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हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 254 में से

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पृष्ठ 21

अनिश्चित समझते हैं। साधारणतः भारतवर्ष या हिन्दू इतिहास पढ़ने
वाले यही अनुभव करते हैं कि शिवाजी तथा रामदास ही पहले और
आख़िरी मरहठा देश-भक्त हुए हैं, जिनका मनशा भारत में "हिन्दू-पद-
पादशाही" स्थापित करने का था, और जिन्होंने कि हिन्दुत्व के लिये
बडी शूरता, वीरता तथा अपने अपूर्व साहस का परिचय दिया था।
इतना ही नहीं, अपितु महाराष्ट्र के सम्बन्ध में लोगों की यह धारणा
दिखाई पड़ती है कि जहां महाराज शिवाजी के प्रादुर्भाव के साथ
महाराष्ट्र का इतिहास प्रारम्भ हुआ वहा इनके निधन के साथ ही उस
आन्दोलन की इतिश्री भी हो गई । और उनके पश्चात् जो कुछ हुआ
एक अशान्ति का समय था, अथवा स्वार्थांध और आचार भ्रष्ट लोग
लुटेरों का दल बनाकर इधर-उधर लोगों पर आक्रमण करते हुए देश का
सत्यानाश करते रहे। ये दोनों ही कल्पनाएं नितात ही असत्य हैं।
तथ्य तो यह है कि शिवाजी तथा रामदास की बड़ाई तो इसी बात में
निहित है कि उन का वह आन्दोलन उन की मृत्यु के पश्चात् भी न
केवल बहुत काल तक जीवित ही रहा, वरन् उनके पश्चात् भी उस में
फाल्श सैकड़ों ही महाराष्ट्र के सुयोग्य देशभक्त, व्यवस्थापक और देश
पर प्राणों की आहुति चढ़ाने वाले शूरवीर सरदार एक न टूटने वाले
क्रम में पैदा होते रहे। वे उसी उद्देश्य के लिए अपने पूर्ण बल से लड़ते हुए
हिन्दू-पद-पादशाही के लक्ष्य की ओर बढ़ते गये और उन्होंने ऐसे ऐसे
परिणाम प्राप्त किये जिन्हें देखकर शिवाजी महाराज भी चकित होते।
जिस समय शिवाजी का राज्याभिषेक हुआ था उस समय उनके अधिकार
में मुशकिल से एक प्रान्त था, इस पर भी उस समय यह एक बड़े गौरव
की बात समझी गई थी। यदि ध्यानपूर्वक देखा जाय तो वास्तविक
महाराष्ट्र का तब स्थित हुआ जब कि महाराज शिवाजी के उत्तराधिकारी
राघुवा दादाजी के आधिपत्य में, पञ्जाब की राजधानी लाहौर में
से प्रविष्ट हुए, और फिर जब उनके बहादुर घोडे उछलते-कूदते