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सर्वकोश
घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

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घट रामायण १३
हाथरस में उनकी समाधि मौजूद है और बहुत से लोग वहाँ दर्शन को जाते हैं और साल में एक
बार भारी मेला लगता है।
यद्यपि उनको इस संसार से गुप्त हुए ६० बरस$^१$ से कम हुए हैं पर उनके अनुयायियों ने न जाने
किस मसलहत से उनके समय को भूल भुलैया में डाल रखा है कि लोग सैकड़ों बरस समझते हैं। मुंशी
देवी प्रसाद साहब ने भी, जो अब इस मत के आचार्य कहे जाते हैं, घट रामायण की भूमिका में इस
भ्रम को दूर करने की कोशिश नहीं की है। हमने इस मत के कई साधुओं तथा और गृहस्थों से तुलसी
साहब का जीवन समय पूछा तो उन्होंने एक ओर अब से साढ़े तीन सौ बरस पहले बताया जो कि
गोसाईं तुलसीदास जी जगत प्रचलित सगुण रामायण के कर्ता का समय है।
तुलसी साहब ने निःसन्देह घट रामायण में फरमाया है कि पूर्व जन्म में आप ही गुसाईं तुलसीदास
जी के चोले में थे और तभी घट रामायण को रचा परन्तु चारों ओर से पंडितों, भेषों और सर्वमतवालों
का भारी विरोध देखकर उस ग्रन्थ को गुप्त कर दिया और दूसरी सगुन रामायण उसकी जगह
समयानुसार बना दी।
इससे यह निष्कर्ष साफ तौर से निकलता है कि घट रामायण को तुलसी साहब ने जब दूसरा चोला
अनुमान एक सौ चालीस बरस पीछे धारण किया तब प्रगट किया न कि पहले चोले से। सवाल यह है
कि कोई सन्त तुलसी साहब के नाम के पिछले सत्तर पचहत्तर बरस के अन्दर हाथरस में उपस्थित थे
या नहीं, जो वहाँ सत्संग कराते थे और उपदेश देते थे और जहाँ उनकी समाधि अब तक मौजूद है।
हमको इसमें कोई संदेह नहीं है कि ऐसे महापुरुष अवश्य थे क्योंकि हम आप उनकी समाधि का दर्शन
कर आए हैं और दो प्रामाणिक सत्संगी अब तक मौजूद हैं, जिन्होंने अपने लड़कपन में तुलसी साहब के
दर्शन किये थे और उनमें से एक को तुलसी साहब ने अपनी घट रामायण आप दिखाई थी।
तुलसी साहब के मतवाले उनकी महिमा समझकर इस बात पर बड़ा जोर देते हैं कि महाराज ने
कोई गुरु धारण नहीं किया था और उसके प्रमाण में यह कड़ी पेश करते हैं-
एक विधी चित रहूँ सम्हारे। मिलै कोइ संत फिरौ तिस लारे।
यह कड़ी तुलसी साहब के 'पूर्व जन्म के चरित्र' में पहली चौपाई की बीसवीं कड़ी है और उसी के
दो पन्ने आगे। बरनन भेद संत मत पहला सोरठा लोगों की इस बात का खंडन करता है-
तुलसी संत दयाल निज निहाल को कौ कियौ।
लियो सरन के माँहि जाइ जन्म फिरि करि जियौ ॥
इसमें सन्देह नहीं कि तुलसी साहब स्वयं सन्त थे-जिनको गुरु धारण करने की जरूरत न थी
लेकिन मरजादा के लिए किसी को नाम मात्र को अवश्य गुरू बना लिया होगा और इसके लिए संत
सद्गुरु कबीर साहब और समस्त सन्तों की नजीर मौजूद है।$^२$
तुलसी साहब अक्सर हाथरस के बाहर एक कंबल ओढ़े और हाथ में डंडा लिये दूर-दूर शहरों में
चले जाया करते थे। जोगिया नाम के गाँव में जो हाथरस से एक मील पर है अपना सत्संग जारी किया
और बहुतों को सत्य मार्ग पर लगाया।
इनकी हालत अक्सर गहरे खिंचाव की रहा करती थी और ऐसे आवेश की दशा में धारा की तरह
ऊँचे घाट की बानी उनके मुख से निकलती-जो कोई निकटवर्ती सेवक उस समय पास रहा, उसने जो
१. वर्ष का यह संदर्भ सन् १९३७ का है, क्योंकि घट रामायण का प्रथम संस्करण बेलविडियर प्रेस से इसी सन् में छपा था।
२. घट रामायण की समाप्ति पर त्रोटक सं० २ में वे 'गुरु के धाम' और उसके महत्त्व की चर्चा करते हैं-
गुरु धाम कंजा मनी मैल मंजा। धनु तोड़ भंजा सो लीलं अपीलं॥