गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 546, कुल 600 में से
संदर्भ में पढ़ें५०८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ६। क० ६
[ सहायक होता लोग ] एक उक्थ वाले और दो सूक्त वाले होते हैं। (असौ वै होता
यः असौ तपति, सः वै एकः एव, तस्मात् एकसूक्तः) [ उस का उत्तर ] वह ही
[सूर्य] होता [ जल का दाता और ग्रहीता ] है जो वह तपता है वह ही [ सूर्य ] एक ही
है, इस लिये वह एक सूक्त वाला है। (सः यत् विध्यातः द्वौ इव भवति तेजः एव
मण्डलम् भाः अपरं शुक्लम् अपरं कृष्णम्, तस्मात् द्वयुक्थः) वह [ सूर्य ] जब
विविध प्रकार ध्यान किया गया, दो के समान तेज होता है, तेज ही मण्डल और किरण है,
[ सामने की ओर अथवा किरण में] एक शुक्ल रूप और दूसरा [ पिछली ओर अथवा किरण
में ] कृष्ण रूप है इस लिये वह [ होता ] दो उक्थ वाला है। (रश्मयः वाव होत्राः ते
वै एकैकम् तस्मात् एकोक्थाः) किरणों [ के सामने ] ही होत्रक लोग हैं, वे [ दोनों
किरण और होत्रक ] निश्चय करके एक एक हैं, इस लिये वे [ होत्रक ] एक उक्थ वाले
होते हैं। (तत् यत् एकैकस्य रश्मेः द्वौ द्वौ वर्णौ भवतः, तस्मात् द्विसूक्ताः) फिर जो
एक एक किरण के दो दो रूप [ शुक्ल और कृष्ण ] होते हैं। इस लिये वे [ होत्रक ] दो
सूक्त वाले होते हैं ॥
(संवत्सरः वाव होता, सः वै एकः एव, तस्मात् एकसूक्तः) संवत्सर [ के
समान ] ही होता है, वह निश्चय करके एक ही है, इस लिये वह [ होता ] एक सूक्त वाला
है। (तस्य यत् द्वयानि [द्व्ययनानि] अहानि भवन्ति अन्यानि शीतानि अन्यानि
उष्णानि, तस्मात् द्वयुक्थः) उस [ संवत्सर ] के जो दो अयन [ सूर्य के मार्ग, दक्षि-
णायन और उत्तरायण ] वाले होते हैं, एक शीत और एक उष्ण, इस लिये वह [ होता ] दो
उक्थ वाला होता है। (ऋतवः वाव होत्राः, ते वै एकैकं, तस्मात् एकोक्थाः)
ऋतुओं [ के समान ] ही होत्रक लोग हैं, वे ही एक एक हैं, इस लिये वे [ होत्रक ] एक
उक्थ वाले हैं। (तत् यत् एकैकस्य ऋतौ [ =ऋतोः ] द्वौ द्वौ मासौ भवतः, तस्मात्
द्विसूक्ताः) सो जो एक एक ऋतु के दो दो महीने होते हैं इस लिये वे [ होत्रक ] दो सूक्त
वाले हैं ॥
(पुरुषः वाव होता, सः वै एकः एव तस्मात् एकसूक्तः) पुरुष [ के समान ]
ही होता है वह निश्चय करके एक ही है, इस लिये वह [ होता ] एक सूक्त वाला है।
६-(आहुः) कथयन्ति (विध्यातः) वि+ध्यै चिन्तने-क्तः। विविध-
चिन्तितः (भाः) किरणः (वर्णौ) शुक्लादिरूपे (द्वयानि) द्व्ययनानि द्वे अयने
दक्षिणायनमुत्तरायणं च येषां तानि (ऋतौ) ऋतोः (प्रत्यङ्) प्रति+अञ्चु
गतिपूजनयोः-क्विन्। पश्चाद्देशभवः (द्युतिः) कंशम्यां बभ्रयुस्तिस्तुतयसः (पा०
५।२।१३८) द्वि-तिः १ मत्यर्थे, वर्णव्यत्यये सति सम्प्रसारणेन वकारस्य
उकारः इकारस्य यकारः। द्वित्वयुक्तम् (अतिरिच्यते) अधिके वर्तते (व्यवच्छि-
१-द्वि शब्द से न तो ति प्रत्यय का विधान है, न ही व के स्थान पर उ करने मात्र
से द्युति बन सकता है। इस प्रकार अर्थ भी सङ्गत नहीं हो पाता। अतः यह शब्द दीप्ति अर्थ
वाली द्युत धातु से औणादिक इन् प्रत्यय करके बनाना समीचीन प्रतीत होता है ॥ सम्पा० ॥