हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)
Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense
कवि जोधराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ हम्मीररासो
ऊरण* सु तंत्र करि सूत्र मानि ॥१५॥
द्व माया ईस्वर उभै नाँम ।
करि महततत्व† गुण÷ प्रगट जाँम+ ॥
यह धरि चरित्र¹ लीला अपार ।
हरि नाभिकोस पंकज प्रचार² ॥१६॥
तिहिं-प्रगट भए ब्रह्मा सु आदि ।
बाराहकल्प यह कहि अनादि ॥
बहु काल ब्रह्म-चिंता सु कीन ।
मैं कौन, करौं का, कर्म कीन³ ॥१७॥
अध उद्ध० भम्यौ बहु कमलि-नाल ।
नहिं पार लह्यौ तदपि मुहाल⁴ ॥
करि ध्याँन स्वयंभू लख्यौ आप ।
तप करयौ सृष्टि उपजै •अमाप ॥१८॥
तप करयौ स्वयंभूं अति प्रचंड ।
तब भयउ प्रजापति बिधि अखंड ॥
मानसी सृष्टि कीनी उदार ।
सब बृक्ष बीज किन्हे अपार ॥१९॥
जल गगन तेज भुव बायु मानि ।
१ धरी चित्त । २ वढ्यौ पंकज अपार प्रसार । ३ कर्मचीन,
कर्महीन । ४ मुझाय ।
* ऊरण (ऊर्णा)=ऊन । † महततत्व (महत्तत्त्व)—सांख्य के
मतानुसार प्रकृति का प्रथम विकार, बुद्धि । ÷गुण—सांख्य के मतानुसार
सत्त्व, रज तथा तम गुण । इस शास्त्र में इन गुणों की साम्यावस्था को
प्रकृति कहा गया है । इसी प्रकृति से सृष्टि का विकास होता है ।
+ जाम=प्रहर, काल । ० उद्ध (ऊर्ध्व)=ऊपर ।
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