गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १८९
मुखचन्द्रकी छवि आदरपूर्वक पान कराऊँगी ॥ २ ॥ और हे नाथ !
यदि आप हठपूर्वक मुझे यहीं छोड़ जायँगे तो मैं लाचार होकर
अपने प्राणोंको ही आपके साथ भेज दूँगी; क्योंकि आपके चले
जानेपर फिर प्रभुके बिना जीवित रहकर मैं अपना मुख कैसे
दिखाऊँगी;' ॥ ३ ॥
[ ७ ]
कहौ तुम्ह बिनु गृह मेरो कौन काजु ?
बिपिन कोटि सुरपुर समान मोको, जो पै पिय परिहरयो राजु ॥ १ ॥
बलकल बिमल दुकूल मनोहर, कंद-मूल-फल अमिय नाजु ।
प्रभुपद कमल बिलोकिहैं छिन छिन, इहितें अधिक कहा सुख-समाजु ? ॥ २ ॥
हौं रहौं भवन भोग लोलुप ह्वै, पति कानन कियो मुनिको साजु ।
तुलसिदास ऐसे बिरह-बचन सुनि कठिन हियो बिहरो न आजु ॥ ३ ॥
'कहिये, भला आपके बिना इस घरमें मेरा क्या काम है;
जब प्रियतमने राज्य त्याग दिया तब मेरे लिये वन ही करोड़ों
स्वर्गलोकोंके समान है ॥ १ ॥ मुझे तो वल्कल ही अति मनोहर
और निर्मल दुकूल होगा और कन्द-मूल-फल ही अमृतमय अन्न
होगा । अहा ! मेरे नेत्र क्षण-क्षणमें प्रभुके चरणकमलोंका दर्शन
करेंगे—इससे अधिक और क्या सुखकी सामग्री होगी; ॥ २ ॥
हाय ! मैं तो भोगकी लालसासे राजभवनमें रहूँ और पतिदेव वनमें
मुनियोंके ठाटसे निवास करें—ऐसे विरहसूचक वचनोंको सुनकर
भी आज मेरा कठोर हृदय क्यों विदीर्ण नहीं हो जाता;' ॥ ३ ॥
[ ८ ]
प्रिय निठुर बचन कहे कारन कवन ?
जानत हौ सबके मनकी गति, मृदुचित परम कृपालु, रवन ! ॥१॥