सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 185

१७६ अयोध्याकाण्ड
[फिर सीताजीको साथ चलनेके लिये हठ करती देख भगवान्
रामने कहा—] हे प्रिये ! हमारे कहनेसे तुम घर ही रहो । हे
गृहस्वामिनी ! तुम सासके चरणोंकी सर्वदा आदरपूर्वक सेवा करो,
यह तुम्हारे लिये अत्यन्त भली बात होगी ॥ १ ॥ हे राजकुमारि !
वनका मार्ग बड़ा ही कठिन और कण्टकाकीर्ण हैं। हे गंजगामिनि !
तुम अपने कोमल चरणो से उसपर कैसे चल सकोगी ; अगणित दिन
और रात्रियों तक तुम दुःसह वायु, वर्षा शीत और घाम कैसे सहन
कर सकोगी ; ॥ २ ॥ हे विद्युत्कान्तिमयि ! मैं भी पिताजीकी
आज्ञाका पालन कर शीघ्र ही लौट आऊँगा।' तुलसीदासजी कहते हैं,
प्रभुके ये वियोगसूचक वचन सुनकर सीताजी उन्हें सह न सकीं
और मूर्च्छित हो गयीं ॥ ३ ॥
[ ६ ]
कृपानिधान सुजान प्रानपति, संग बिपिन ह्वै आवौंगी।
गृहतेँ कोटि-गुनित सुख मारग चलत, साथ सचु पावौंगी ॥ १ ॥
थाके चरनकमल चापौंगी, श्रम भए बाउ डोलावौंगी।
नयन-चकोरनि मुखमयंक-छबि सादर पान करावौंगी ॥ २ ॥
जौ हठि नाथ राखिहौ मोकहँ, तौ सँग प्रान पठावौंगी।
तुलसिदास प्रभु बिनु जीवत रहि क्यों फिरि बदन देखावौंगी ? ॥ ३ ॥
[सीताजी कहने लगीं—] 'मैं अपने कृपानिधान सुजान-
शिरोमणि प्राणनाथके साथ वनमें रह आऊँगी। मार्गमें आपके साथ
चलते हुए सचमुच घरसे भी करोड़ों गुना सुख पाऊँगी ॥ १ ॥
जब आप थक जायँगे तो मैं आपके चरणकमल दबाऊँगी और श्रम
मालूम होनेपर हवा करूँगी तथा अपने नेत्ररूप चकोरोंको आपके