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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

पृष्ठ 285, कुल 600 में से

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पृष्ठ 285

गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ५ । क० २३ ॥ २४७
हैं, तब मेरा [ मत है ]-प्रजापति देवता वाले को [ पशु नामक पाक यज्ञ को वे प्राप्त
करते हैं ] क्योंकि जो ही सविता [ सर्वप्रेरक परमात्मा ] है, वही प्रजापति [ प्रजापालक
परमेश्वर ] है, ऐसा कहते हैं, इसलिये वह सविता और प्रजापति [ नाम वाला यज्ञ ] एक
है । ( अथ [ ये ] अग्नीन् तेन यजेरन् ते समानधिष्टचाः एव स्युः ) फिर [ जो लोग
आहवनीय गार्हपत्य और दक्षिण ] अग्नियों को उस [ पाक यज्ञ ] से यज्ञ करें वे समान
प्रगल्भ [ जीतने वाले ] ही होवें । ( आ उषा सम्भरणीया, या उषा सम्भरणीया यान्
अग्नीन् विन्युप्य तया यजेरन्, तेन अनाधिष्टचाः एव स्युः ) फिर उषा [ उषा नामक
प्रभात वेला की इष्टि ] करनी चाहिये, जो उषा [ इष्टि ] करनी चाहिये और जिन
[ तीन ] अग्नियों को विविध प्रकार स्थापित करके उस [ उषा ] के साथ उस [ पाक यज्ञ ]
से [ जो ] यज्ञ करें वे अजेय ही हो जावें । ( आ दीक्षणीया, या दीक्षणीया, यान्
अग्नीन् सन्युप्य तया यजेरन् ते समानधिष्टचाः एव स्युः ) फिर दीक्षणीया
[ इष्टि है ] जो दीक्षणीया है और जिन अग्नियों को यथावत् स्थापित करके [ उस
दीक्षणीया के साथ ] उस [ पाक यज्ञ ] से [ जो ] यज्ञ करें वे समान प्रगल्भ [ जीतने
वाले ] ही होवें । ( आ उदवसानीया, या उदवसानीया यान् अग्नीन् विन्युप्य
तया तेन यजेरन् अनाधिष्टचाः एव स्युः ) फिर उदवसानीया [ इष्टि है ], जो
उदवसानीया है और जिन अग्नियों को विविध प्रकार स्थापित करके उस [ उदवसा-
नीया ] के साथ उस [ पाक यज्ञ ] से यज्ञ करें वे अजेय ही हो जावें । ( अथ यदि
यजमानस्य पार्श्वतः उपतयेद् अग्नीन् आधाय तान्त् आसीत यावद् दग्धः स्यात् )
फिर यदि यजमान के पास में वह [ पाक यज्ञ ] आ जावे, अग्नियों को स्थापित करके वह
[ यजमान ] तब तक बैठे जब तक वह [ पाक यज्ञ ] भस्म होवे । ( यदि प्रेयात् तं स्वैः
एव अग्निभिः दहेत् ) यदि वह [ अग्नि ] बुझ जावे उसको अपनी ही अग्नियों से जलावे ।
( दश इतरे यजमानाः वै अग्निभिः आसते इति वदन्तः ) दश दूसरे यजमान लोग ही
[ तीनों ] अग्नियों के साथ बैठते हैं [ यज्ञ करते हैं ] ऐसा कहते हैं । ( तस्य तत् एव
पतिः ) प्रजापालकः परमेश्वरः ( वदन्तः ) वदन्ति ( समः ) तुल्यः ( अग्नीन् )
आहवनीयगार्हपत्यदक्षिणाग्नीन्-गो० पू० २ । २२ ( तेन ) पशुना पाकयज्ञेन
( समानधिष्टचाः१ ) त्रिधृषा प्रागल्भ्ये-क्यप्, तकारागमः धिष आदेशः । धृषेर्षिष
च संज्ञायाम् ( उ० २ । ८२ ) इति निर्देशात् । तुल्यप्रगल्भाः (आ) समुच्चये (उषा)
उषानामकेष्टिः ( संभरणीया ) सम्पादनीया ( विन्युप्य ) वि + नि + डुवप् बीज-
सन्ताने-ल्यप् । विन्यस्य । प्रतिष्ठाप्य ( अनाधिष्टचाः ) नञ् + आ + त्रिधृषा
प्रागल्भ्ये-क्यप्, पूर्ववत्सिद्धिः । अनाधृष्याः अनभवनीयाः अजेयाः ( संन्युप्य )
सम्यङ्न्यस्य ( उपतयेत् ) तय गतौ । उपगच्छेत् ( दग्धः ) भस्मीभूतः ( प्रेयात् )
प्रगच्छेत् । नश्येत् ( दहेत् ) भस्मीकुर्यात् । दीपयेत् ( आशिषः ) आशीर्वादाः ॥
१. यहाँ ज०सं० में "समानधिष्ण्याः" पाठ है, सानसिवर्ण... धिष्ण्यशल्याः (उ० ४ । १०८)
से धिष्ण्य शब्द ऋकार को इकार एवं ण्य प्रत्यय करके सिद्ध होता है । वस्तुतः यही
समीचीन प्रतीत होता है। धिष्टच की सिद्धि में बाहुलक से कई कार्य माने हैं ॥सम्पा०॥