हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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टापों से धूल उड़ाते, विजय प्राप्त करते, सिन्ध के किनारे तक पहुंचे
अर्थात् जब एक महादेश को उन्होंने अपनी छत्रछाया में कर लिया।
शिवाजी के देहान्त के समय मुग़ल बादशाह औरङ्गज़ेब जीवित
था। उसके हृदय में हिन्दुओं के प्रति घृणा के भाव भी वर्त्तमान थे।
उन घृणा के भावों का सत्यानास करने के लिये शिवाजी ने आजन्म सुख
की नींद न ली थी और उन की यह उत्कट इच्छा उनके साथ स्वर्गगामिनी
हुई। किन्तु शिवाजी के उत्तराधिकारिणी महाराष्ट्र जाति ने अपने पूर्वजों
पर किये गये विधर्मियों के अत्याचारों का बदला ब्याज सहित उन
से लिया और औरङ्गज़ेब को, उसके हिन्दुओं के प्रति घृणा के भावों
सहित अहमदनगर की क़ब्र में दफ़न किया तथा हिन्दू-धर्म को काल के
गाल से छुड़ाया। ज़रा ध्यान दीजिये कि यदि ऐसा न हुआ होता तो जो
स्वराज्य का बीज रायगढ़ में शिवाजी के हाथों बोया गया था, वह कभी भी
एक विशाल वृक्ष रूपी राज्य के स्वरूप में दिखाई न देता, वरन् निरर्थक
काल की धूल में नष्टभ्रष्ट हो जाता और कभी फूल और फल न सकता।
शिवाजी महाराज ने तो केवल रायगढ़ पर राज्य किया, पर उनके
उत्तराधिकारियों के लिये भारत की प्राचीन राजधानी दिल्ली पर राज्य
करने के दिन सन्निकट थे। यह कहना अत्युक्ति-पूर्ण न होगा कि यदि
धनाजी, सन्ताजी, बालाजी, बाजीराव, भाऊ, मलहरराव, दत्ताजी,
माधवराव, परशुरामपन्त और बापूजी जैसे महान व्यक्ति क्रमशः
समयानुकूल अपना सिर न उठाते और रणक्षेत्र में अपना कौशल न
दिखाते तथा देश और धर्म के लिये बलिदान न देते, तो महाराज
शिवाजी का मनोरथ अधूरा ही पड़ा रहता और जो उन्होंने अपने
जीवन में सफलता प्राप्त की थी वह जनसमाज में वैसी ही साधारण हो
जाती जैसी कि पटवर्द्धन या बुन्देलाराज्य स्थापित करने वाले नेताओं
की हुई, तथा हमें हिन्दू-इतिहास में शिवाजी को ऐसे अनुपम प्रतिष्ठा
और गौरवपूर्ण पदपर आरूढ़ देखने का अवसर न मिलता।
[ २३ ]
शिवाजी के एक अपूर्व शक्तिशाली पुरुष होने का मुख्य कारण
यह था कि उनके सजातीय लोग आजन्म उनका साथ देते रहे, उनके
साथ सर्वदा सहानुभूति रखते आये और जिस कार्य को शिवाजी लेकर
कार्यक्षेत्र में उतरे, उसको सफल बनाने के लिये तनमन से प्रयत्न करते
रहे तथा उनकी प्रबल आशा और इच्छा को समयानुकूल प्राणपण से
पूर्ण करते रहे। इस प्रकार हमें आगे चलकर यह अवश्य मानना पड़ेगा
कि महाराष्ट्र का इतिहास शिवाजी के मृत्युकाल से प्रारम्भ होता है।
शिवाजी ने अपने जीवन काल में एक छोटे से प्रदेश की नींव डाली थी,
पर उसका विशाल राज्य में परिणत करने का काम उनके उत्तराधिका-
रियों का था, जिसकी पूर्ति, महाराज के परलोकवासी होने के
हुई, या यों कहना उपयुक्त होगा कि महाराष्ट्र के वीर रस प्रधान इतिहास
का आरम्भ उस समय हुआ जब कि शिवा जी हिन्दू जाति में *
शक्तियां उत्पन्न करने के पश्चात् परलोकवास कर गये। ये शक्तियां उनके
पश्चात् बड़े वेग से काम करती रही।
————
४.
"धर्मासाठीं मरावे" * —रामदास
महाराष्ट्र धर्म, और इस धर्म के द्वारा महाराष्ट्र में हिन्दुओं के पुनरुद्धार
के आन्दोलन में भरी हुई शक्ति के विषय में औरंगजेब ने जो अनुमान
लगाया था वह अक्षरशः असत्य निकला। उसका विचार था कि जैसे
अनेकों दूसरे आन्दोलन अपने नेताओं की मृत्यु के पश्चात् समाप्त होजाते
हैं उसी प्रकार इस आन्दोलन का भी शिवाजी की मृत्यु के बाद अन्त हो
जायगा, विशेषकर ऐसी अवस्था में जब कि उनका उत्तराधिकारी उनका
अयोग्य-पर वीर-पुत्र संभाजी बना। इसलिए औरंगजेब ने ऐसे अवसर
——————————————————————————————
- धर्म के लिये मरो।
[ २४ ]
को हाथ से न जाने देने का निश्चय किया। काबुल से लेकर बंगाल तक
फैले हुए साम्राज्य के जन-धन के विस्तृत साधन उसके अधिकार में
थे। अतः वह तीन लाख की सेना लेकर दक्षिण पर चढ़ आया। शिवा
जी को भी कभी अपने जीवन काल में इतनी सेना का सामना न करना
पड़ा था। औरंगज़ेब ने अन्दाज़ा लगाने में भूल नहीं की थी, क्योंकि
सारे मुग़ल साम्राज्य की यह सुसंगठित शक्ति मरहठों की ऐसी असंगठित
रियासत से दसगुना बड़े राज्य का भी अनायास नाश कर सकती थी।
मुग़लों की ऐसी सुसंगठित शक्ति का मुकाबला करने के लिए मरहठों
को ऐसा नेता मिला जो कि एक महान् राष्ट्र का पथ-प्रदर्शन करने के
नितान्त अयोग्य था। संभाजी अयोग्य ही नहीं वरन दुष्ट प्रकृति भी था,
और इन उपरोक्त अवगुणों के होते हुए भी, संभाजी ने अपने मरणकाल
तक ऐसी निर्भीकता दिखाई, जो उस के सारे अवगुणों को मिटा कर उसे
शिवाजी का एक सुपुत्र तथा हिन्दू-आन्दोलन का एक महान् व्यक्ति
प्रमाणित करती है। जिस समय वह औरंगज़ेब के दरबार में एक विवश
कैदी के रूप में खड़ा था और विधर्मी उसे मुसलमान हो जाने के लिये
विवश कर रहे थे, कदाचित् उस जैसी बुरी प्रकृति वाला पुरुष मृत्यु के
भय से तथा दुष्टों के लोभ या यातना से अपने धर्म को तिलाञ्जलि देने में
ज़रा भी नहीं हिचकता, पर वाह रे संभाजी! यह तुम्हारा ही दृढ़ हृदय
था, जो ऐसे संकटमय समय आ पड़ने पर भी तुमने शत्रुओं को भरे
दरबार में निर्भयता पूर्वक मुंह तोड़ जवाब दिया और इस घृण्य कर्म को
उपेक्षा करके मृत्यु का आनन्दपूर्वक हंसते २ स्वागत किया, और अपने
पूर्वजों की धर्मभक्ति का पूर्ण समर्थन किया तथा अन्यायी मुसलमानों के
ज्ञान तथा उनकी धर्म पुस्तकों की घोर निन्दा की जिससे औरंगज़ेब को
अनुभव हो गया कि वह इस मरहठे शेर को क्षुद्र कुत्ते की तरह वशीभूत
नहीं कर सकता। अंततः उसने अपने सारे प्रयत्नों को विफल होता
जान कर आज्ञा दी कि इस काफ़िर को मार डाला जाये। औरंगज़ेब
[ ८५ ]
की यह अन्तिम धमकी भी उस धर्मवीर को अपने धर्म से विचलित न कर
सकी। अन्यायियों ने लोहे के गरम चिमटे से संभाजी की आंखें निकाल
लीं, उसकी जिह्वा के टुकड़े २ कर दिये। परन्तु फिर भी वे उस शाही
शहीद को भयभीत न कर सके। अन्त में उसके पञ्चभौतिक शरीर के
टुकड़े टुकड़े कर दिये गये। इस प्रकार वह मुसलिम धर्मान्धता का शिकार
बन गये और अपने बलिदान से हिन्दुओं के लिए अमर कीर्ति प्राप्त कर
गए। अपने इस एक आत्म-बलिदान के महाकार्य से संभाजी ने महाराष्ट्र
धर्म—हिन्दु जाति के पुनरुद्धार के धर्म—की वृत्ति का जो प्रतिनिधित्व
किया वह किसी अन्य कार्य द्वारा नहीं हो सकता था। यदि वह लुटेरों का
नेता होता तो उसका कार्य निश्चित ही इसके विपरीत होता। वाह रे
संभाजी ! तुम्हारी इस धर्म-परायणता पर सौ-सौ बार धन्यवाद है। हिन्दू-
जाति तुम्हारी सदा के लिये ऋणी रहेगी। ईश्वर तुम्हारी आत्मा को
शान्ति दे और भारत के धर्माकाश में तुम्हारी कीर्ति अनन्त काल तक सूर्य
की तरह प्रकाशित रहे और हिन्दु धर्म के लिये महान् गौरवप्रद और
पथप्रदर्शक सिद्ध हो।
संभाजी के कारण, शिवाजी के द्वारा उपार्जित राज्य छिन गया,
राजकोष खाली हो गया, किले शत्रु के हाथों लुट गये और नष्ट-भ्रष्ट
किए गए और यहां तक कि उनकी राजधानी भी मुसलमानों के हाथों
में चली गयी। वह इस होनी को रोक न सका।
इस प्रकार वह अपने पिता की आजन्म की कमाई की रक्षा न
कर सका। परन्तु उस ने अपने महा बलिदान के द्वारा अपने पिता के
धार्मिक तथा अध्यात्मिक लाभों की दीप्ति और शक्ति की रक्षा ही नहीं
की अपितु वृद्धि भी की। इस प्रकार हिन्दू धर्म की स्वतन्त्रता की लड़ाई
का वृक्ष उसके रुधिर से सींचा जाकर विशेष सशक्त और हराभरा हो
गया।
[ २६ ]
५.
सम्भाजी की मृत्यु का बदला
"मरीनि अवघ्यांसि मारावें । मारितां मारितां घ्यावें । राज्य आपुलें"
—रामदास
राजकुमार संभाजी के धर्म पर बलिदान हो जाने का समाचार
ज्यों ही महाराष्ट्र वासियों के कानों में पहुंचा त्यों ही सब के भाव
उनके प्रति शीघ्र ही बदल गये अर्थात् उनके आजन्म के किये बुरे कर्मों
तथा अपराधों को सभी भूल गये । अपने राजकुमार के प्रति उन में
विशेष श्रद्धा उत्पन्न हो गई । उनकी धमनियों में रक्त खौलने लगा और
शत्रुओं से राजकुमार की हत्या का बदला लेने के लिये सभी कटिवद्ध हो
गये । धन और साधनों के अभाव में भी उन्होंने स्वतन्त्रता प्राप्त करने
का संकल्प कर लिया । सबने एकत्रित होकर शिवा जी के द्वितीय पुत्र
राजाराम को अपना अगुआ एवं राजा मान कर हिन्दू धर्म और हिन्दू
राज्य की रक्षा के लिये मर मिटने की शपथ ली । समर्थ गुरु रामदास
जी की शिक्षायें—
'धर्मासाठीं मरावें, मरोनि अवघ्यांसि मारावें ॥
मारितां मारितां घ्यावें । राज्य आपुलें ॥१॥
मराठा तितुका मेलवावा । आपुला राष्ट्रधर्म वाढवावा ॥
येविशीं न करितां तकवा । पूर्वज हासती ॥ २ ॥ 🌸
मरहठे उनकी मृत्यु के पश्चात् भी न भूले, वरन् जाति के लिये वे
जीता-जागता धर्म बन गयीं । राजाराम, नीलोमुरेश्वर, प्रह्लाद नोराजी,
🌸 धर्म के लिये मरो, मरते मरते भी शत्रुओं का संहार करो, राज्य
प्राप्ति के लिये मर भी जाओ, मरहठों को संगठित करो, राष्ट्र धर्म को
बढ़ाओ । अपने इस कर्तव्य से च्युत होने पर पूर्वजों के परिहास पात्र
बनोगे—”
[Header] २७ ]
रामचन्द्र पन्त, शङ्करजी मल्हार, परशुराम त्र्यम्बक, सन्ता जी घोरपाड़े,
धानाजी यादव, खण्डेराव दभाड़े, निम्बालकर नेमाजीपरसोज़ी, ब्राह्मण,
आदि मरहठे, नेतागण तथा राजकुमार और किसान--अथवा यों कहिये
कि सारी जाति ही मुसलमान शत्रुओं के विरोध में सशस्त्र खड़ी हो गई।
उस समय तक पुनः सारा दक्षिण औरङ्गज़ेब के अधीन हो चुका
था। सारा महाराष्ट्र, इसके प्रसिद्ध किले, यहां तक कि स्वयं शिवाजी की
पवित्र राजधानी भी मुसलमान सेनापतियों के सैनिक शासन के हाथों
दुःखित हो रही थी। यही जान पड़ता था कि शिवाजी तथा उनके वंशजों
ने व्यर्थ ही इसके लिये लड़कर अपने प्राण गंवाये थे। लेकिन किले
और राजधानी पास नहीं तो क्या हुआ! जो जात अपनी स्वाधीनता
प्राप्त करने की प्रबल इच्छा रखती हो, वह अपना किला अपने हृदय में
बना सकती है। उसका उच्च आदर्श ही जातीय ध्वजा का काम देता है
और जहां कहीं जाकर फहराता है, वही उसकी राजधानी बन जाती है।
इस उच्च विचार ने सारे महाराष्ट्र-वासियों के हृदय में एक नवीन
ज्योति पैदा कर दी। उन्होंने युद्ध को एक क्षण के लिये भी बंद न करने
का दृढ़ निश्चय कर लिया और वे कहने लगे- "यदि हम लोगों के हाथ से
महाराष्ट्र खो गया है तो क्या हुआ, चलो मद्रास में चलकर लड़ाई छेड़ें।
यदि रायगढ़ हाथ से निकल गया है तो हिन्दू-पद-पादशाही का झण्डा जिनजी
में चलकर गाड़ दें और लड़ाई एक दिन के लिये भी बन्द न करें।" इस
प्रकार की प्रौढ़ प्रतिज्ञा करके, मरहठे मुगलसम्राट्-औरङ्गज़ेब की विशाल
सेना से लगभग २० वर्ष तक लड़ते रहे। अन्त में उसे निराश और हार
कर महाराष्ट्र तथा दक्खिन से भाग जाने पर विवश होना, इसी शोक
में दुखी होकर वह सन् १७०७ ईस्वी के साल अहमदनगर में मर गया।
मरहठों की अद्भुत युद्ध कला जिसे "गनिमी कावा' कहते
हैं, इस लम्बी लड़ाई में विशेष लाभदायक सिद्ध हुई। बिजली की तरह
चंचलता, वीरता और साहस के साथ मरहठा सेना, अद्वितीय सेनापतियों
[ २८ ]
की अध्यक्षता में, कभी एकत्रित होती, कभी छिटपुट रहती; कभी आक्रमण
करनी, कभी पीछे हट जाती; कभी आगे बढ़ती, कभी पीछे पांव धरती;
कभी लड़ती, कभी भागती; कभी लड़ाई में पांव जमाती। इस युद्ध
कौशल ने मुगलों को खूब सताया और उन्हें हर जगह से दुम दबा कर
भाग जाना पड़ा।
इस प्रकार विचित्र लड़ाई लड़कर मरहठों ने मुगलों के साहस को
चूर्ण कर धूल में मिला दिया। प्रत्येक नामी मुसलिम सेनापति और नायक
को या तो परास्त किया गया या अपमानित किया गया। उन्हें या तो
कैदी बना लिया अथवा मार डाला गया। जुलफिकार खां, अली मरदान
खां, हिम्मत खां और कासिम खां आदि मुग़ल सेनापतियों को मरहठे
सरदारों धानजी, मन्ताजी आदि ने जिनजी, कावेरीपाक, दुगारी और
अन्य दूसरे युद्धस्थलों में ऐसा बुरी तरह हराया कि उनकी सेना छिन्न-
भिन्न हो गई, जिससे मुग़ल बादशाह औरङ्गज़ेब को महाराष्ट्र विजय
करने की इच्छा फिर स्वप्न में भी न हुई।
इस प्रकार मरहठे शत्रुओं का दमन करते हुए आगे बढ़े और उन्होंने
सीधा मुग़लों की शाही छावनियों पर धावा बोल दिया, दूसरे शब्दों में
उन्होंने सिंह को उसकी मांद ही में आकर ललकारा। बादशाह ज़िन्दा
ही पकड़ा जाता, यदि भाग्यवश अपने बादशाही सुनहरी खेमे से भाग न
गया होता। मरहठों ने खेमें पर अपना अधिकार कर लिया और उसे
उखड़वा कर अपने साथ ले आये।
इस समय सभी मरहठे सेनापतियों के हृदय में देशभक्ति का अपूर्व
उत्साह भरा हुआ था, जो निम्नलिखित बातों से स्पष्ट हो जायगा--
प्रसिद्ध सेनापति खाएडोचल्लाल ने उन मरहठा सरदारों को, जो
कि अभी जिनजी को घेरने में मुग़लों का साथ दे रहे थे, अपनी ओर
मिलाने का कठोर परिश्रम और प्रयत्न किया। परोक्ष रीति से उन्होंने
नागोजी राजे के साथ, उसे अपनी ओर करने के लिये, पत्र व्यवहार
[ २६ ]
आरम्भ कर दिया। पत्र में उसे यह भली भांति समझाया गया कि
आप राजाराम से आकर मिल जायें तो हम लोग अनायास मुग़ल
का जिनजी में सत्यानास कर सकते हैं। दूसरे यह आपका
कर्तव्य भी है कि आप मरहठों की सहायता करें जो कि अपने
के धर्म और देश की रक्षा करने का प्रयत्न कर रहे हैं।
वीर नागोजी राजा ने मरहठों की उक्त प्रार्थना को स्वीकार
लिया और एक हिन्दू के नाते, अपना उचित कर्तव्य समझ, पांच सहस्र
अनुयायियों के साथ मुसलमानी फ़ौज से निकलकर मरहठों से आ मिला।
इसके पश्चात् खण्डोपलाल ने शिर्का को भी, जो कि अभी तक
मुग़लों की ओर ही था, मरहठों की ओर मिला लेने का दृढ़ निश्चय
किया। परन्तु जब शिर्का ने पत्र में पढ़ा कि राजाराम बड़ी आपत्ति में
फंसा हुआ है, तो संभाजी द्वारा अपनी जाति पर किये गये अत्याचारों का
स्मरण करके वह अति क्रोधित हो गया और पत्रोत्तर में उसने लिखा कि
एक राजाराम ही क्या, यदि सारा भोंसला खानदान भी इस पृथ्वी
से मिट जाये तो भी मुझे इसकी तनिक चिन्ता न होगी। क्या वह दिन भूल
गये, जब शिर्का लोग संभाजी का निशाना बन रहे थे और जहां कहीं
पाये जाते, मार डाले जाते थे? मुझे उन दिनों का स्मरण करके अत्यन्त
दुःख होता है। मैं तो भोंसलों के उन बुरे दिनों की प्रतीक्षा कर रहा हूं,
जिन्हें देख कर मुझे शान्ति प्राप्त होगी।
इस प्रकार का पत्रोत्तर पाकर खण्डोबालाल तनिक भी हतोत्सा-
हित न हुआ और अपने विचार द्वारा पुनः प्रार्थना पत्र भेजकर उसने
समझाया कि 'ऐ मेरे प्रिय मित्र! सुनिये, आपका लिखना अक्षरशः सत्य
है, पर यह बात भी तो सत्य है कि संभाजी ने केवल आप ही की जाति
पर अत्याचार नहीं किया था वरन् हमारे परिवार के तीन व्यक्तियों को भी
हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया था। उसकी चोट मेरे हृदय को उतना ही
कष्ट पहुंचा रही है, जितना आपके हृदय को। पर इस समय की समस्या
[ ३० ]
किसी परिवार-विशेष से सम्बन्ध नहीं रखती और न ही हम लोग अपने
स्वार्थ के लिये लड़ रहे हैं; न हम लोगों का उद्देश्य भोंसला या किसी
और ही कुल को ऊंचा करने का है; वरन् हमतो एक हिन्दू प्रजातन्त्र-
राज्य के हेतु प्राण दे रहे हैं-
"हिन्दूच्या साम्राज्यासाठीं आम्ही झटत आहों !" ॐ
शिर्का का हृदय खान्डोवलाल के पत्रोत्तर से द्रवित हो गया और
उसकी जातीय भावनायें उद्बुद्ध हो गई । उसके सामने जाति का गौरव
नाचने लगा और वह इस जातीय अपील से प्रभावित हुए बिना न रह
सका । उसने व्यक्तिगत अपराधों और पारिवारिक झगड़े को भूल कर क्षमा
प्रदान की । राजाराम को घिरी हुई मुगल सेना से छुड़ाने का वचन दिया
और अपने वचनानुसार अनेक प्रकार की सहायता देकर राजाराम को
मुगल सेना से मुक्त कराकर तथा विजेता के रूप में महाराष्ट्र पहुंचा दिया ।
इस प्रकार केवल शिवाजी के पुत्र का ही नहीं, वरन् उनके पश्चात्
उनके वंशजों का भी हृदय देशभक्ति के उच्च भावों से भरा हुआ था । हिन्दू
जाति की राजनैतिक स्वतन्त्रता तथा धर्मरक्षा का पवित्र ध्येय सर्वदा उनके
हृदय में विराजता था, इसी कारण वे विदेशी और असभ्य शत्रुओं के
भयंकर आक्रमण से सदा सचेत रहकर अपने प्राण हथेली पर रखकर,
हिन्दू धर्म की रक्षा करते रहे ।
अब आप स्वयं सोच सकते हैं कि क्या लुटेरे और बटमार भी
ऐसे पराक्रमी शत्रुओं पर युद्ध में विजय प्राप्त कर सकते थे ? कदापि
नहीं ! इस प्रकार सफलता प्राप्त करना उन सच्चे धर्मवीर मरहठों का
ही काम था । यह धार्मिक वा जातीय शक्ति का ही प्रताप था जिसने उस
समय के देशभक्तों को बहुत शक्तिशाली बना दिया और उन्हें देश को ऐसे
खतरे से सुरक्षित रखने के योग्य बना दिया जिस का मुक़ाबला देश की
कोई दूसरी शक्ति न कर सकती थी ।
ॐ हिन्दुओं के साम्राज्य की स्थापना के लिए हम प्रयत्न कर रहे हैं।
१. छत्रपति शिवाजी व सम्भाजी महाराज का बलिदान
[ ३१ ]
६.
महाराष्ट्र-मण्डल
"आहे तितुकें जतन करावें । पुढें आणिक मेळवावें ॥
महाराष्ट्रराज्यचि करावें । जिकडे तिकडे !!" ॐ --रामदास
जिस समय औरङ्गजेब का जीवन, उसकी सारी आशा और
इच्छाओं के नष्ट हो जाने के कारण, भार-सा हो रहा था और वह दुःख
सागर में गोते खा रहा था, उस समय मरहठों ने अवसर पाकर खान
देश, गोंडवान, बरार और यहां तक कि गुजरात आदि दूरस्थ प्रदेशों में
युद्ध छेड़ दिया। उन्होंने शाहूजी को मुक्त करा लिया तथा दक्खिन के छः
सूबों तथा मैसूर, ट्रावनकोर आदि रियासतों से भी, उन्हें लड़ाई में हराकर
'चौथ' और "सरदेशमुखी" वसूल करने लगे। अन्त में मुग़ल सम्राट्
को झक मार कर महाराष्ट्र में मरहठों के स्वतन्त्र राज्य का स्वत्व
मानना पड़ा। इससे मरहठों की शक्ति पहिले से अधिक बढ़ गई। इस
प्रकार मरहठों को अपने घरों का उचित प्रबन्ध करने अपनी बिखरी हुई
शक्तियों को संगठित करने तथा व्यक्तिगत दलबन्दियों के भावों को
मिटा कर सर्वसाधारण की इच्छानुसार, अपनी सारी स्वाभाविक
और अनिवार्य कमज़ोरियों के होते हुए भी, एक संगठन सूत्र में बांधने
का सुअवसर मिल गया, जिसका फल ऐसा उत्तम निकला कि महा-
राष्ट्र-मण्डल या कॉन्फिडरेसी-सच्चे अर्थों में "हिन्दू-पद-पादशाही" ब-
गई। यह केवल नाममात्र को ही नहीं वरन् वास्तविक रूप में सारे भारतवर्ष
पर राज्य करने लगी।
जिन व्यक्तिगत त्रुटियों और दुर्बलताओं की ओर मैंने ऊपर
संकेत किया है ये वास्तविक ही थीं, क्योंकि ऐसी त्रुटियां सब
हिन्दुओं के भीतर अब भी वर्त्तमान हैं। हम आगे चलकर पाठक-
ॐ जो कुछ तुम्हारे पास है उसे बचाओ और उसकी वृद्धि के लिए
प्रयत्न करो। सब ओर महाराष्ट्र साम्राज्य का प्रसार करो।
[ ३२ ]
को एक एक करके इनको बताने की चेष्टा करेंगे। सब भ्रमों को दूर
करने के लिए यह कह देना ही पर्याप्त होगा कि जितना उनके विषय में
हमें ज्ञान है उतना और किसी को न होगा। जब हम उन महान्
राष्ट्रीय तथा धार्मिक सिद्धान्तों पर दृष्टि डालते हैं तथा उन का प्रकटी-
करण करते हैं जिन्हों ने मरहठा जाति को हिन्दू स्वतन्त्रता के युद्ध
को जीतने के लिए प्रयत्नशील बनाया उस समय हम उस तथ्य को
भुलाना या कम करके दिखाना नहीं चाहते कि कभी कभी विशेष अवसरों
पर व्यक्तिगत द्वेष की आग तथा स्वार्थ और लालच भी उनको अपने
जातीय कर्तव्य तथा प्रवृत्ति से विचलित कर देता था। यदि उनमें ये
अवगुण न होते तो वे मनुष्यों के स्थान पर देवताओं की जाति बन
जाती। यदि हम उनके उस महान् कार्य के उच्च उद्देश्य की ओर ध्यान
दें तथा उनके अपूर्व प्रयत्न और आत्मसमर्पण द्वारा प्राप्त सफलता में से
उनकी व्यक्तिगत बुराइयों को भी कम करदें तो भी प्रत्येक देशभक्त
हिन्दू उनके किये हुए कार्यों की अवश्य ही सराहना करेगा।
मरहठा सरदार बालाजी विश्वनाथ अपने राज्य प्रबन्ध को सब
प्रकार सुदृढ़ कर के तथा अपनी सैनिक शक्ति को पूर्णतया संगठित कर
के इतना शक्तिशाली बन गया कि दिल्ली की शाही राजनीति में भी दखल
देने का साहस करने लगा। उस समय उनको किसी भी मुसलमान
शत्रु का भय न था, यहां तक कि स्वयं मुग़ल बादशाह भी अपने बागी
सैनिकों तथा वज़ीरों से सुरक्षित रहने के लिये मरहठों से प्रार्थना किया
करते थे और उनकी सहायता के भिक्षुक बने रहे थे। इस से यह स्पष्ट
हो जाता है कि मरहठों के आन्दोलन ने मुसलमानी साम्राज्य को जड़ से
उखाड़ कर शक्तिहीन कर दिया था।
सन् १७१८ ईस्वी में बालाजी विश्वनाथ तथा दाभाडे ने सैय्यद
बन्धुओं का पक्ष लेकर उनके मुसलमानी प्रतिद्वंद्वियों के मुक़ाबले में
१०,००० मरहठे सिपाहियों के साथ दिल्ली की ओर प्रस्थान किया
[ ३३ ]
क्योंकि सैय्यद बन्धुओं ने पहिले से ही सारे दक्खिन पर चौथ व सर-
देशमुखी वसूल करने का अधिकार मरहठों को दे दिया था।
हिन्दुओं की पचास हज़ार सेना को अपनी राजधानी में प्रवेश
करते हुए देख कर दिल्ली के मुसलमानों की क्रोधाग्नि भड़क उठी और वे
मरहठे-सरदार को मार डालने के लिये षड्यन्त्र रचने लगे। उन्होंने यह
निश्चय किया कि जिस समय बालाजी “स्वराज्य” तथा “चौथ” वसूल
करने की सनद बादशाह से लेकर दरबार से निकलें, उसी समय धावा
करके उन्हें मार डाला जाये। लेकिन क्या मरहठे जासूस इन बातों से
अनभिज्ञ थे ? कदापि नहीं। ज्योंही उपर्युक्त समाचार मरहठों की सेना
में पहुंचा त्योंही प्रसिद्ध सेनापति भानू अपने सरदार की रक्षा के लिये
अपने प्राण देने के लिये कटिवद्ध हो गया अर्थात् यह निश्चय किया गया
कि बादशाह से सनद लेकर बालाजी की पालकी किसी गुप्त राह से सेना
में पहुंचाई जाय और भानू जी सजधज से बालाजी की पालकी में बैठ
कर मुख्य द्वार से लौटे। अन्त में ऐसा ही किया गया। इधर मुसलमानों
का क्रोध भरा झुण्ड बहुत देर से पेशवा की पालकी की ताक में था।
पालकी पर नज़र पड़ते ही वह झुण्ड एकाएक मधुमक्खियों की तरह उन
पर टूट पड़ा और थोड़े से मरहठा सैनिकों के साथ आते हुए, भानूजी को,
उन्हें बालाजी समझ कर, फ़ौरन क़त्ल कर दिया।
बाला जी बादशाही सनद को कांख के नीचे दबाये हुए किसी
गुप्त राह से सकुशल अपने खेमे में पहुंच गया। भानू जी के इस
प्रकार निस्वार्थ आत्मसमर्पण ने अपने जातीय इतिहास की धीरता,
गौरव, प्रताप और महत्व को चार चाँद लगा दिये। इस प्रकार के महत्व-
पूर्ण उदाहरणों को इस संक्षिप्त पुस्तक में जहां तहां दर्शाने का तात्पर्य
यह है कि ऐसे जातीय और धार्मिक गौरव के थोड़े उदाहरण, रूखी
समालोचनाओं से भरी दर्जनों मोटी किताबों की अपेक्षा, पाठकों
के लिये विशेष लाभदायक होंगे।
[ ३४ ]
७.
बाजीराव का कर्मक्षेत्र में पदार्पण
दिल्ली से लौटते ही बालाजी विश्वनाथ का सन १७२० ई० में
देहान्त होगया और उसका लड़का बाजीराव उनके स्थान पर, महाराष्ट्र
मण्डल का नेता बना । उस समय मण्डल के सभापति शाहू जी थे ।
शिवाजी के पश्चात् बाजीराव का राजनैतिक क्षेत्र में उतरना महाराष्ट्र
के इतिहास की एक दृढ़ मोड़ बनाता है। यद्यपि बड़ी बड़ी राजनैतिक
समस्यायें अभी भी अधूरी पड़ी थीं तथापि महाराष्ट्र को राजनैतिक
स्वतन्त्रता प्राप्त हो चुकी थी। मरहठे इतने शक्तिशाली और संगठित
हो चुके थे कि वे देश और धर्म को हर प्रकार की आपत्ति से सुरक्षित रख
सकते थे. और यदि चाहते तो शाही राजनीति में न उलझ कर केवल महा-
राष्ट्र मण्डल पर ही सन्तोष करके भली भांति शांतिपूर्वक अकंटक राज-
सुख भोग सकते थे। यह भाव कई एक नेताओं के हृदय में उत्पन्न भी हुआ
और इसे उन्होंने छत्रपति शाहूजी के मन पर बिठाने का प्रयत्न भी किया,
किन्तु वे असफल रहे। अगर उनका यह प्रयत्न सारी जाति पर सफल
भी होजाता और वे उन लोगों को महाराष्ट्र सीमा के बाहर हिन्दुओं की
स्वतन्त्रता की लड़ाई को रोकने के लिये उभारते भी, तो भी इस बात
में शंका थी, कि जो कुछ उन लोगों ने विजय करके अपने अधीन
किया था, उसका बहुत दिनों तक शांतिपूर्वक उपभोग कर भी सकते या
नहीं। अथवा यदि वे महाराष्ट्र को सब प्रकार से सुरक्षित भी रख सकते
और भारत के सभी दूसरे प्रान्तों से नाता तोड़ कर, एकांत स्वतन्त्र
जीवन व्यतीत कर भी पाते तो प्रश्न यह उठता है कि क्या उन्हें ऐसा
करना चाहिये था ? क्या उन लोगों ने केवल क्षुद्र सांसारिक सुख और
शान्ति के लिए ही लगातार तीन पीढ़ियों तक घोर लड़ाई करके खून की
नदी बहाई थी ? नहीं, ऐसी बात नहीं है और न ही ऐसा करना उनके
लिए श्रेय था। क्या इसे सच्चा सुख कहा जा सकता था ? नहीं, नहीं
[ ३५ ]
कदापि नहीं। शिवाजी ने जिस हिन्दू-पद-पादशाही की नींव डाली थी,
उसका उद्देश्य केवल महाराष्ट्र-मात्र के लिये ही न था, बल्कि सारे भारत-
वर्ष के लिये एक-सा था और उनके इसी पवित्र उद्देश्य के परिपोषक
उनके सारे साथी थे। यह बात तो सच है कि महाराष्ट्र के हिन्दू विदे-
शियों के शासन से छुटकारा पा चुके थे, पर अब भी करोड़ों हिन्दू भिन्न-
भिन्न प्रान्तों में वर्तमान थे, जो विदेशियों के शासन से असन्तुष्ट
और दुखी थे। गुरु रामदास ने तो यह उपदेश दिया था कि--"धर्मासाठीं
मरावें" (धर्म के लिये मरो)। और इस बात पर उन्होंने शोक प्रकट किया
था कि "तीर्थक्षेत्रें भ्रष्ट झालीं !" (अर्थात् हमारे तीर्थस्थान अपवित्र किये गये
हैं)। ऐसी दशा में मरहठे यदि अपने प्रान्त पर ही सन्तुष्ट होकर बैठ जाते
तो शिवाजी महाराज का उद्देश्य तथा महात्मा रामदासजी का पवित्र उपदेश
निष्फल होजाता और स्वर्ग में भी उनकी आत्माओं को शान्ति न मिलती।
भला इस उच्च ध्येय को ध्यान में रखते हुए मरहठे क्योंकर चुपचाप बैठ
सकते थे जबकि यवनोंकी हलाली ध्वजा अब भी बड़े गौरवके साथ पवित्र
काशी-क्षेत्र मे विश्वनाथ के मन्दिर पर फहरा रही थी। फिर ऐसी दशा में
हम किस प्रकार मान सकते हैं कि शिवाजी का हिन्दू-पद-पादशाही का
आन्दोलन पूर्ण होचुका था, जबकि दिल्ली में धर्मराज युधिष्ठिर के पवित्र
सिंहासन पर मुग़ल विराज रहे हों !
मरहठे पन्धारपुर के मुसलमानी राज्य को जीत कर वहां से
हलाली ध्वजा को उखाड़ कर फेंक चुके थे और अब नासिक को धर्मान्ध
मुसलमान अपमानित नहीं कर सकते थे। किन्तु उधर काशी, रामेश्वर, कुरु-
क्षेत्र और गंगा सागर की क्या दशा थी ? इस पर ध्यान दीजिये। वहाँ
यवनोंकी ध्वजा उड़ रही थी। क्या ये तीर्थ उतने ही पवित्रन थे जितने कि
पन्धार और नासिक ? उनके पूर्वजों की अस्थियां केवल गोदावरी में ही
नहीं पड़ी थीं; बल्कि गंगा में भी पड़ी थीं। उनके देवमन्दिर हिमालय से
लेकर रामेश्वर तक और द्वारिका से लेकर जगन्नाथ तक सारे भारत में फैले
हुए थे। अतः स्वामी रामदास जी के कथनानुसार गंगा और यमुना का
जल अब भी अपवित्र तथा पूजन कार्य के अयोग्य था, क्योंकि उन पर
मुसलमान राजाओं की धार्मिक ध्वजा की छाया अभी तक पड़ती थी
और इसीको देखकर स्वामीजी बड़े दुःख भरे शब्दों में कहा करते थे कि —
"मुसलमान शक्तिशाली हैं और हिन्दू निर्बल हैं" किन्तु मरहठों को
चाहिये कि "धर्म के लिये मरें, मरते-मरते भी अपना राज्य ले लें और
महाराष्ट्र साम्राज्य स्थापित करें और हिन्दू धर्म को जीवित करें।"
क्या मुसलमानों का अन्यायपूर्ण शासन भारतवर्ष से उठ गया था ? क्या
भारतवासियों के पांवों में पड़ी हुई गुलामी की जंजीरें कट गई थीं ? नहीं।
जब तक मुसलमानों का प्रभुत्व सारे भारतवर्ष में चूर-चूर न हो जाता,
तब तक हिन्दूधर्म के साम्राज्य का गौरव नहीं हो सकता। जब तक
भारतवर्ष की एक इंच भूमि भी मुसलमानों के अधिकार में रहेगी, तब
तक जिस कार्य के लिये शिवाजी तथा रामदासजी के वंशज मर मिटे थे,
वह कार्य अधूरा ही समझा जायगा।
विचारवान और कर्मशील मरहठा नेताओं, योद्धाओं और
ऋषियों ने जनता के सामने ये युक्तियां रखीं—"जब कि तुमने अपने
मन में दृढ़ संकल्प कर लिया है कि जब तक हिन्दुओं की गुलामी की
बेड़ी टुकड़े २ नहीं कर डालते तब तक अपनी तलवार को म्यान में न
रखेंगे, तब जब तक कि हिन्दू जाति बिना रोकटोक पूर्ण स्वतन्त्रता से अपने
सारे धार्मिक कार्य नहीं कर सकती और जब तक एक विशाल शक्तिशाली
हिन्दू राज्य स्थापित नहीं हो जाता तब तक तुम युद्ध बन्द करके कैसे
शान्तिपूर्वक राज्यसुख को भोग सकते हो ? जब तक विश्वनाथ के पवित्र
मन्दिर की जगह मसजिद दिखाई देती है, जब तक मुसलमानों के घुड़-
सवार बेरोक टोक सिन्धु नदी को पार करते रहेंगे और जब तक उनके
जहाजों की पालें हिन्द महासागर में उड़ती रहेंगी; तब तक क्या तुम
इस धर्मयुद्ध से कभी भी मुंह मोड़ सकते हो ? इस धर्मयुद्ध का अंत
[ ३७ ]
किसी व्यक्ति-विशेष या किसी एक प्रान्त की सुख-शांति पर निर्भर नहीं
है, बल्कि इसका अन्त सारे भारतवर्ष में एक महान् हिन्दू-साम्राज्य एवं
“हिन्दू-पद-पादशाही” के स्थापित होने के साथ होगा। इस लिये हे
महाराष्ट्रवासियो ! उक्त कार्य की पूर्ति के लिये सहस्रों और लाखों की
संख्या में तलवार लेकर निकल पड़ो और अपनी गेहुआ ध्वजा को,
नर्मदा को पार कर चम्बल के उस पार स्थापित कर दो। गंगा, यमुना,
सिन्ध और ब्रह्मपुत्र को पार करते हुए अन्त में समुद्र के किनारे तक
पहुंच जाओ और श्रीरामदास जी के महान् के निम्न उपदेश कोस दैव ध्यान
में रख कर अपनी मनोरथपूर्ति के लिये प्रयत्न करते जाओ, तथा उसके
साथ-साथ अपने पैर भी आगे बढ़ाते जाओ :-
"देव मस्तकीं धरावा। अवघा हलकल्लोल करावा ॥
मुलूख बडवा बुडवावा। धर्मसंस्थापनेसाठी ॥ ॐ
इन उपरोक्त महान उद्देश्यों ने ही बाजीराव, चिम्माजी अप्पा,
ब्रह्मेन्द्र स्वामी, दीक्षित, माथुर बाई आंगरे, इत्यादि महाराष्ट्रीय नेताओं
को प्रोत्साहित किया और उन्हें मरहठा कार्यक्रम की वृद्धि करने के लिए
बाधित किया। इस समय अब उन लोगों के सामने केवल यही प्रश्न नहीं
उठता था कि - "क्या होना चाहिये ?" बल्कि यह होता था कि "क्या
किया जाय"। प्रथम तो महाराष्ट्रवासियों का ध्येय कोई विशेष प्रान्तीय
हिन्दू-राज्य स्थापित करने का था ही नहीं और यदि ऐसा करने की
उनकी इच्छा होती भी, तो उसका पूर्ण होना असम्भव था, क्योंकि
महाराष्ट्र के हिन्दुओं का भाग्य उत्तर में सिन्ध से लेकर दक्षिण में समुद्र
तक के हिन्दुओं के भाग्य के साथ नत्थी हुआ था।
महाराष्ट्र के राजनीतिज्ञ भली भांति जानते थे कि भूतकाल में
प्रान्तीय भेदभाव ने ही भारतवर्ष को पराधीन बनाया था, और इसी
ॐ देवताओं को पूजनीय मान कर उन को सिर पर धारण कीजिये।
चारों ओर धर्म का डंका बजा दो। धर्म की स्थापना के लिये अपना सर्वस्व
बलिदान कर देना चाहिये।
[ ३८ ]
कारण हिन्दुओं की जाति तथा धर्म का नाश हुआ था। इसी बात
को दृष्टि में रख कर वे सदैव यह प्रयत्न करते रहे कि जहां तक सम्भव
हो, हिन्दूमात्र को संगठित किया जावे। इसी बात को ध्यान में रखकर
जिस समय नादिरशाह का आक्रमण भारतवर्ष पर हुआ उस समय
बाजीराव ने प्रत्येक हिन्दू-राजा को लिख भेजा था कि मैं आप लोगों
को केवल अपने धार्मिक तथा राजनैतिक कार्यों के लिये स्वार्थवश
नादिरशाह का सामना करने में सहयोग देने के लिये विवश नहीं करता
हूं, बल्कि मैं सोचता हूं कि जब तक आप लोग इस महान हिन्दू जाति
की स्वतंत्रता के प्रश्न को सुचारू रूप से हल न करेंगे तब तक आप लोगों
का व्यक्तिगत जीवन वास्तविक शान्तिमय जीवन नहीं कहलायेगा।
आप को अपने ही सुख भोग पर जीवन व्यतीत करना शोभा नहीं देता
है, वरन हम लोगों को एक ऐसा बड़ा राज्य स्थापित करना चाहिये
जिस की छत्र-छाया में सारा भारतवर्ष सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर
सके। यह बात निश्चित है कि जब तक भारत पर विदेशियों का शासन
है तब तक कोई भी हिन्दू शान्तिपूर्वक नहीं रह सकता और न ही अपने
को पूर्ण हिन्दू कहलाने के योग्य भी प्रमाणित कर सकता है। ऐसी अवस्था
में वह अपनी जाति की उन्नति करने में भी असमर्थ होंगे, क्योंकि दूसरों
के अन्याय से भयभीत होकर उन्हें सब प्रकार से गुलामी की बेड़ी में बंधा
रहने के लिये विवश होना पड़ेगा।
इन सब बातों को केवल महाराष्ट्र के प्रमुख नेता ही नहीं, बल्कि
महाराष्ट्र का साधारण से साधारण व्यक्ति भी अनुभव कर रहा था कि
जब तक वे लोग दिल्ली पर राज्य न करेंगे तबतक पूना और सितारे में
राज्य करना व्यर्थ है। जब महाराष्ट्र के सारे नेता, शाहूजी के सभाप-
तित्व में उपस्थित होकर भविष्य के राजनैतिक सिद्धान्तों पर विचार करने
के लिये एकत्रित हुए तो ऐसा सुअवसर पाकर बाजीराव बोलने के लिए
उठे और अपनी शक्ति और उत्साह तथा अपने विषय के महत्त्व को दृष्टि
[ ३६ ]
में रखकर कहने लगे "हम लोग अब अवश्य सीधे दिल्ली की ओर बढ़ेंगे
और यवन राज्य की जड़ से उखाड़ देंगे। ऐ हिन्दू शूरवीरो ! तुम यहां
खड़े होकर क्यों आगा-पीछा सोच रहे हो। आगे बढ़ो, आगे बढ़ो,
"हिन्दू-पद-पादशाही" स्थापित करने का समय आ गया है। क्या ऐसा
करना असम्भव है ? नहीं, नहीं, कभी नहीं । मैंने अपनी तलवार
शत्रुओं की तलवार से नाप ली है-उनकी शक्ति का पता लगा लिया है।"
फिर वह छत्रपति को सम्बोधित करते हुए कहने लगे-“ऐ महाराज छत्रपति
शाहू जी ! मैं आप से अधिक धन या जन की याचना नहीं करता
हूं, केवल आप मुझे आज्ञा दें और साथ ही यह आशीर्वाद भी दें कि मैं
सीधे दिल्ली जाऊं और उस हानिकारक वृक्ष की जड़ पर कुल्हाड़ी चला
कर उसे शाखाओ सहित नष्ट कर दूं"।
बाजीराव के उत्साहपूर्ण तथा पवित्र आन्तरिक भावों से भरे हुए
वाक्यों को सुनकर छत्रपति शाहू जी का शरीर रोमांचित हो गया, और
उन्हें अनुभव होने लगा कि उनकी नसों में शिवा जी का रक्त प्रवाहित
होने लग पड़ा है, और जोश भरे शब्दों में उन्ह ने उत्तर दिया-“ऐ मेरी प्रजा
के प्रमुख शूरवीरो ! जाओ, जिधर चाहो, मेरी सेना को विजय-पर-विजय
प्राप्त कराते हुए ले जाओ और दिल्ली ही क्या, इस गेरुआ वस्त्र की
ध्वजा को, विजय लाभ कराते हुए, हिमालय की चोटी और यदि होसके
उसके परे किन्नर खण्ड पर स्थापित कर दो।" यह गेरुआ ध्वजा सोन-
चांदी के काम से सुशोभित नहीं थी, बल्कि उन वैरागियों और संन्यासियों
के गेरुआ रंग में रंगी हुई थी, जो सांसारिक माया के त्याग, ईश्वर-
भक्ति तथा लोक-सेवा की ओर मनुष्यों को ले जाता है।
शाहू जी की आज्ञा पाकर मरहठे उस गेरुआ ध्वजा के पीछे
चल पड़े। यह गेरुआ ध्वजा उन्हे धार्मिक कर्त्तव्यों का स्मरण कराने
तथा उनको सत्पथ पर ले जाने के लिये दी गयी थी । इसी ध्वजा
के सहारे मरहठे अपने उच्च आदर्श पर आरूढ़ रह कर धर्म और जाति
[ ४० ]
के रक्षक बने तथा शत्रुओं की पराधीनता से उन्होंने अपने देश को
मुक्त कराया । तलवार ही मरहठों की पूज्या भवानी थी और
भगवे रंग का था उनका झण्डा । उस झण्डे को महात्मा
रामदास जी ने उठाया था, वीर शिवा उसी गेरुए झंडे की
छाया में लड़ेथे और इसे सह्याद्रि पर्वत की चोटी पर ले जाकर उन्होंने
स्थापित किया था। उसी को उनके पौत्र शाहू जी तथा उनके वंशजों ने
किन्नर खण्ड की सीमा पर गाड़ने का दृढ़ निश्चय किया ।
इस प्रकार सभा समाप्त हुई और महाराष्ट्र मंडल का इतिहास
सारे भारतवर्ष का आदर्श इतिहास बन गया ।
८.
दिल्ली की ओर प्रस्थान
❀ "अरे बघतां काय ! चला जोरानें चाल करून !
हिन्दूपादशाहीस आतां उशीर काय !" —बाजी रावो
बाजीराव और उस के साथियों की शिवाजी की स्वायत्त में पूर्ण
रूप से कैसी शिक्षा दीक्षा हुई थी तथा उन्होंने अपने महान नेता की
राजनैतिक विद्या तथा युद्धकला का कितनी सूक्ष्म दृष्टि से अध्ययन किया
था—इन दोनों बातों का स्पष्टीकरण शाहूजी के सभापतित्व में दिये
गए बाजीराव के भाषण से भली भांति हो जाता है । बाजीराव ने
महाराष्ट्र के नेताओं को संबोधित करते हुए अपने वक्तृत्व में कहा—
"जिस समय शिवा जी दक्षिण में हिन्दू जाति की स्वतंत्रता की लड़ाई के
लिए प्रयत्न कर रहे थे वह समय अत्यंत ही विकट और आपत्तियों से
परिपूर्ण था । पर उस समय की अपेक्षा आज परिस्थिति हमारे अधिक
❀ अरे देखते क्या हो । शक्तिशाली बनो । हिन्दू-पद-पादशाही की
स्थापना के लिए अब क्या देर है ।
[ ४१ ]
अनुकूल है। ऐसा सुअवसर मिलने पर, हम लोग उन के वंशज होते हुए
भी उत्तरीय भारत में लड़ाई ठानने का साहस करने के स्थान पर नाना
प्रकार की शंकाओं और विचारों में पड़े हुए हैं। इस समय हम निज़ाम,
बंगश तथा मुग़ल सेनाओं पर बड़ी सफलता के साथ धावा बोल सकते
हैं। सर्वप्रथम हमें निज़ाम के विरोध को नष्ट करना चाहिये क्योंकि वर्तमान
काल में मुसलमानों में वही सब से सुयोग्य सेनापति और राजनीतिज्ञ है'।
बाजीराव ने जिस प्रकार अपनी ओजस्विनी वाग् शक्ति द्वारा
अपना मनोरथ सफलता पूर्वक महाराष्ट्र मण्डल के सामने प्रकट किया
उसी प्रकार कर्मक्षेत्र में भी अपने आपको अपने कर्त्तव्य द्वारा शिवाजी का
एक सुयोग्य शिष्य और अनुयायी प्रमाणित कर दिया। ७ अगस्त, सन्
१७२७ ईस्वी को, जबकि मूसलाधार वर्षा हो रही थी, बाजीराओ अपनी
शिक्षित सेना को लेकर रणक्षेत्र में कूद पड़ा और औरंगाबाद में प्रवेश
करके उस पर विजय प्राप्त कर ली। उसके पश्चात् निज़ाम के अधीनस्थ
जलना तथा आस पास के जिलों से अपने बाहुबल से लड़ाई खर्च का
चन्दा वसूल करना आरम्भ कर दिया। ज्योंही निज़ाम की सेना इवाज़खां
की अध्यक्षता में उसका मुक़ाबिला करने के लिये पहुंची बाजीराओ ने
उन्हें अपनी चतुरता से थोड़ी देर तक निरुत्साहिता प्रकट करते हुए
फंसाये रक्खा और फिर अचानक ही अपने दुश्मनों की सेना को छोड़
कर माहुर की ओर कूच कर दिया। फिर वहां से औरंगाबाद की तरफ बढ़
गया और यह बात फैला दी कि उस नगर से भी चन्दा वसूल किया
जायगा। निज़ाम ने जब यह सुना तो वह उस धनी देश को बचाने के लिये,
इवाज़खां के साथ सम्मिलित होने के उद्देश्य से शीघ्रता से उसी ओर बढ़ा।
जब बाजीराओ ने अपनी इस चाल में सफलता देखी और देखा कि निज़ाम
इस धोखे में आ गया है तो उसने खानदेश को छोड़कर गुजरात में प्रवेश
किया और वहां के मुग़ल वायसराय को, विकट हंसी करते हुए, सूचना
दे दी कि मैं इस देश पर निज़ाम की आज्ञा पा कर चढ़ाई कर रहा हूं।