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सर्वकोश
हस्त्यायुर्वेद: गजशास्त्र (पालकाप्य मुनि - सम्पूर्ण गज-चिकित्सा, शरीर-रचना एवं मत्त-गज प्रबन्धन)

हस्त्यायुर्वेद: गजशास्त्र (पालकाप्य मुनि - सम्पूर्ण गज-चिकित्सा, शरीर-रचना एवं मत्त-गज प्रबन्धन)

Hastyayurveda Gajashastra of Palakapya Muni with Commentary

पालकाप्य मुनि (सम्पादक: पं. शिवदत्त शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished742 पृष्ठ

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पृष्ठ 582

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Wait, "तृणमभ्याद्य जायते" vs "तृणमद्भ्यश्च जायते":
Look at "तृणमद्भ्यश्च जायते":
तृ ण म द्भ्य श्च जा य ते ॥ ७१ ॥
Yes, it is definitely तृणमद्भ्यश्च जायते!

Verse 72:
पार्थिवं स्थावरं चैव प्रभूतं जङ्गमं तथा ॥
(Looking closely at L20:
पा र्थि वं स्था व रं चै व प्र भू तं ज ङ्ग मं त था ॥
Yes! The letters are: पा, र्थि (थ with i and repha), वं, स्था, व, रं!
It is absolutely पार्थिवं स्थावरं चैव प्रभूतं जङ्गमं तथा ॥)
आप्याययति तत्सर्वं सोमो वै पृथिवीपते ॥ ७२ ॥
(In print: आप्याययति तन्त्सर्वं सोमो वै पृथिवीपते ॥ ७२ ॥)

Verse 73:
सोमात्मकत्वात् मातङ्गा शीतसात्म्या विशेषतः ॥
(Look at शीतसात्म्या: शी - त - सा - त्म्या! Yes!)
तस्मात्तदा गजेन्द्रैः वर्षापेतोत्सवा भृशम् ॥ ७३ ॥
Wait, look at: "तस्मात्तदा गजेन्द्र