भाऊजी, मल्हाररावों, परशुराम पन्त, रणजीतसिंह और
अन्य असंख्य मरहठा, राजपूत और सिख सेनापतियों के जीवन-चरित्रों

[ ११ ]

पर, विचार करने से प्रमाणित हो जाती है जिन्होंने कि यवनों को,
जहाँ और जब कभी उन से टक्कर लगी, हरा कर भगा दिया था।
हिन्दुओं के राजनैतिक क्षेत्र में सहसा इस महत्वपूर्ण तथा विजयपूर्ण
परिवर्तन के दो मूल कारण थे—एक तो यह कि शिवाजी और उनके
पूज्यपाद गुरु मद्ज्ञानी रामदास जी जैसी महान् आत्माओं ने हिन्दू-
जाति के सामने उन के आध्यात्मिक तथा जातीय उच्च आदर्श को युक्ति
पूर्वक रखा, दूसरे उन्होंने नवीन युद्धकला तथा नये २ अस्त्र-शस्त्रों का
आविष्कार किया। सचमुच ही मरहठों की यह नवीन युद्धकला युद्ध-
विज्ञान में एक नया आविष्कार ही था। उम समय यह हिन्दुओं में बहुत
प्रचलित हो गई क्योंकि महाराष्ट्र धर्म एक नवीन शक्ति थी जो कि उस
समय हिन्दू जाति की राजनैतिक जीवन की नष्ट होती हुई आत्मा में
नवजीवन का संचार कर रही थी।

यह हिन्दू-पद-पादशाही—अर्थात् स्वतन्त्र हिन्दू-साम्राज्य की
स्थापना—का उच्च आदर्श ही था जिस ने कि हिन्दू स्वतन्त्रता के लिए लड़ने
वाले नेताओं को दृढ़ विश्वास के साथ उभारा और उन में अपार शक्ति भर
दी। साथ ही मरहठों ने युद्ध के नये और विस्मयजनक ढंग—
गुरेला युद्ध कला—से मुसलमानों को दंग कर दिया। इस नवीन युद्ध-
कला के सामने यवन न ठहर सके। इस प्रकार उन्होंने मुसलमानों पर
अपनी वीरता से विजय प्राप्त करके हिन्दू जाति के मस्तक को पुनः
विजय तिलक से सुशोभित कर दिया।

इतना ही नहीं, आगे चल कर हम देखेंगे कि उन के इस उच्च ध्येय
ने मरहठों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रयत्नशील बनाया, उन्हें प्रोत्साहित
किया, उनकी बिखरी हुई शक्तियों को एकत्रित किया, उन का उद्देश्य एक
बनाया तथा उनके हित भी मुशतरका बना दिये, जिस से वे अनुभव
करने लगे कि उन लोगों का मनोरथ न तो व्यक्तिगत है और न केवल
प्रांतीय, वरन् यह एक धार्मिक तथा सार्वदेशिक कार्य है, जो साधु से लेकर

[ १२ ]

एक सिपाही तक का मुख्य कर्त्तव्य होना चाहिये। उसी मनोरथ और
उत्साह से मरहठे विजय पर विजय प्राप्त करते हुए दिल्ली के फाटक तक
ही नहीं, वरन् सिंध के किनारे तक तथा दक्षिण में समुद्र तक पहुँच गये।
जिन का एकमात्र लक्ष्य भारत में एक विशाल हिन्दू साम्राज्य एवं हिंदु-
पद-पादशाही स्थापित करना था, उन के किये हुए अमानुषीक कार्यों की
कथाओं से वीररस प्रधान एक महा काव्य बन गया, जिसे हिन्दू माताएं
अपने बच्चों को उन गीतों के स्थान पर सुना सकती हैं, जो कुछ समय
पहले हमारे अधःपतन तथा हमारे ऊपर शत्रुओं के विजय प्राप्त करने की
याद दिलाती थीं।
हां, तो शिवा जी का सन् १६२७ में जन्म हुआ। उन के सम-
कालीन इतिहासकारों का कथन है कि ज्यों २ शिवा जी की आयु बढ़ती
गई त्यों २ वे हिन्दू जाति की परतन्त्रता अनुभव कर के विशेष दुखी
होते गये। जब वे यवनों द्वारा हिन्दू-देवी देवताओं के मन्दिरों के नष्ट
किये जाने तथा अपने पूर्वजों की यादगारों के अपमानित तथा अपवित्र
किये जाने के विषय में सोचते थे तो उन का हृदय विदीर्ण हो जाता था।
उन की वीर माता जीजाबाई ने बाल्यावस्था में ही उन का हृदय,
हिन्दू जाति के गौरव तथा नरपुङ्गव श्री राम, कृष्ण, अर्जुन, भीम,
अभिमन्यु तथा सत्यवादी हरिश्चन्द्र की सत्कीर्त्तियों से भर दिया था,
फलतः उनके हृदय-गगन में उसी प्रकार के उत्साह तथा आशा के बादल
मंडराने लगे।
प्रत्येक आस्तिक के मुख से—जिसका कि देवी-देवताओं के प्रति
विश्वास था और जिसके हृदय में कृष्ण भगवान् की अटल प्रतिज्ञा सदा
गूंजती रहती थी कि वे उन से कभी विमुख न होंगे-यह बात निकलती थी
कि हिंदु संसार की रक्षा के लिए कोई उद्धारक अवश्य अवतीर्ण होगा।
शिवाजी के कुटुम्ब की इसी परम्परागत धारणा ने उनके हृदय में इस बात
का विश्वास भर दिया कि यह मेरा ही कुल है जिसको ऐसे राष्ट्र-उद्धारक

[ १४ ]
उनके उत्तर में शिवा जी ने इस अभियोग को अस्वीकार
करते हुए लिखा कि वह बीजापुर के शाह के प्रति विद्रोही नहीं है और
उसे अपने कर्त्तव्य का स्मरण कराते हुए लिखा था कि उन्होंने केवल
ईश्वर के प्रति अपने विश्वास की दृढ़ प्रतिज्ञा की थी न कि किसी शाह के
प्रति। धर्म पर किसी राजा का अधिकार नहीं है। क्या आपने अपने
संरक्षक दादा जी तथा मित्रमण्डल के साथ सह्याद्रि पर्वत के शिखर
पर ईश्वर को साक्षी देकर यह शपथ न ली थी, कि हिन्दुस्तान में एक
हिन्दू-पद-पादशाही स्थापित करने के लिये हम लोग प्राणपण से अंत
तक लड़ेंगे ? इस समय परमात्मा की हम लोगों पर कृपा है और
परमात्म अवश्य सफल होंगे।
शिवाजी की पवित्र लेखनी से निकले हुए “हिन्दवी स्वराज्य” के
शब्दों ने इस धार्मिक आन्दोलन के ध्येय को जितना भली भांति प्रकट
किया उतना अन्य कोई वस्तु स्पष्ट नहीं कर सकती थी। इस आंदोलन
ने महाराष्ट्र-देशवासियों के जीवन और कार्य को सौ से अधिक वर्षों तक
प्रोत्साहित किये रखा।
मरहठों का यह आंदोलन प्रारम्भिक काल से ही व्यक्तिगत अथवा
प्रान्तीय आंदोलन न था, वरन् यह तो भारत के सारे हिन्दुओं का अपने
धर्म तथा स्वत्व की रक्षा करने और भारतवर्ष से विधर्मियों के राज्य को
नष्ट करके एक दृढ़ सुविशाल स्वतन्त्र हिन्दू साम्राज्य स्थापित करने के
लिये एक आन्दोलन था।
देशभक्ति के इस भाव से केवल शिवाजी ही प्रोत्साहित न हुए थे
वरन् उनके सारे मित्रों तथा महाराष्ट्र वासियों के हृदय में भी किसी न-
किसी अंश में अवश्य यह प्रोत्साहन पाया जाता था। उनके हृदय को
भी वह उतना ही प्रोत्साहित कर रहा था जितना कि शिवाजी के मन को,
यही कारण है कि शिवाजी जहां भी पधारते थे उनका स्वागत एक प्रसिद्ध
देशोद्धारक के रूप में श्रद्धापूर्वक किया जाता था।

[ १५ ]

कुछ लोग अभी तक भी मुसलमानों का साथ दे रहे थे और उनके
पक्षपाती बने हुए थे, इसके कई कारण थे—(१) कई व्यक्तियों के हृदयों
में मुसलमानों की धाक जमी हुई थी, उनका यह विचार था कि इस
बादशाही के सामने मरहठों का आन्दोलन कभी सफल नहीं हो सकता
(२) कुछ मिथ्याभिमानी तथा बहुत विचारवान् लोग शिवाजी जैसे
अनुभवहीन नवयुवक नेता की अध्यक्षता में काम करना अपनी अप्रतिष्ठा
समझते थे तथा (३) कुछ ऐसे भी स्वार्थी लोग विद्यमान थे, जिन्होंने व्यक्ति-
गत स्वार्थपूर्ति के लिये यवनराज्य का चिरस्थायी रहना ही परमावश्यक
समझ रक्खा था।
शिवाजी महाराज उस समय केवल महाराष्ट्रवासियों के ही प्रमुख
नायक न थे, वरन् वे सारे दक्षिण और उत्तरी भारतवर्ष के हिन्दुओं के
मनोरथ पूर्ण करने वाले शूरवीर अगुवा समझे जाते थे। लोगों का यह
दृढ़ विश्वास था कि एक दिन ऐसा आयेगा जब कि यही महावीर हिन्दू-
जाति तथा भारतवर्ष को स्वतन्त्र करने के यश को प्राप्त करेंगे।
उस समय का इतिहास और साहित्य, ऐसी बहुत-सी घटनाओं
तथा गद्यांशों से भरा पड़ा है, जिनके पढ़ने से यह पता लगता है कि लोग
शिवाजी, महात्मा रामदासजी तथा उनके वंशजों को, उनके उद्देश्यों और
कार्यों के कारण, अत्यन्त श्रद्धा और भक्ति की दृष्टि से देखते थे। सारे
प्रान्तों और नगरों के लोगों की यह प्रबल इच्छा थी, और वह इस बात
जोर भी देते थे, कि मरहठा सेना शिवाजी के नेतृत्व में उनके हां आये;
तथा वे उस शुभ दिनकी प्रतीक्षा में रहते थे कि कब मुसलमानों
झण्डे को फाड़ कर उस की जगह महाराष्ट्र की पवित्र गेरुवा विजयध्वजा
चढ़ती हुई दिखाई दे।
इस कथन को प्रमाणित करने के लिए हम "सवनूर" निवासी
हिन्दुओं का शिवाजी के नाम भेजे हुए हृदयविदारक पत्र का दृष्टान्त देते
हैं। यह पत्र उन्होंने उस समय शिवाजी को भेजा था जब कि उस प्रांत के

[ १६ ]

हिंदु यवनों के शासन को अधिक काल के लिए सहन न कर सके। इस
पत्र में उन लोगों ने धर्मान्ध, अन्यायी यवनों के शासन का रोमाञ्चकारी
नग्न चित्र खींचते हुए लिखा था -- "हम लोग विधर्मियों के निर्दयी राज्य
से अत्यन्त पीड़ित हैं, धर्म नित्य पैरों तले कुचला जा रहा है, और हमारा
धर्म मिट्टी में मिलाया जा रहा है। इसलिये हे हिन्दू-धर्म के रक्षक !
दुष्टों का दमन करने वाले ! विदेशी राज्य को धूल में मिलाने वाले
शिवाजी महाराज ! आइये, शीघ्र आइये; हम लोग इस समय सेनापति
यूसुफ तथा उनकी सेना के अधीन हैं। हमारा धन जन उन्ही के हाथ में
है। इसने हमें अपने ही घरों में कैदी बना रखा है। द्वार पर कठिन
पहरा बिठा दिया है। हमारा अन्न जल रोक कर यह हमें भूखों मारने का
प्रयत्न कर रहा है। इसको मालूम हो गया है कि हम लोग आपसे
सहानुभूति रखते हैं और आपके बुलाने के लिये षड्यन्त्र रच रहे हैं।
इसलिये हम दीन हिन्दुओं पर दया कर, रात को दिन समझें, और
जितना शीघ्र होसके आकर हमें काल के गाल से छुड़ाने की कृपा करें।"
महाराष्ट्र की सीमा के बाहर वाले हिन्दुओं के आर्त्तनाद ने
शिवाजी के हृदय पर कैसा प्रभाव डाला, यह लिखना व्यर्थ है, क्योंकि
जिनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य ही हिन्दू-धर्म की रक्षा करना था, वे
भला ऐसे अवसर पर कैसे विलम्ब कर सकते थे ! शीघ्र ही मरहटों का
प्रसिद्ध सेनापति "हम्भीरराव" अपनी सेना लेकर वहां जा पहुंचा और
उसने बीजापुर की यवन सेना को कई युद्धस्थलों पर पूर्ण रूप से पराजित
किया और हिन्दुओं को मुसलमान अन्याथियों के चंगुल से छुड़ा कर उस
प्रान्त को म्लेच्छ शासन से मुक्त करा दिया।
पूना और सूपा की छोटी जागीरों का उचित प्रबन्ध करके, तथा
अपने बारह मावलों (जिलों) को पूर्ण रूप से संगठित करने के
अनन्तर, शिवाजी ने लगभग १६ वर्ष की अवस्था में अपने कुछ चुने-
हुए प्रमुख वीरों की सहायता से उस प्रान्त के तोराना और दूसरे प्रसिद्ध

[ १७ ]

२ किलों पर अचानक चढ़ाई कर दी और बड़ी वीरता और निपुणता के
साथ लड़ कर उन्हें हस्तगत कर लिया। बीजापुर की सेना पर—जो कि
सेनापति अफ़ज़लखां की अध्यक्षता में लड़ रही थी—भली प्रकार दोहरी
विजय पा कर मुग़लों का खुल्लमखुल्ला सामना करना आरम्भ कर दिया।
शिवाजी अपनी चतुराई से कभी पीछे हटने और कभी अचानक
शत्रुओं पर चढ़ आते थे। इस प्रकार अनेक मुग़ल सरदारों और
सेनापतियों का दमन कर उन्हें लड़ाई में सब प्रकार से नीचा दिखा कर
पीछे हटाते रहे। इस प्रकार शत्रुओं के दिल में इतना भय समा गया कि
शाहंशाह औरङ्गज़ेब ने भी भयभीत होकर थोड़े काल के लिये युद्ध बन्द
करने में ही अपनी बुद्धिमानी समझी और अपने अजयशत्रु शिवाजी को
प्रलोभनादि द्वारा जाल में फंसाने का निश्चय किया। परन्तु शिवाजी
औरङ्गज़ेब के कपटजाल में कब आने वाले थे ? उन्होंने शत्रु के कपट
जाल को तोड़ दिया और उसकी आशा को सब प्रकार निराशा में पलट
दिया अर्थात् आगरे के क़ैदख़ाने से बिना किसी हानि उठाये निकल भागे,
और सकुशल रायगढ़ पहुंच कर मुग़लों से पुनः घोर लड़ाई छेड़ दी।
शिवाजी ने सिंहनाद के दुर्ग को पुनः हस्तगत कर लिया। कई अन्य
सेनापतियों ने भी मुसलमानों के छक्के छुड़ा कर यश प्राप्त किया। अन्त
में शिवाजी ने अपना राज्याभिषेक करा कर हिन्दुओं का छत्रपति—अर्थात्
हिन्दूधर्म और सभ्यता का अभिनेता—बनने में ही अपना हित समझा।
विजयनगर के पतन के पश्चात् किसी भी हिन्दू-राजा को यह साहस
न हुआ था कि वह स्वतन्त्र-छत्रपति के मुकुट से अपने सिर को पुनः
सुशोभित करे। अब शिवाजी के नवीन राज्याभिषेक ने मुसलमानी धाक
को समूल नष्ट कर दिया। इसके पश्चात् होने वाली किसी भी लड़ाई में
मुसलमान हिन्दुओं का सामना न कर सके।
उपरोक्त घटनायें स्वयम् उनके कार्यकर्त्ताओं के लिये भी आश्चर्य
जनक थीं। उस समय के सब से प्रतिष्ठित और हिन्दू-धर्म की स्वतन्त्रता

[ १८ ]
के भविष्यवक्ता, पूज्यपाद स्वामी रामदास जी बड़ी प्रसन्नता तथा गौरव
के साथ एक स्वप्न के सम्बन्ध में कहते हैं, "कि जो कुछ मैंने स्वप्नावस्था
में देखा था उसकी पूर्ति पहले ही हो गई थी। जिस स्वप्न को मैंने अन्ध-
कारपूर्ण रात्रि में देखा था वह •अक्षरशः सत्य निकला, अर्थात् भारत
की निद्रा भङ्ग हुई, लोग अपने आपको पहचानने लगे। जो भारत से
घृणा करते थे तथा ईश्वर के प्रति अपराध करते थे उनको दृढ़ हाथों से
कुचल दिया गया। सचमुच भारत पवित्र और भाग्यशाली देश है।
क्योंकि भारत के ध्येय को परमात्मा ने अपना ध्येय बना लिया है, इस
लिये औरङ्गज़ेब का पतन हो जायगा। जो लोग सिंहासन पर विराजते
थे वे पदच्युत हो गये और जो किसी समय राज्यसिंहासन से उतारे
गये थे पुनः सुशोभित हो गये। मनुष्यों का श्रेय, शब्दों की अपेक्षा उनके
कर्त्तव्यों से भलीभांति विदित होता है। सचमुच भारतवर्ष एक पवित्र
पुण्यक्षेत्र है, इसके धर्म की रक्षा अब राजधर्म से होगी। अब राक्षसी-
शक्ति द्वारा देश का पावन जल अपवित्र नहीं होता रहेगा और एक बार
पुनः इस पुण्य भूमि पर हमें यज्ञ पूजनादि कार्य करने का सौभाग्य प्राप्त
होगा।" यह धर्मयुद्ध परमात्मा के नाम पर आरम्भ किया गया था। इस
उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए जब महाराज शिवाजी एक स्वतन्त्रराज्य को
स्थापित करने में फलीभूत हुए तो उन्होंने इस ईश्वरदत्त राज्य को अपने
आध्यात्मिक तथा राजनैतिक पथप्रदर्शक गुरु स्वामी रामदासजी के चरणों
श्रद्धापूर्वक भेंट के रूप में अर्पण किया। किन्तु स्वामी जी ने भी उसी
य को स्मरण कर उक्त राज्य अपने सुयोग्य शिष्य शिवाजी को मनुष्य-
ति के उपकार तथा ईश्वरीय धर्म की रक्षार्थेतु प्रसादरूप में निछावर
किया और कहा—
राज्य शिवाजी चें नव्हे—राज्य धर्माचें आहे। 🌼
महाराज शिवाजी से लेकर बाजीराव तक कर्मवीर मरहठों के
🌼 राज्य शिवा जी का नहीं है, किन्तु धर्म का है।

[ १६ ]
प्रति सारे भारतवर्ष के हिन्दुओं की जैसी श्रद्धा थी और उनके किये
पर जितना वे अपना गौरव समझते थे वह "छत्र-प्रकाश" नामक ...
पूर्ण ग्रन्थ के पढ़ने से स्पष्ट विदित हो जाता है, यद्यपि इसका
बुन्देलखण्ड-बासी हिन्दू था। एवं राजकवि "भूषण" ने भी महार...
शिवाजी की वीरता का वर्णन जिस ओजस्विनी कविता में किया है ...
से स्पष्ट प्रकट होता है कि उपरोक्त कविगण महाराष्ट्र के रहने वाले
होकर भी उनके चरणों में कैसी भक्ति रखते थे। इतना ही नहीं,
कवि तो महाराज शिवाजी के कर्त्तव्यों को भावपूर्ण कविता में
घूम-घूम कर हिन्दू जाति को जगाते फिरते थे और उनके हृदयों में ...
जी के प्रति यह भाव उत्पन्न करते थे कि महाराज शिवाजी हिन्दूधर्म
रक्षक हैं। इसी कारण से उनके पवित्र कर्त्तव्यों को सारे भारतवासी
श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे। स्थानाभाव से केवल एक आध ...
उदाहरणार्थ लेखनीबद्ध की जाती है।
कासीहू की कला जाती, मथुरा मसीत होती,
शिवाजी न होतो तो, सुनति होत सबकी॥
राखी हिन्दुवानी हिन्दुवान को तिलक राख्यो,
स्मृति और पुराण राखे वेद-विधि सुनी मैं॥
राखी रजपूती राजधानी राखी राजन की,
धरा में धरम राख्यो, राख्यो गुन गुनी में॥
"भूषण" सुकवि जीति हद मरहट्टन की,
देश-देश कीरति बखानी तब सुनी मैं॥
साहि के सपूत सिवराज समशेर तेरी,
दिल्ली दल दारिके दिवाल राखी दुनी मैं॥
इस प्रकार हिंदू धर्म और हिंदु-पद-पादशाही के नाम पर ...
पैदा करने वाला आह्वान और युद्ध-संगीत जो महाराष्ट्रीय हुंदु...
निकला वह सह्याद्रि पर्वत की चोटी से निकल कर सारे भारतवर्ष

[ २० ]
न्दुओ के हृदय में भर गया, जिससे उनका हृदय उत्साह से उछलने
ा। परिणामतः वे अनुभव करने लगे कि जिस अभिप्राय से मरहठे
इकर प्राण निछावर कर रहे हैं उसका अस्तित्व केवल भारत और
गतवासियों को विदेशियों के दासत्व से मुक्त कराने के लिए ही है।
———
३.
शिवाजी के उत्तराधिकारी
सन् १६८० ईस्वी में महाराज शिवाजी का और १६८१ ई० में
हात्मा रामदासजी का देहान्त होगया। यद्यपि इन लोगों ने अपने
वनकाल में "हिन्दू-पद-पादशाही" के लिये घोर परिश्रम करके बहुत
क्र प्राप्त कर लिया था तथापि अभी तक उससे भी अधिक बहुत कुछ प्राप्त
ने के लिये शेष पड़ा था। ऐसे अवसर पर उन लोगों की मृत्यु इस
न्दोलन के लिये बड़ी ही हानिकारक थी। जो हो, "ईश्वरेच्छा
रीयसी !!"
यद्यपि उन महापुरुषों के सांसारिक जीवन का अन्त हो गया
ापि इन्होंने जिस आन्दोलन को सारे भारत में प्रचलित किया था
का अन्त किसी भी अंश में न होने पाया, क्योंकि इस आन्दोलन
आधार किसी व्यक्तिविशेष के जीवन पर अवलंबित न था, वरन्
की जड़ें राष्ट्रजीवन के गर्भ में गड़ चुकी थीं। यह मरहठों के
तहास की एक महत्वपूर्ण विशेषता है, जिसे हम उन पाठकों के चित्त
अङ्कित करने का प्रयत्न कर रहे हैं, जो महाराष्ट्र प्रान्त निवासी नहीं
। महाराज शिवाजी तथा उनके पूज्य गुरु स्वामी रामदास जी के
वनचरित को प्रायः सारे भारतवासी कुछ-न-कुछ अवश्य ही जानते
· पर महाराष्ट्र के इतिहास के पिछले भाग से पूर्णतया अनभिज्ञ
और यदि किसी अंश में कुछ जानते भी हैं तो उसे निराधार तथा

अनिश्चित समझते हैं। साधारणतः भारतवर्ष या हिन्दू इतिहास पढ़ने
वाले यही अनुभव करते हैं कि शिवाजी तथा रामदास ही पहले और
आख़िरी मरहठा देश-भक्त हुए हैं, जिनका मनशा भारत में "हिन्दू-पद-
पादशाही" स्थापित करने का था, और जिन्होंने कि हिन्दुत्व के लिये
बडी शूरता, वीरता तथा अपने अपूर्व साहस का परिचय दिया था।
इतना ही नहीं, अपितु महाराष्ट्र के सम्बन्ध में लोगों की यह धारणा
दिखाई पड़ती है कि जहां महाराज शिवाजी के प्रादुर्भाव के साथ
महाराष्ट्र का इतिहास प्रारम्भ हुआ वहा इनके निधन के साथ ही उस
आन्दोलन की इतिश्री भी हो गई । और उनके पश्चात् जो कुछ हुआ
एक अशान्ति का समय था, अथवा स्वार्थांध और आचार भ्रष्ट लोग
लुटेरों का दल बनाकर इधर-उधर लोगों पर आक्रमण करते हुए देश का
सत्यानाश करते रहे। ये दोनों ही कल्पनाएं नितात ही असत्य हैं।
तथ्य तो यह है कि शिवाजी तथा रामदास की बड़ाई तो इसी बात में
निहित है कि उन का वह आन्दोलन उन की मृत्यु के पश्चात् भी न
केवल बहुत काल तक जीवित ही रहा, वरन् उनके पश्चात् भी उस में
फाल्श सैकड़ों ही महाराष्ट्र के सुयोग्य देशभक्त, व्यवस्थापक और देश
पर प्राणों की आहुति चढ़ाने वाले शूरवीर सरदार एक न टूटने वाले
क्रम में पैदा होते रहे। वे उसी उद्देश्य के लिए अपने पूर्ण बल से लड़ते हुए
हिन्दू-पद-पादशाही के लक्ष्य की ओर बढ़ते गये और उन्होंने ऐसे ऐसे
परिणाम प्राप्त किये जिन्हें देखकर शिवाजी महाराज भी चकित होते।
जिस समय शिवाजी का राज्याभिषेक हुआ था उस समय उनके अधिकार
में मुशकिल से एक प्रान्त था, इस पर भी उस समय यह एक बड़े गौरव
की बात समझी गई थी। यदि ध्यानपूर्वक देखा जाय तो वास्तविक
महाराष्ट्र का तब स्थित हुआ जब कि महाराज शिवाजी के उत्तराधिकारी
राघुवा दादाजी के आधिपत्य में, पञ्जाब की राजधानी लाहौर में
से प्रविष्ट हुए, और फिर जब उनके बहादुर घोडे उछलते-कूदते

[Page 22]

टापों से धूल उड़ाते, विजय प्राप्त करते, सिन्ध के किनारे तक पहुंचे
अर्थात् जब एक महादेश को उन्होंने अपनी छत्रछाया में कर लिया।
शिवाजी के देहान्त के समय मुग़ल बादशाह औरङ्गज़ेब जीवित
था। उसके हृदय में हिन्दुओं के प्रति घृणा के भाव भी वर्त्तमान थे।
उन घृणा के भावों का सत्यानास करने के लिये शिवाजी ने आजन्म सुख
की नींद न ली थी और उन की यह उत्कट इच्छा उनके साथ स्वर्गगामिनी
हुई। किन्तु शिवाजी के उत्तराधिकारिणी महाराष्ट्र जाति ने अपने पूर्वजों
पर किये गये विधर्मियों के अत्याचारों का बदला ब्याज सहित उन
से लिया और औरङ्गज़ेब को, उसके हिन्दुओं के प्रति घृणा के भावों
सहित अहमदनगर की क़ब्र में दफ़न किया तथा हिन्दू-धर्म को काल के
गाल से छुड़ाया। ज़रा ध्यान दीजिये कि यदि ऐसा न हुआ होता तो जो
स्वराज्य का बीज रायगढ़ में शिवाजी के हाथों बोया गया था, वह कभी भी
एक विशाल वृक्ष रूपी राज्य के स्वरूप में दिखाई न देता, वरन् निरर्थक
काल की धूल में नष्टभ्रष्ट हो जाता और कभी फूल और फल न सकता।
शिवाजी महाराज ने तो केवल रायगढ़ पर राज्य किया, पर उनके
उत्तराधिकारियों के लिये भारत की प्राचीन राजधानी दिल्ली पर राज्य
करने के दिन सन्निकट थे। यह कहना अत्युक्ति-पूर्ण न होगा कि यदि
धनाजी, सन्ताजी, बालाजी, बाजीराव, भाऊ, मलहरराव, दत्ताजी,
माधवराव, परशुरामपन्त और बापूजी जैसे महान व्यक्ति क्रमशः
समयानुकूल अपना सिर न उठाते और रणक्षेत्र में अपना कौशल न
दिखाते तथा देश और धर्म के लिये बलिदान न देते, तो महाराज
शिवाजी का मनोरथ अधूरा ही पड़ा रहता और जो उन्होंने अपने
जीवन में सफलता प्राप्त की थी वह जनसमाज में वैसी ही साधारण हो
जाती जैसी कि पटवर्द्धन या बुन्देलाराज्य स्थापित करने वाले नेताओं
की हुई, तथा हमें हिन्दू-इतिहास में शिवाजी को ऐसे अनुपम प्रतिष्ठा
और गौरवपूर्ण पदपर आरूढ़ देखने का अवसर न मिलता।