हिन्दू पद-पादशाही (मराठा साम्राज्य एवं हिन्दू पुनरुत्थान इतिहास)
Hindu Pad-Padashahi by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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में रखकर कहने लगे "हम लोग अब अवश्य सीधे दिल्ली की ओर बढ़ेंगे
और यवन राज्य की जड़ से उखाड़ देंगे। ऐ हिन्दू शूरवीरो ! तुम यहां
खड़े होकर क्यों आगा-पीछा सोच रहे हो। आगे बढ़ो, आगे बढ़ो,
"हिन्दू-पद-पादशाही" स्थापित करने का समय आ गया है। क्या ऐसा
करना असम्भव है ? नहीं, नहीं, कभी नहीं । मैंने अपनी तलवार
शत्रुओं की तलवार से नाप ली है-उनकी शक्ति का पता लगा लिया है।"
फिर वह छत्रपति को सम्बोधित करते हुए कहने लगे-“ऐ महाराज छत्रपति
शाहू जी ! मैं आप से अधिक धन या जन की याचना नहीं करता
हूं, केवल आप मुझे आज्ञा दें और साथ ही यह आशीर्वाद भी दें कि मैं
सीधे दिल्ली जाऊं और उस हानिकारक वृक्ष की जड़ पर कुल्हाड़ी चला
कर उसे शाखाओ सहित नष्ट कर दूं"।
बाजीराव के उत्साहपूर्ण तथा पवित्र आन्तरिक भावों से भरे हुए
वाक्यों को सुनकर छत्रपति शाहू जी का शरीर रोमांचित हो गया, और
उन्हें अनुभव होने लगा कि उनकी नसों में शिवा जी का रक्त प्रवाहित
होने लग पड़ा है, और जोश भरे शब्दों में उन्ह ने उत्तर दिया-“ऐ मेरी प्रजा
के प्रमुख शूरवीरो ! जाओ, जिधर चाहो, मेरी सेना को विजय-पर-विजय
प्राप्त कराते हुए ले जाओ और दिल्ली ही क्या, इस गेरुआ वस्त्र की
ध्वजा को, विजय लाभ कराते हुए, हिमालय की चोटी और यदि होसके
उसके परे किन्नर खण्ड पर स्थापित कर दो।" यह गेरुआ ध्वजा सोन-
चांदी के काम से सुशोभित नहीं थी, बल्कि उन वैरागियों और संन्यासियों
के गेरुआ रंग में रंगी हुई थी, जो सांसारिक माया के त्याग, ईश्वर-
भक्ति तथा लोक-सेवा की ओर मनुष्यों को ले जाता है।
शाहू जी की आज्ञा पाकर मरहठे उस गेरुआ ध्वजा के पीछे
चल पड़े। यह गेरुआ ध्वजा उन्हे धार्मिक कर्त्तव्यों का स्मरण कराने
तथा उनको सत्पथ पर ले जाने के लिये दी गयी थी । इसी ध्वजा
के सहारे मरहठे अपने उच्च आदर्श पर आरूढ़ रह कर धर्म और जाति