गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगीतावली १७८
(माता कौसल्या कहने लगी—) 'बेटा राम ! मैं किस प्रकार
घरमें रह सकूँगी; मैं बारंबार अंक भरकर गोदमें ले किससे 'लाल'
कहकर बोलूँगी; ॥ १ ॥ मेरे लाल ! तुम जो बहुत-से बालकोंको
साथमें लेकर इस आँगनमें विहार किया करते थे सो हे बेटा ! तुम्हारी
उन बहुत-सी बाललीलाओंको याद कर-करके मेरे प्राण कैसे रह
सकेंगे; ॥ २ ॥ जिन कानोंसे तुम्हारे सुन्दर बोल सुन-सुनकर मैं
स्नेहमें डूब जाती थी, आज उन्हींसे तुम्हारे वनगमनका समाचार सुन
रही हूँ। भला, मुझसे अधिक अभागिनी और कौन होगी ॥ ३ ॥ हे
राम ! तुम्हारा मुखारविन्द न देखनेपर तो मुझे एक-एक निमेष
युगके समान बीतता है; अब यदि (चौदह) वर्ष बीतनेपर भी
यह शरीर रह गया तो बेटा ! बलिहारी जाऊँ, इसकी तुम्हारे प्रति
क्या प्रीति समझी जायगी;' ॥ ४ ॥ तुलसीदास कहते हैं, माताको
इस प्रकार व्याकुल देख श्रीहरि प्रेम से अधीर हो गये। उनका कण्ठ
भर आया, नेत्रों से जल बहने लगा और उन्होंने बार-बार शीघ्र ही
लौट आनेके लिये कहा ॥ ५ ॥
राग बिलावल
[ ५ ]
रहहु भवन हमरे कहे, कामिनि ।
सादर सासु-चरन सेवहु नित, जो तुम्हरे अति हित, गृह-स्वामिनि ॥१॥
राजकुमारि ! कठिन कंटक मग, क्यों चलिहौ मृदु पद गजगामिनि ।
दुसह बात, बरषा, हिम, आतप कैसे सहिहौ अगनित दिन जामिनि ॥२॥
हौं पुनि पितु-आग्या प्रमान करि ऐहौं बेगि सुनहु द्युति-दामिनि ।
तुलसिदास प्रभु-बिरह-बचन सुनिसहिन सकी, मुरछित भई भामिनि ॥३॥