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हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)

Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished254 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 254 में से

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पृष्ठ 37

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किसी व्यक्ति-विशेष या किसी एक प्रान्त की सुख-शांति पर निर्भर नहीं
है, बल्कि इसका अन्त सारे भारतवर्ष में एक महान् हिन्दू-साम्राज्य एवं
“हिन्दू-पद-पादशाही” के स्थापित होने के साथ होगा। इस लिये हे
महाराष्ट्रवासियो ! उक्त कार्य की पूर्ति के लिये सहस्रों और लाखों की
संख्या में तलवार लेकर निकल पड़ो और अपनी गेहुआ ध्वजा को,
नर्मदा को पार कर चम्बल के उस पार स्थापित कर दो। गंगा, यमुना,
सिन्ध और ब्रह्मपुत्र को पार करते हुए अन्त में समुद्र के किनारे तक
पहुंच जाओ और श्रीरामदास जी के महान् के निम्न उपदेश कोस दैव ध्यान
में रख कर अपनी मनोरथपूर्ति के लिये प्रयत्न करते जाओ, तथा उसके
साथ-साथ अपने पैर भी आगे बढ़ाते जाओ :-
"देव मस्तकीं धरावा। अवघा हलकल्लोल करावा ॥
मुलूख बडवा बुडवावा। धर्मसंस्थापनेसाठी ॥ ॐ
इन उपरोक्त महान उद्देश्यों ने ही बाजीराव, चिम्माजी अप्पा,
ब्रह्मेन्द्र स्वामी, दीक्षित, माथुर बाई आंगरे, इत्यादि महाराष्ट्रीय नेताओं
को प्रोत्साहित किया और उन्हें मरहठा कार्यक्रम की वृद्धि करने के लिए
बाधित किया। इस समय अब उन लोगों के सामने केवल यही प्रश्न नहीं
उठता था कि - "क्या होना चाहिये ?" बल्कि यह होता था कि "क्या
किया जाय"। प्रथम तो महाराष्ट्रवासियों का ध्येय कोई विशेष प्रान्तीय
हिन्दू-राज्य स्थापित करने का था ही नहीं और यदि ऐसा करने की
उनकी इच्छा होती भी, तो उसका पूर्ण होना असम्भव था, क्योंकि
महाराष्ट्र के हिन्दुओं का भाग्य उत्तर में सिन्ध से लेकर दक्षिण में समुद्र
तक के हिन्दुओं के भाग्य के साथ नत्थी हुआ था।
महाराष्ट्र के राजनीतिज्ञ भली भांति जानते थे कि भूतकाल में
प्रान्तीय भेदभाव ने ही भारतवर्ष को पराधीन बनाया था, और इसी
ॐ देवताओं को पूजनीय मान कर उन को सिर पर धारण कीजिये।
चारों ओर धर्म का डंका बजा दो। धर्म की स्थापना के लिये अपना सर्वस्व
बलिदान कर देना चाहिये।