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गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

३. २३- ] कलासवर्णव्यवहारः [ ३९
अर्धत्रिभागपादाः पञ्चांशकषष्ठसप्तमाष्टांशाः । दृष्टा नवमश्चैषां पृथक् पृथग्ब्रूहि गणक घनम् ॥१८॥
त्रितयादि चतुश्रयकोऽशगणो द्विमुखद्विचयोऽत्र हरप्रचयः ।
दशकं पदमाशु तदीयघनं कथय प्रिय सूक्ष्ममते गणिते ॥१९॥
शतकस्य पञ्चविंशस्याष्टविभक्तस्य कथय घनमूलम् ।
नैवयुतसप्तशतानां विंशानामष्टभक्तानाम् ॥२०॥
भिन्नघने परिदृष्टघनानां मूलमुदग्रमते वद मित्र ।
त्र्यूनशतद्वययुग्द्विसहस्रया श्चापि नवप्रहतत्रिहृतायाः ॥२१॥
इति भिन्नवर्गवर्गमूलघनघनमूलानि ।
भिन्नसंकलितम्
भिन्नसंकलिते करणसूत्रं यथा—
पदमिष्टं प्रचयहतं द्विगुणप्रभवान्वितं चयेनोनम् ।
गच्छाधेनाभ्यस्तं भवति फलं भिन्नसंकलिते ॥२२॥

१ M सप्तशतस्यापि सखे व्येकोनत्रिंशकाष्टकासस्य ।

१/२, १/३, १/४, १/५, १/६, १/७, १/८ और १/९ राशियाँ दी गई हैं; इनके घन अलग-अलग बतलाओ ॥१८॥ दिये गये
भिन्नों के अंश ३ से आरम्भ होकर ४ द्वारा उत्तरोत्तर बढ़ते हैं; हर २ से आरम्भ होकर उत्तरोत्तर २ द्वारा
बढ़ते हैं । ऐसे भिन्नात्मक पदों की संख्या १० है । हे तीव्र बुद्धिधारी गणक मित्र ! बतलाओ कि उनके
घन क्या होंगे ? ॥१९॥ १२५/८ और ७२९/८ के घनमूल निकालो ॥२०॥ हे अग्रमते मित्र ! भिन्नों के घन
निकालने के प्रश्नों में प्राप्त घन राशियों के घनमूल और २१९७/२७ का घनमूल निकालकर बतलाओ ।
इस प्रकार कलासवर्ण व्यवहार में भिन्न सम्बन्धी वर्ग, वर्गमूल, घन, घनमूल नामक परिच्छेद
समाप्त हुआ ।
भिन्न संकलित ( भिन्नात्मक श्रेणियों का योगकरण )
भिन्नात्मक श्रेणियों का संकलन सम्बन्धी नियम—
समान्तर श्रेढि में भिन्नात्मक श्रेढि को बनाने वाले पदों की चुनी हुई संख्या को प्रचय द्वारा
गुणित करते हैं और प्रथमपद की द्विगुणित राशि में मिलाते हैं । प्राप्त फल को प्रचय से हासित करते
हैं । जब यह परिणामी राशि पदों की संख्या की आधी राशि से गुणित की जाती है, तब वह समान्तर
श्रेढि की भिन्नात्मक श्रेढि के योग को उत्पन्न करती है ॥२२॥

( २२ ) बीजीयरूप से, य = ( नब + २अ - ब ) न/२ है । इसके लिये द्वितीय अध्याय की ६२वीं
गाथा देखिये ।

४० ] गणितसारसंग्रहः [ २. २४-
अत्रोद्देशकः
द्वित्र्यंशः षड्भागस्त्रिचरणभागो मुखं चयो गच्छः ।
द्वौ पञ्चमौ त्रिपादो द्वित्र्यंशोऽन्यस्य कथय किं वित्तम् ॥२३॥
आदिः प्रचयो गच्छस्त्रिपञ्चमः पञ्चमस्त्रिपादांशः ।
सर्वांशहरौ वृद्धौ द्वित्रिभिरा सप्तकाच्च का चितिः ॥२४॥
इष्टगच्छस्याद्युत्तरवर्गरूपघनरूपधनानयनसूत्रम्—
पदमिष्टमेकमादिर्व्यकेष्टदलोद्धृतं मुखोनपदम् । प्रचयो वित्तं तेषां वर्गो गच्छाहतं वृन्दम् ॥२५॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
जिस श्रेढि में प्रथम पद, प्रचय और पदों की संख्या क्रमशः २/३, १/६ और ३/४ हों तथा ऐसी ही एक
और श्रेढि में ये क्रमशः २/५, ३/४ और २/३ हों तो इन श्रेढियों के योग बतलाओ ॥२३॥ समानान्तर श्रेढि में
दी गई एक श्रेढि के प्रथम पद, प्रचय और पदों की संख्या क्रमशः ३/५, १/५ और ३/४ है। इन सब
भिन्नात्मक राशियों के अंश और हर उत्तरोत्तर २ और ३ द्वारा क्रमशः बढ़ाये जाते हैं जब तक कि ७
श्रेढियाँ इस प्रकार तैयार नहीं हो जातीं । बतलाओ कि इनमें से प्रत्येक श्रेढि का योग क्या है ?॥२४॥
जब योग, दी हुई श्रेढि के पदों की संख्या का वर्गरूप या घनरूप हो तो चुने हुए पदों वाली
श्रेढि के सम्बन्ध में प्रथम पद, प्रचय और योग निकालने का नियम—
जो भी पदों की संख्या चुनी गई हो उसे लो और प्रथम पद को एक मान लो। पदों की संख्या
को प्रथम पद द्वारा हासित कर और तब एक कम पदों की संख्या की आधी राशि द्वारा भाजित करने
से प्रचय प्राप्त होता है । इनके सम्बन्ध में श्रेढि का योग पदों की संख्या की राशि का वर्ग होता है ।
यह जब पदों की संख्या द्वारा गुणित किया जाता है तो योग का घन प्राप्त होता है ॥२५॥
( २३ ) जब श्रेढि में पदों की संख्या भिन्न के रूप में दी गई हो तो स्पष्ट है कि ऐसी श्रेढि
साधारणतः बनाई नहीं जा सकती । परन्तु, अभिप्राय यह प्रतीत होता है कि दिया गया नियम इन
दशाओं में ठीक उतरता है ।
( २५ ) स्पष्ट है कि, सूत्र में य = (न/२)(२अ + न - १ ब), और जब अ = १ और ब = २(न - अ)/(न - १)
हो तो य का मान न² के तुल्य हो जाता है । इस योग में न का गुणन करने में, अ और ब का न
द्वारा गुणन भी अंतर्भूत है ताकि जब अ = न और ब = ((न - अ)/(न - १)) २न हो, तब य = न³ हो। कुछ और विचार
करने पर ज्ञात होगा कि अ का मान चाहे पूर्णांक अथवा भिन्नीय हो फिर भी ब का २(न ~ अ)/(न - १)
रूपवाला मान य की अर्हा को न² के रूप में ला सकता है ।
‘~’ चिह्न का अर्थ अन्तर होता है ।

-२, २८ ] कलासवर्णव्यवहारः [ ४१
अत्रोद्देशकः
'पदमिष्टं द्वित्र्यंशो रूपेणांशो हरश्च संवृद्धः । यावद्दशपदमेषां वद मुखचयवर्गवृन्दानि ॥२६॥
इष्टघनधनाद्युत्तरगच्छानयनसूत्रम्—
इष्टचतुर्थः प्रभवः प्रभवात्प्रचयो भवेद्द्विसंगुणितः ।
प्रचयश्चतुरभ्यस्तो गच्छस्तेषां युतिर्वृन्दम् ॥२७॥
अत्रोद्देशकः
द्विमुखैकचया अंशास्त्रिप्रभवैकोत्तरा हरा उभये ।
पञ्चपदा वद तेषां घनधनमुखचयपदानि सखे ॥२८॥

१ यह श्लोक M में अप्राप्य है ।

उदाहरणार्थ प्रश्न
दी हुई श्रेढि में पदों की चुनी हुई संख्या २/३ है; इस भिन्न के अंश और हर उत्तरोत्तर एक द्वारा
बढ़ाये जाते हैं जब तक कि १० विभिन्न भिन्नात्मक पद प्राप्त नहीं होते । इन भिन्नों को संवादी समान्तर
श्रेढियों के पदों की संख्या मानकर उनके सम्बन्ध में प्रथम पद, प्रचय और योग के वर्ग तथा घन
निकालो ॥२६॥
समान्तर श्रेढि के दिये हुए योग (जो कि किसी इष्ट राशि का घन हो) के सम्बन्ध में प्रथम
पद, प्रचय और पदों की संख्या निकालने का नियम—
इष्ट राशि का चतुर्थांश प्रथम पद है । इस प्रथम पद में दो का गुणन करने पर प्रचय उत्पन्न
होता है । प्रचय में चार का गुणा करने पर (एक) इष्ट श्रेढि के पदों की संख्या प्राप्त होती है । इनसे
सम्बन्धित योग इष्ट राशि का घन होता है ॥२७॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
अंश २ से आरम्भ होते हैं और उत्तरोत्तर १ द्वारा बढ़ते हैं; हर को १ द्वारा बढ़ाते हैं जो कि
आरम्भ में ३ है । ये दोनों प्रकार के पद (अंश और हर) में से प्रत्येक संख्या में पाँच है । इन चुनी
हुई भिन्नात्मक राशियों के सम्बन्ध में, हे मित्र, घनात्मक योग और संवादी प्रथमपद, प्रचय और पदों
की संख्या निकालो ॥२८॥

(२७) यह नियम केवल विशेष दशा में प्रयुक्त किया गया है । यह साधारण रूप से भी प्रयोग
में लाया जा सकता है । नियम इस तरह है :
क/४ + ३क/४ + ५क/४ + ······ २ क पदों तक = क/४ (२ क)² = क³
इस क्रिया की साधारण प्रयोज्यता, समीकरण क/प² × (प क)² = क³ से शीघ्र स्पष्ट हो सकती
है । इन सब दशाओं में श्रेढिके पदों की संख्या प्रथम पद को प³ से गुणित करने पर प्राप्त हो सकती है
क्योंकि प्रथम पद क/प² है । प्रत्येक दशा में प्रचय प्रथमपद से द्विगुणित लिया जाता है ।
ग० सा० सं०–६

४२ ] गणितसारसंग्रहः [ ३. २९-
दृष्टधनाद्युत्तरतो द्विगुणत्रिगुणद्विभागत्रिभागादीष्टधनाद्युत्तरानयनसूत्रम्—
दृष्टविभक्तेष्टधनं द्विष्ठं^२ तत्प्रचयताडितं प्रचयः ।
तत्प्रभवगुणं प्रभवो गुणभागस्येष्टवित्तस्य^३ ॥२९॥
अत्रोद्देशकः
प्रभवस्त्र्यर्धो रूपं प्रचयः पञ्चाष्टमः समानपदम् ।
इच्छाधनमपि तावत्कथय सखे कौ मुखप्रचयौ ॥३०॥
प्रचयादादिर्द्विगुणस्त्रयोदशाष्टादशं पदं स्वेष्टम् । वित्तं तु सप्तषष्टिः षड्घनभक्ता वदादिचयौ ॥३१॥
मुखमेकं द्वित्र्यंशः प्रचयो गच्छः समश्चतुर्नवमः ।
धनमिष्टं द्वाविंशतिरेकाशीत्या वदादिचयौ ॥३२॥
१ M गुणभागाद्युत्तरानयनसूत्रम् ।
२ M प्रचयेन ।
३ M गुणभागाद्युत्तरेच्छायाः ।
४ यह श्लोक M में ३१ वें श्लोक के स्थान में है तथा B में छूटा हुआ है ।
दी हुईं समान्तर श्रेढि के ज्ञात योग, प्रथम पद और प्रचय से किसी श्रेढि के प्रथमपद और
प्रचय निकालना जबकि इष्ट योग दी गई श्रेढि के ज्ञात योग से दुगुना, तिगुना, आधा, एक तिहाई,
अथवा उसका अपवर्त्य या अंश हो—
हल करने की सुविधा के लिए इष्ट योग को ज्ञात योग द्वारा विभाजित कर दो स्थानों में रखो ।
यह भजनफल, जब ज्ञात प्रचय द्वारा गुणित किया जाता है तब चाहा हुआ प्रचय प्राप्त होता है । और
वही भजनफल, जब ज्ञात प्रथमपद द्वारा गुणित होता है तब चाहे हुए प्रथम पद को उत्पन्न
करता है ॥२९॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
किसी श्रेढि का प्रथम पद ३/२ है, प्रचय १ है और पदों की संख्या ( जो दी हुईं तथा इष्ट, दोनों
श्रेढियों, के लिये उभयनिष्ठ है ) ५/८ है । इष्ट श्रेढि तथा दी गई श्रेढि का योग अलग-अलग ५/८ हैं । हे
मित्र ! इष्ट श्रेढि का प्रथमपद तथा प्रचय निकालो ॥३०॥ ( प्रचय १ है ) और प्रथमपद प्रचय का
दुगुना है; पदों की संख्या १३/१८ है; इष्ट श्रेढि का योग ६७/२१६ है । प्रथमपद और प्रचय निकालो ॥३१॥
प्रथम पद १ है, प्रचय २/३ और पदों की संख्या दोनों ( दी गई श्रेढि और इष्ट श्रेढि ) के लिये उभय-
साधारण ४/९ है । इष्ट श्रेढि का योग २२/८१ है । इष्ट श्रेढि के प्रथमपद और प्रचय निकालो ॥३२॥
(२९) ८४ वीं गाथा का नोट अध्याय २ में देखिये ।
√[ २ बय + ( ब/२ - अ )² ] + ब/२ - अ
*(३३) प्रतीक रूप से, न = ———————————————————————————
ब
अध्याय २ की गाथा ६९ वीं का नोट भी देखिये ।

— ३. ३६ ] कलासवर्णव्यवहारः [ ४३

गच्छानयनसूत्रम्—
द्विगुणचयगुणितवित्तादुत्तरदलमुखविशेषकृतिसहितात् ।
मूलं प्रचयार्धयुतं प्रभवोनं चयहृतं गच्छः ॥३३॥
प्रकारान्तरेण तदेवाह—
द्विगुणचयगुणितवित्तादुत्तरदलमुखविशेषकृतिसहितात् ।
मूलं क्षेपपदोनं प्रचयेन हृतं च गच्छः स्यात् ॥३४॥
अत्रोद्देशकः
द्विपञ्चांशो वक्त्रं त्रिगुणचरणःस्यादिह चयः
षडंशः सप्तघ्नाब्धिकृतिविहृतो वित्तमुदितम् ।
चयः पंचाष्टांशः पुनरपि मुखं त्र्यष्टममिति
त्रिचत्वारिंशाःस्वं प्रिय वद पदं शीघ्रमनयोः ॥३५॥
आद्युत्तरानयनसूत्रम्—
गच्छाप्तगणितमादिविर्गतैकपदार्धगुणितचयहीनम् ।
पदहृतधनमाद्यूनं निरेकपद्द्दलहृतं प्रचयः ॥३६॥
[L

५४ ] गणितसारसंग्रहः [ २. ३७-
अत्रोद्देशकः
त्रिचतुर्थचतुःपञ्चमचयगच्छे खेषुशशिहृतैकत्रिंशद्- ।
वित्ते द्व्यंशचतुःपञ्चममुखगच्छे च वद मुखं प्रचयंच ॥३७॥
इष्टगच्छयोर्व्यस्ताद्युत्तरसमधनद्विगुणत्रिगुणद्विभागत्रिभागधनानयनसूत्रम्—
व्येकात्महतो गच्छः स्वेष्टघ्नो द्विगुणितान्यपदहीनः ।
मुखमात्मोनान्यकृतिर्द्विकेष्टपदघातवर्जिता प्रचयः ॥३८॥
अत्रोद्देशकः
एकादिगुणविभागः स्वं व्यस्ताद्युत्तरे हि वद मित्र ।
द्वित्र्यंशौनैकादशपञ्चांशकमिश्रनवपदयोः ॥३९॥
गुणधनगुणसंकलितधनयोः सूत्रम्—
पदमितगुणहतिगुणितप्रभवः स्याद्गुणधनं तदाद्यूनम् ।
एकोनगुणविभक्तं गुणसंकलितं विजानीयात् ॥४०॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
दो श्रेणियों के प्रथम पद और प्रचय निकालो जब कि एक दशा में योग ३१/१५० है, ३/४ प्रचय
है और ४/५ पदों की संख्या है, तथा अन्य दशा में योग ३१/१५० है, २/३ प्रथम पद है और ४/५ पदों की
संख्या है ॥३७॥
जब पदों की संख्या कोई भी चुनी हुई राशि हो, तब दो श्रेणियों के सम्बन्ध में परस्पर बदले
हुए प्रथम पद, प्रचय. तथा उनके योग ( जिनमें एक-दूसरे के बराबर अथवा एक दूसरे से दुगुना,
तिगुना, आधा या तिहाई हो ) निकालने के लिये नियम—
एक श्रेढि के पदों की संख्या स्वतः के द्वारा गुणित कर एक द्वारा हासित करते हैं। इसे
दोनों श्रेणियों के योग की इष्ट निष्पत्ति द्वारा गुणित कर, और तब, दूसरी श्रेढि के पदों की संख्या की
दुगुनी राशि द्वारा हासित कर परस्पर बदलने योग्य प्रथम पद प्राप्त करते हैं ॥३८॥
दूसरी श्रेढि के पदों की संख्या का वर्ग, पदों की संख्या द्वारा ही हासित करते हैं। इसे इष्ट
निष्पत्ति और प्रथम श्रेढि के पदों की संख्या के गुणनफल की दुगुनी राशि द्वारा हासित करने पर, परस्पर
बदलने योग्य उस श्रेढि का प्रचय उत्पन्न होता है।
उदाहरणार्थ प्रश्न
दो श्रेणियों के सम्बन्ध में, जिनमें १० १/३ और ९ १/५ पदों की संख्या है, प्रथम पद और प्रचय
परस्पर बदलने योग्य हैं। एक श्रेढि का योग दूसरी श्रेढि के योग का अपवर्त्य अथवा अंश है जो एक
से आरम्भ होनेवाली प्राकृत संख्याओं द्वारा गुणन अथवा भाग द्वारा प्राप्त हुआ है। हे मित्र ! इन योगों
को, प्रथम पदों और प्रचयोँ को निकालो ॥३९॥
गुणोत्तर श्रेढि में गुणधन एवं श्रेढि का योग निकालने के लिये नियम—
गुणोत्तर श्रेढि में प्रथमपद को, जितनी पदों की संख्या होती है उतनी बार साधारण निष्पत्ति
द्वारा गुणित करने पर गुणधन प्राप्त होता है। यह गुणधन प्रथमपद द्वारा हासित होकर तथा एक कम
साधारण निष्पत्ति द्वारा भाजित होकर गुणोत्तर श्रेढि के योग के बराबर हो जाता है ॥४०॥
(३८) द्वितीय अध्याय की ८६ वीं गाथा का नोट देखिये ।
(४०) द्वितीय अध्याय की ९३ वीं गाथा का नोट देखिये ।

-२. ४३ ] कळासवर्णव्यवहारः [ ४५
गुणसंकलितान्त्यधनानयने तत्संकलितानयने च सूत्रम्—
गुणसंकलितान्त्यधनं विगतैकपदस्य गुणधनं भवति ।
तद्गुणगुणं सुखोनं व्येकोत्तरभाजितं सारम् ॥४१॥
अत्रोद्देशकः
प्रभवोऽष्टमश्चतुर्थः प्रचयः पञ्च पदमत्र गुणगुणितम् ।
गुणसंकलितं तस्यान्त्यधनं चाचक्ष्व मे शीघ्रम् ॥४२॥
गुणधनसंकलितधनयोराद्युत्तरपदान्यपि पूर्वोक्तसूत्रैरानयेत् ।
समानेष्टोत्तरगच्छसंकलितगुणसंकलितसमधनस्याद्यानयनसूत्रम्—
मुखमेकं चयगच्छाविष्ठौ मुखवित्तसहितगुणचित्या ।
हृतचयधनमादिगुणं भवेद्द्विचितिधनसाम्ये ॥४३॥
१ केवळ B में प्राप्य ।
गुणोत्तर श्रेढि का अन्तिमपद तथा योग निकालने के लिये नियम—
गुणोत्तर श्रेढि का अंत्यधन अथवा अंतिम पद, दूसरी ऐसी ही श्रेढि का गुणधन होता है जिसमें
पदों की संख्या एक न्यून होती है । यह अंत्यधन साधारण निष्पत्ति द्वारा गुणित होकर और प्रथम पद द्वारा
ह्रासित होकर तथा एक कम साधारण निष्पत्ति द्वारा भाजित होकर श्रेढि के योग को उत्पन्न करता है ॥४१॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
गुणोत्तर श्रेढि के सम्बन्ध में प्रथमपद ३/८ है, साधारण निष्पत्ति ५ है और पदों की संख्या ५
है । मुझे शीघ्र बतलाओ कि श्रेढि का योग तथा अंतिम पद क्या क्या हैं ? ॥४२॥
समान योग वाली दो समान्तर एवं गुणोत्तर श्रेढि के उभय साधारण प्रथम पद को निकालने के
लिये नियम, जब कि उनकी चुनी हुई पदों की संख्या बराबर हो और इसी तरह से वरण किये गये
प्रचय और साधारण निष्पत्ति बराबर हों—
प्रथम पद को एक लेते हैं, पदों की संख्या और साधारण निष्पत्ति तथा प्रचय मन से कुछ भी
चुन लिये जाते हैं । यहां उत्तर धन को गुणोत्तर श्रेढि के योग में से आदि धन को घटाने से प्राप्त हुई
राशि द्वारा भाजित करते हैं । इसे चुने हुए प्रथम पद से गुणित करने पर, इन दोनों श्रेढियों के सम्बन्ध
में चाहा हुआ उभयसाधारण प्रथमपद उत्पन्न होता है ॥४३॥
(४१) द्वितीय अध्याय की ९५ वीं गाथा का नोट देखिये ।
[ पिछले अध्याय में कथित नियमों द्वारा गुणधन और श्रेढि के योग के सम्बन्ध में गुणोत्तर श्रेढि
के प्रथमपद, साधारण निष्पत्ति और पदों की संख्या निकाली जा सकती है । इन नियमों के लिये
अध्याय २ की ८७, ९७, १०१ और १०३ वीं गाथायें देखिये । ]
(४३) आदि धन और उत्तरधन के लिये ६३ और ६४ वीं गाथायें (अध्याय २) देखिये । यह
नियम प्रतीक रूप से इस तरह साबित होता है—अ. = { [न(न - १) / २] × ब } / { [ (र^न - १)१ / (र - १) ] - न × १ }
जहाँ ब = र है । सरल साधन के हेतु प्रथमपद को १ चुन लिया जाता है, परंतु स्पष्ट है कि कोई राशि
पहिले इस तरह मानी जा सकती है । आदि धन और उत्तरधन के द्वारा नियम के कथन को सरल बनाने
के लिये यहाँ प्रथमपद को मान लिया गया है । यहां प्राप्त सूत्र गुणोत्तर श्रेढि के योगसूत्र और समान्तर
श्रेढि के सूत्र को समीकार रूप में लिखने से मिला है । यहां ध्यान देने योग्य शब्द चय है जिसका उपयोग
गुणोत्तर और समान्तर श्रेढि, दोनों के क्रमशः साधारण निष्पत्ति और प्रचय के लिये किया गया है ।

५६ ] गणितसारसंग्रहः [ ३. ४४-
अत्रोद्देशकः
भाववार्धिभुवनानि पदान्यम्भोधिपञ्चमुनयस्त्रिहतास्ते ।
उत्तराणि वदनानि कति स्युर्युग्मसंकलितवित्तसमेषु ॥४४॥
इति भिन्नसंकलितं समाप्तम् ।
भिन्नव्युत्कलितम्
भिन्नव्युत्कलिते करणसूत्रं यथा—
गच्छाधिकेष्टमिष्टं चयहतमूनोत्तरं द्विहादियुतम् । शेषेष्टपदार्धगुणं व्युत्कलितं स्वेष्टवित्तं च ॥४५॥
शेषगच्छस्याद्यानयनसूत्रम्—
प्र^चयार्धोनः प्रभवो युतश्चयघ्नेष्टपदचयार्धाभ्याम् । शेषस्य पदस्यादिश्चयस्तु पूर्वोक्त एव भवेत् ॥४६॥
गुणगुणितेऽपि चयादौ तथैव भेदोऽयमत्र शेषपदे ।
इष्टपदमितगुणाहतिगुणितप्रभवो भवेद्वक्त्रम् ॥४७॥
१ M प्रचयगुणितेष्टगच्छस्सादिः प्रभवः पदस्य शेषस्य । पूर्वोक्तः प्रचयस्यादिष्टस्य प्राक्तनादेव ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
पदों की संख्या क्रमशः ५, ४ और ३ है । साधारण निष्पत्ति तथा बराबर प्रचय क्रमशः ४/३, ५/३
और ७/३ हैं । इन समान योग वाली गुणोत्तर तथा समान्तर श्रेढियों के संवादी प्रथम पदों की अर्हाओं
( values ) को निकालो ॥४४॥
इस प्रकार, कलासवर्ण व्यवहार में, संकलित नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।
भिन्न व्युत्कलित [ श्रेढिरूप भिन्नों का व्युत्कलन ]
भिन्न व्युत्कलित क्रिया को करने का नियम निम्नलिखित है —
श्रेढि में कुल पदों की संख्या को चुने हुए पदों की संख्या में सम्मिलित करो और स्वयं चुनी
हुई पदों की संख्या को अलग से लो । इन राशियों में से प्रत्येक को प्रचय द्वारा गुणित करो और
गुणनफलों को प्रचय द्वारा हासित करो तथा दो द्वारा गुणित करो । इन परिणामी राशियों को जब क्रमशः
शेषपदों की संख्या की आधी राशि और पदों की चुनी हुई संख्या की आधी राशि द्वारा गुणित करते हैं
तब क्रम से शेष श्रेढि का योग तथा श्रेढि के चुने हुए भाग का योग प्राप्त होता है ॥४५॥
शेष गच्छ सम्बन्धी प्रथम पद को निकालने के लिये नियम—
श्रेढि का प्रथमपद, प्रचय की आधी राशि द्वारा ह्रासित होकर और प्रचय द्वारा गुणित चुनी हुई
पदों की संख्या द्वारा मिलाया जाकर तथा प्रचय की आधी राशि द्वारा भी मिलाया जाकर शेष श्रेढि के
शेष पदों की संख्या के प्रथम पद को उत्पन्न करता है । जैसा प्रचय दी हुई श्रेढि में होता है वैसा ही
प्रचय शेष श्रेढि का होता है ॥४६॥ गुणोत्तर श्रेढि के विषय में भी, साधारण निष्पत्ति और प्रथमपद
ठीक वैसे ही होते हैं जैसे कि दी हुई श्रेढि और उसके चुने हुए भाग में होते हैं । दी हुई श्रेढि के प्रथम
पद में साधारण निष्पत्ति को उतने बार गुणित करते हैं जितनी कि चुनी हुई पदों की संख्या होती
है । प्राप्त गुणनफल शेष श्रेढि का प्रथमपद होता है । शेष श्रेढि के प्रथमपद और दी हुई श्रेढि के
प्रथमपद में यही अंतर होता है ॥४७॥
॰ (४५) द्वितीय अध्याय की १०६ वीं गाथा का नोट देखिये ।
(४६) द्वितीय अध्याय को १०९ वीं गाथा का नोट देखिये ।
(४७) द्वितीय अध्याय की ११० वीं गाथा का नोट देखिये ।

-३. ५३ ] कलासवर्णव्यवहारः [ ४७
अत्रोद्देशकः
पादोत्तरं दलास्यं पदं त्रिपादांशकःसमुद्दिष्टः । स्वेष्टं चतुर्थभागः किं व्युत्कलितं समांकलय ॥४८॥
प्रभवोऽर्धं पञ्चांशः प्रचयो द्वित्र्यंशको भवेदृच्छः । पञ्चाष्टांशःस्वेष्टं पदमृणमाचक्ष्व गणितज्ञ ॥४९॥
आदिश्चतुर्थभागः प्रचयः पञ्चांशकस्त्रिपञ्चांशः ।
गच्छो वाञ्छागच्छो दशमो व्यवकलितमानं किम् ॥५०॥
त्रिभागौ द्वौ वक्त्रं पञ्चमांशश्चयःस्यात् पदं त्रिघ्नः पादः पञ्चमःस्वेष्टगच्छः ।
षडंशःसप्तांशो वा व्ययः को वद त्वं कलावास प्रज्ञाचन्द्रिकाभास्वदिन्दो ॥५१॥
द्वादशपदं चतुर्थणोत्तरमर्धोनपञ्चकं वदनम् । त्रिचतुःपञ्चाष्टेष्टपदानि व्युत्कलितमाकलय ॥५२॥
गुणसंकलितव्युत्कलितोदाहरणम् ।
द्वित्रिभागरहिताष्टमुखं द्वित्र्यंशको गुणचयोऽष्ट पदं भोः ।
मित्र रत्नगतिपञ्चपदानीष्टानि शेषमुखवित्तपदं किम् ॥५३॥
इति भिन्नव्युत्कलितं समाप्तम्³ ।
१ M च चतुर्थागः ।
२ M किं व्युत्कलितं समाकलय ।
३ K और M में इसके पश्चात् "इति सारसङ्ग्रहे महावीराचार्यस्य कृतौ द्वितीयव्यवहारस्समाप्तः"
जोड़ा गया है । यह वास्तव में भूल प्रतीत होती है ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
दी हुई श्रेढि में प्रचय ¼ है, प्रथमपद ½ है, पदों की संख्या ¾ है और चुनी हुई पदों की
(हटाई जाने वाली) संख्या ¼ है । ऐसी श्रेढि की शेष श्रेढि का योग निकालो ॥४८॥ समान्तर
श्रेढि के सम्बन्ध में प्रथमपद ½ है, प्रचय ⅕ है और पदों की संख्या ⅔ है । यदि हटाये जाने वाले
पदों की संख्या ⅝ है तो हे गणितज्ञ, शेष श्रेढि का योगफल बताओ ॥४९॥ दी हुई श्रेढि में प्रथमपद
¼ है, प्रचय ⅕ है और पदों की संख्या ⅗ है । यदि चुनी हुई पदों की संख्या १/१० हो तो शेष श्रेढि का
योगफल बतलाओ ॥५०॥ प्रथमपद ⅔ है, प्रचय ⅕ है, पदों की संख्या ¾ है और चुनी गई पदों
की संख्या ⅕, ⅙ अथवा ⅐ है । हे चंद्रमा के प्रकाश रूपी बुद्धि से चमकते हुए चंद्रमा कि भांति कला
के वास ! मुझे बतलाओ कि शेष पदों की संख्या का योग क्या होगा ? ॥५१॥ दी हुई श्रेढि के पदों
की संख्या १२ है, प्रचय - ¼ (ऋण ¼) है और प्रथमपद ४½ है तथा चुनी गई पदों की संख्याएं
क्रमशः ३, ४, ५ अथवा ८ हैं । शेष पदों की संख्या का योगफल अलग-अलग निकालो ॥५२॥
गुणोत्तर श्रेढि में व्युत्कलित् का उदाहरणार्थ प्रश्न
प्रथमपद ७⅓ है, साधारण निष्पत्ति ⅔ है और पदों की संख्या ८ है । चुनी हुई पदों की
संख्याएं क्रमशः ३, ४, ५ हैं । बतलाओ कि शेष श्रेढियों के सम्बन्ध में प्रथमपद, योग और पदों की
संख्या क्या-क्या हैं ? ॥५३॥
इस प्रकार, कलासवर्ण व्यवहार में, भिन्न व्युत्कलित् नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।
(५१) कला के यहाँ दो अर्थ हैं—प्रथम तो ज्ञान और अन्य "चंद्रमा के अंक" ।

४८ ] गणितसारसंग्रहः [ ३: ५४-
कलासवर्णषड्जातिः
इतः परं कलासवर्णे षड्जातिमुदाहरिष्यामः—
भागप्रभागावथ भागभागो भागानुबन्धः परिकीर्तितोऽतः ।
भागापवाहः सह भागमात्रा षड्जातयो ऽमुत्र फलासवर्णे ॥५४॥
भागजातिः
तत्र भागजातौ करणसूत्रं यथा—
सदृशहृतच्छेदहतौ मिथोऽशहारौ समच्छिदावंशौ ।
लुप्तैकहरौ योज्यौ त्याज्यौ वा भागजातिविधौ ॥५५॥
कलासवर्ण षड्जाति ( छः प्रकार के भिन्न )
अब हम छः प्रकार के भिन्नों का प्रतिपादन करेंगे—
भाग ( साधारण भिन्न ), प्रभाग ( भिन्नों के भिन्न ), भागभाग ( जटिल या संकर भिन्न
complex fractions ), भागानुबंध ( संयव भिन्न fractions in association ), भागा-
पवाह ( वियवन भिन्न fractions in dissociation ) और भाग मात्र ( भिन्न जिनमें ऊपर
कथित भिन्नों में से दो या अधिक भिन्न सम्मिलित हों ); ये भिन्नों के छः भेद कहलाते हैं ॥५४॥
भागजाति [ साधारण भिन्नों का जोड़ और घटाना ]
साधारण भिन्नों का क्रिया ( करण ) सम्बन्धी नियम—
दिये गये दो साधारण भिन्नों सम्बन्धी क्रियाओं में प्रत्येक के अंश और हर को, उभय साधारण
गुणनखंड द्वारा हरों को विभाजित करने से प्राप्त भजनफलों द्वारा एकान्तर से गुणित करते हैं । वे भिन्न
इस तरह प्रह्रासित होकर समान हर वाले हो जाते हैं । तब इनमें से कोई एक हर अलग कर, अंशों को
जोड़ते अथवा घटाते हैं [ ताकि दूसरे समान हर के सम्बन्ध में परिणामी राशि अंश हो ] ॥५५॥
(५५) भिन्नों को साधारण हरों में प्रह्रासित करने का नियम केवल भिन्न युग्म के लिये प्रयोज्य है ।
निम्नलिखित उदाहरण से यह नियम स्पष्ट हो जावेगा—
अ ब
• —— + —— को हल करने के लिये यहाँ, “अ” और “कख” को “ग” से गुणित करते हैं जोकि
कख ख ग
दूसरे भिन्न के हर “खग” को हरों के साधारण गुणनखण्ड ख द्वारा विभाजित करने पर भजनफल “ग”
के रूप में प्राप्त होता है । इसी प्रकार दूसरें भिन्न में “ब” और “खग” को “क” से गुणित करते हैं जो
प्रथम भिन्न के हर “कख” को हरों के साधारण गुणनखण्ड “ख” द्वारा विभाजित करने पर “क”
के रूप में प्राप्त होता है । इस तरह हमें क्रमशः अग और बक प्राप्त होते हैं । इस तरह
—— ——
कखग कखग
अग बक अग + बक
—— + —— = ———— -
कखग कखग कखग

-३. ६० ] कलासवर्णव्यवहारः [ ४९
प्रकारान्तरेण समानच्छेदमुद्भावयितुमुत्तरसूत्रम्—
छेदापवर्तकानां लब्धानां चाहतौ निरुद्धः स्यात् । हरहृतनिरुद्धगुणिते हारांशगुणे समो हारः ॥५६॥
अत्रोद्देशकः
जम्बूजम्बीरनारङ्गचोचमोचाम्रदाडिमम् । अक्रीषीद्दल्पषड्भागद्वादशांशकविंशकैः ॥५७॥
हेम्नस्त्रिंशच्चतुर्विंशेनाष्टमेन यथा क्रमम् । श्रावको जिनपूजायै तयोगे किं फलं वद ॥५८॥
अष्टपञ्चदशं विंशं सप्तषट्त्रिंशदंशकम् । एकादशत्रिषष्ट्यंशमेकविंशं च सङ्क्षिप ॥५९॥
ऐकद्विकत्रिकायैकोत्तरनवदशकषोडशान्त्यहराः ।
निजनिजमुखप्रमांशाः स्वपरायभ्यस्ताश्च किं फलं तेषाम् ॥६०॥
१ यह और अनुगामी श्लोक M में अप्राप्य हैं ।
२ P में ५७ और ५८ श्लोक छूट गये हैं ।
३ यह श्लोक केवल K और B में प्राप्य है ।
साधारण ( common ) हर को दूसरी विधि द्वारा निकालने का नियम—
हरों के सभी संभव गुणनखंडों और उनके सभी अन्तिम ( ultimate ) भजन फलों के
सन्तत गुणन से निरुद्ध ( लघुत्तम समापवर्त्य ) प्राप्त होता है । निरुद्ध को हरों द्वारा भाजित करने से
प्राप्त भजन फलों में हरों और अंशों का गुणन करते हैं । इस प्रकार से प्राप्त हरों और अंशों सम्बन्धी
अपवर्त्यो के हर समान होते हैं ॥५६॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
एक श्रावक ने जिन पूजा के लिए जम्बूफल, नीबू, नारंगी, नारियल, केले, आम और अनार
क्रमशः १/२, १/६, १/१२, १/२०, १/३०, १/२४ और १/८ स्वर्ण मुद्राओं के खरीदे; मुझे बतलाओ कि जब इन भिन्नों
का योग किया जाय तो क्या परिणाम होगा ? ॥५७-५८॥ ८/१५, १/२०, ७/३६, ११/६३ और १/२१ को जोड़ो ॥५९॥
भिन्नों के ३ समूह हैं, जहाँ हर १, २, और ३ से क्रमशः आरम्भ होते हैं और उत्तरोत्तर एक द्वारा बढ़ते
चले जाते हैं जब तक कि ऐसे हरों में अंतिम ९, १० और १६ ( क्रमशः विभिन्न समूह में ) नहीं हो
जाते । इन भिन्नों के समूह में अंश, हरों के समूह की प्रथम संख्या के तुल्य हैं, और इन ऊपर कथित
प्रत्येक समूह वालों का प्रत्येक हर उत्तरवर्ती द्वारा गुणित किया जाता है । अंतिम हर, प्रत्येक दशा में
अपरिवर्तित रहता है क्योंकि उसके उत्तरवर्ती हर का अभाव रहता है )। बतलाओ कि अंतमें इन
परिणामी भिन्नों के प्रत्येक समूह का योग क्या होगा ? ॥६०॥ भिन्नों के चार कुलक ( sets ) हैं । हर
१, २, ३ और ४ से क्रमशः आरम्भ होते हैं और उत्तरोत्तर एक द्वारा बढ़ते चले जाते हैं जब तक कि
अंतिम हर भिन्न २ कुलकों में क्रमवार २०, ४२, २५ और ३६ नहीं हो जाते । इन भिन्नों के कुलकों के
अंश इन हरों के कुलकों की प्रथम संख्या के बराबर हैं । हरों के कुलक का प्रत्येक भिन्न उत्तरवर्ती द्वारा
गुणित किया जाता है ( अंतिम हर प्रत्येक दशा में अपरिवर्तित रहता है ।) अंत में, परिणामी भिन्नों में
( ६० ) परिणामी प्रश्न ये हैं:—मान बतलाओ—
१ १ १ १ १
(i) ───── + ───── + ───── + ・・・・・・ + ───── + ─ ,
१ × २ २ × ३ ३ × ४ ८ × ९ ९
ग० सा० सं०-७

५० ] गणितसारसंग्रहः [ ३. ६१-
एकद्विकत्रिकाद्याश्चतुराद्याश्चैकवृद्धिका हाराः ।
निजनिजमुखप्रमांशाः स्वासन्नपराहताः क्रमशः ॥६१॥
विंशत्यन्ताः षड्गुणसप्तान्ताः पञ्चवर्गपश्चिमकाः । षट्त्रिंशत्पाञ्चात्याः सङ्क्षेपे किं फलं तेषां ॥६२॥
चन्दनघनसारानगरुकुङ्कुममक्रैष्ट जिनमहाय नरः ।
चरणदलविंशपञ्चमभागैः कनकस्य किं शेषम् ॥६३॥
पादं पञ्चांशमर्धं त्रिगुणितदशमं सप्तविंशांशकं च
स्वर्णद्वन्द्वं प्रदाय स्मितसितकमलं स्त्यानदध्याज्यदुग्धम् ।
श्रीखण्डं त्वं गृहीत्वानय जिनसदनप्रार्चनायान्नवीन्मा-
मित्यञ्च श्रावकार्यो भण गणक कियच्छेषमंशान्विशोध्य ॥६४॥
अष्टपञ्चमुखौ हारावुभयेऽप्येकवृद्धिकाः । त्रिंशदन्ताः पराभ्यस्ताश्चतुर्गुणितपश्चिमाः ॥६५॥
स्वस्ववक्त्रप्रमाणांशा रूपात्संशोध्य तद्द्वयम् । शेषं सखे समाचक्ष्व प्रोत्तीर्णगणितार्णव ॥६६॥
एकोनविंशतिरंथ क्रमात् त्रयोविंशतिर्द्विषष्टिश्च । रूपविहीना त्रिंशत्तत्त्रयोविंशतिशतं स्यात् ॥६७॥
पञ्चत्रिंशत्तस्मादष्टाशीतिकशतं विनिर्दिष्टम् । सप्तत्रिंशदमुष्मादष्टानवतिस्त्रिकोनपञ्चाशत् ॥६८॥
चत्वारिंशच्छतिका सैका च पुनः शतं सषोडशकम् । एकत्रिशदतः स्याद्द्वानवतिः सप्तपञ्चाशत् ॥६९
——————————————————————————————————————————
१ ६३ और ६४ श्लोक K और B में प्राप्य हैं ।
२ M मुहु
३ यह श्लोक M में छूट गया है । ४ B विंशत्य ।
५ यह श्लोक M में अप्राप्य है । ६ K और B भागजात्यन्धिपारग ।
——————————————————————————————————————————
कुलकों को जोड़ने पर क्या योग प्राप्त होगा ? ॥६१-६२॥ एक मनुष्य ने जिन उत्सव पर संदल (चंदन)
लकड़ी, कपूर, अगर और सौंफ (कुंकुममक्रेष्ट) क्रमशः १/४, १/२, १/२० और १/५ स्वर्ण मुद्रा के, १
स्वर्ण मुद्रा में से, खरीदे । बतलाओ क्या शेष है ? ॥६३॥ एक योग्य श्रावक ने मुझे दो स्वर्ण मुद्राएं
देते हुए कहा कि जिन मंदिर में पूजा के लिये १/४, १/५, १/२, ३/१० और १/२७ स्वर्ण मुद्रा के क्रमशः विकसित
श्वेत कमल, गाढ़ा दही, घृत, दुग्ध और चंदन लकड़ी लाओ । हे मित्र ! मुझे बतलाओ कि इतने खर्च
के पश्चात् मेरे पास स्वर्ण मुद्रा का कितना भाग बचा ? ॥६४॥ भिन्नों के दो कुलक हैं । हर क्रमशः ८
और ५ से आरम्भ होते हैं और दोनों दशाओं में उत्तरोत्तर एक द्वारा बढ़ते जाते हैं जब तक कि दोनों
दशाओं में अंतिम हर ३० नहीं हो जाता । इन कुलकों के अंश दोनों कुलकों के हर के प्रथम पद के तुल्य
हैं । प्रत्येक कुलक के हरों में से प्रत्येक अपने उत्तरवर्ती द्वारा गुणित होता है । अंतिम हर दोनों दशाओं
में ४ द्वारा गुणित किया जाता है । भिन्नों के दोनों परिणामी कुलकों को जोड़ने से प्राप्त दोनों योगों में
प्रत्येक में से एक घटाने के पश्चात्, हे साधारण भिन्न महासागर के पार उतरने वाले मित्र, मुझे बतलाओ
कि क्या शेष रहेगा ? ॥६५-६६॥ कुछ दिये हुए भिन्नों के हर क्रमशः १९, २३, ६२, २९, १२३, ३५,
१८८, ३७, ९८, ४७, १४०, ४१, ११६, ३१, ९२, ५७, ७३, ५५, ११०, ४९, ७४, २१९ हैं; और,
——————————————————————————————————————————
(ii) २/(२ × ३) + २/(३ × ४) + २/(४ × ५) + ⋯⋯ + २/(९ × १०) + २/१० ,
(iii) ३/(३ × ४) + ३/(४ × ५) + ३/(५ × ६) + ⋯⋯ + ३/(१५ × १६) + ३/१६ ,

-३. ७३ ] कलासवर्णव्यवहारः [ ५१
त्र्यधिका सप्ततिरस्मात्सपञ्चपञ्चाशदपि च सा द्विगुणा ।
सप्तकृतिः सचतुष्का सप्ततिरेकोनविंशतिद्विशतम् ॥७०॥
हारा निरूपिता अंशा एकाद्येकोत्तरा अमून् । प्रक्षिप्य फलमाचक्ष्व भोगजात्यब्धिपारग ॥७१॥
अत्रांशोत्पत्तौ सूत्रम्—
एकं परिकल्प्यांशं तैरिष्टैः समहरांशकान् हन्यात् ।
यद्गुणितांशसमासः फलसदृशोंऽशास्त एवेष्टा ॥७२॥
ऐकांशवृद्धोनां राशीनां युतावंशाद्धारस्याधिक्ये सत्यंशोत्पादक सूत्रम्—
समहारैकांशकयुतिहृतयुत्यंशोऽश एकवृद्धीनाम् ।
शेषमितरांशयुतिहृतमन्यांशोऽस्त्येवमा चरमात् ॥७३॥
१ B प्रोत्तीर्णगणिताणर्व ।
२ B सदृशवृद्ध्यंशराशीनां अंशोत्पादक सूत्रम् ।
अंश १ से आरम्भ होकर उत्तरोत्तर क्रमवार १ द्वारा बढ़ते चले जाते हैं । इस सब भिन्नों को जोड़कर,
हे भिन्न रूपी महासागर के उसपार पहुँचनेवाले, योगफल को बतलाओ ॥६७-७१॥
जब भिन्नों के हर तथा योग दिये गये हों तो अंश निकालने के लिये नियम—
सब दिये गये हरों के सम्बन्ध में अंश को 'एक' बनाओ; तब किसी भी तरह चुनी हुई संख्याओं
द्वारा साधारण हरों में लाये गये अंशों को गुणित करो । यहां वे संख्यायें चाहे हुए अंशों में बदल जाती
हैं, जिनका योग संबंधित भिन्नों के योग के बराबर होता है ॥७२॥
जब भिन्नों के योग का हर अंश से बड़ा हो और अंश उत्तरोत्तर एक द्वारा बढ़ते चले जाते
हों, तो ऐसे भिन्नों के सम्बन्ध में अंशों के निकालने के लिये नियम—
सम्बन्धित भिन्नों के दिये गये योग को तथा जिनके अंश 'एक' होते हैं ऐसे भिन्नों को साधारण
हरों में प्रहासित कर लिया जाता है । भिन्नों के दिये गये योग को ऐसे भिन्नों के योग द्वारा भाजित
करने से प्राप्त भजनफल उन अंशों में से प्रथम चाहा हुआ अंश बन जाता है । इसके पश्चात् के इष्ट
अंश उत्तरोत्तर एक द्वारा बढ़ते चले जाते हैं और जिन्हें निकाला जा सकता है । इस भाग में प्राप्त
शेषफल को समान हर वाले अन्य अंशों द्वारा विभाजित करने पर, परिणामी भजनफल दूसरा चाहा
हुआ अंश बन जाता है जब कि वह प्रथम में जो कि पहिले ही प्राप्त हो चुका है, जोड़ दिया जाय ।
इस तरह अंत तक प्रश्न का साधन करना पड़ता है ॥७३॥
(७२) सूत्र ७४ के प्रश्न को हल करने से यह नियम स्पष्ट हो जावेगा । यहाँ प्रत्येक दिये गये हर
के सम्बन्ध मेंअंश एक मान लिया जाता है; इस तरह हमें १/९, १/१०, १/१४ प्राप्त होते हैं जो एक से हरों में
प्रहासित किये जाने पर ७०/६३०, ६३/६३०, ४५/६३० हो जाते हैं । जब अंशों को क्रमवार २, ३ और ४ से गुणित
करते हैं तो इस तरह प्राप्त गुणनफलों का योग दिये गये योग का अंश ( ५०९ ) हो जाता है ।
इसलिये, २, ३, और ४ चाहे हुए अंश हैं । आलोचनीय है, कि इस दिये गये योग का हर उतना है
जितना कि भिन्नों का साधारण हर है ।
( ७३ ) इस नियम के अनुसार ७४ वीं गाथा का प्रश्न इस प्रकार साधित होता है—

५२ ] गणितसारसंग्रहः [ ३. ७४-
अत्रोद्देशकः
नवकदशैकादशहृतराशीनां नवतिनवशतीभक्ता । त्र्यूनाशीत्यष्टशती संयोगः केंऽशकाः कथय ॥७४॥
छेदोत्पत्तौ सूत्रम्—
रूपांशकराशीनां रूपाद्यास्त्रिगुणिता हराः क्रमशः ।
द्वित्र्यंशाभ्यस्तावादिमचरमौ फले रूपे ॥७५॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
९, १० और ११ द्वारा क्रमशः विभाजित की गई कुछ संख्याओं का योग ८७७ भाजित ९९०
है । बतलाओ कि भिन्नों को जोड़ने की इस क्रिया में अंश क्या क्या हैं ? ॥७४॥
चाहे हुए हरों को निकालने के लिये नियम—
‘एक’ अंश वाली विभिन्न भिन्नीय राशियों का योग जब ‘एक’ हो, तब चाहे हुए हर एक से
आरम्भ होकर क्रमवार, उत्तरोत्तर ३ से गुणित किये जाते हैं, इस तरह प्राप्त प्रथम और अंतिम हर फिर
से क्रमशः २ और २/३ द्वारा गुणित किये जाते हैं ॥७५॥
प्रत्येक दिये गये हरों के सम्बन्ध में अंश को एक मानकर तथा भिन्नों को

-३. ७७ ] कलासवर्णव्यवहारः [ ५३
अत्रोद्देशकः
पञ्चानां राशीनां रूपांशानां युतिर्भवेद्रूपम् ।
षण्णां सप्तानां वा के हाराः कथय गणितज्ञ ॥७६॥
विषमस्थानां छेदोत्पत्तौ सूत्रम्—
एकांशकराशीनां द्व्याद्या रूपोत्तरा भवन्ति हराः । स्वासन्नपराभ्यस्ताः सर्वे दलिताः फले रूपे ॥७७॥
एकांशानामनेकांशानां चैकांशे फले छेदोत्पत्तौ सूत्रम्—
उदाहरणार्थ प्रश्न
जिनमें प्रत्येक का अंश एक है ऐसी पांच या छः अथवा सात विभिन्न भिन्नीय राशियों का योग
प्रत्येक दशा में १ है । हे गणितज्ञ ! चाहे हुए हरों को निकालो ॥७६॥
भिन्नों की अयुग्म संख्या लेने पर हरों को निकालने के लिये नियम—
जिनके प्रत्येक अंश १ हों ऐसी विभिन्न भिन्नीय राशियों का योग १ हो, तो चाहे हुए हर २ से
आरम्भ होकर, उत्तरोत्तर मान में १ द्वारा बढ़ते चले जाते हैं । प्रत्येक ऐसा हर उस संख्या से गुणित
किया जाता है जो मान में तत्काल उत्तरवर्ती के बराबर होता है और तब उसे आधा किया
जाता है ॥७७॥
कुछ इष्ट भिन्नों के विषय में चाहे हुए हरों को निकालने के लिए नियम जबकि उनके अंशों में
प्रत्येक १ अथवा १ से अन्य हो और जब उनके भिन्नीय योग का अंश भी १ हो—
गुणोत्तर श्रेढि में जिसका प्रथम पद १/अ है और साधारण निष्पत्ति १/अ है अ की सभी पूर्णांक धनात्मक
अर्हाओं (मानों) के लिये योग १/(अ - १) से { १/((अ - १)/अ) × श्रेढि का (न + १) वां पद } न्यून होता
है । इसलिये, यदि हम गुणोत्तर श्रेढि के योग में इस गाथा के नियम के अनुसार अन्तिम भिन्न
{ १/((अ - १)/अ) × (न - १) वां पद } जोड़ते हैं तो हमें १/(अ - १) प्राप्त होगा । इस १/(अ - १) से योग १ प्राप्त करने
के लिये उसमें (अ - २)/(अ - १) जोड़ना पड़ता है । इस (अ - २)/(अ - १) को नियम में प्रथम भिन्न कहा गया है और
इसका मान ३ चुना गया है क्योंकि सभी भिन्नों का अंश १ होना चाहिए ।
(७७) यहाँ १/(२ × ३ × १/२) + १/(३ × ४ × १/२) + १/(४ × ५ × १/२) + ...... + १/((न - १) न × १/२)

  • १/(न × १/२)
    = २ [ १/(२ × ३) + १/(३ × ४) + १/(४ × ५) + ...... + १/((न - १) न) + १/न ]
    = २ [ (१/२ - १/३) + (१/३ - १/४) + ...... + (१/(न - १) - १/न) + १/न ]
    = २ × १/२ = १

५४ ] गणितसारसंग्रहः [ ३. ७८-
लब्धहरः प्रथमस्यच्छेदः सस्वांशकोऽयमपरस्य । प्राक् स्वपरेण हतोऽन्त्यः स्वांशेनैकांशके योगे ॥७८॥
अत्रोद्देशकः
सप्तकनवकत्रितयत्रयोदशांशप्रयुक्तराशीनाम् । रूपं पादः षष्ठः संयोगाः के हराः कथय ॥७९॥
एकांशकानामेकांशेऽनेकांशे च फले छेदोत्पत्तौ सूत्रम्—
सेष्टो हारो भक्तः स्वांशेन निरग्रमादिमांशहरः । तद्युतिहाराप्तष्टः शेषोऽस्मादित्थमितरेषाम् ॥८०॥
जब कुछ इष्ट भिन्नों के योग का अंश १ हो, तब उनके चाहे हुए हरों को निकालने के लिये
योग के हर को प्रथम राशि का हर मान लो और इस हर को अपने अंश से संयुक्त कर उसे उत्तरवर्ती
राशि का हर मान लो, और ऐसे प्रत्येक हर को क्रमवार तत्काल उत्तरवर्ती के द्वारा गुणित करते चले
जाओ । अन्तिम हर को उसी के अंश द्वारा गुणित करो ॥७८॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
जिनके अंश क्रमशः ७, ९, ३ और १३ हैं ऐसे भिन्नों के योग १, १/४, १/६ हैं । बतलाओ कि
उन भिन्नीय राशियों के हर क्या हैं ॥७९॥
जिनका अंश १ है ऐसे कुछ इच्छित भिन्नों के हर निकालने के लिये नियम जब कि उन भिन्नों
के योग का अंश १ अथवा और कोई दूसरी राशि हो –
दिये गये योग के हर को जब कोई चुनी हुई राशि में मिलाते हैं और ताकि कुछ भी शेष न
बचे इस तरह उसे उस योग के अंश द्वारा विभाजित करते हैं तो वह भिन्नों की चाही हुई श्रेढि के
प्रथम अंश के सम्बन्ध में हर बन जाता है । ऊपर चुनी हुई राशि जब प्रथम भिन्न के हर द्वारा विभा-
जित की जाती है और दिये गये योग के हर द्वारा भी विभाजित की जाती है तब वह इष्ट श्रेढि के शेष
भिन्नों के योग को उत्पन्न करती है । इष्ट श्रेढि के शेष भिन्नों के इस ज्ञात योग से इसी तरह अन्य
हरों को निकालते हैं ॥८०॥
( ७८ ) बीजीय रूप से यदि योग १/न हो, और अ, ब, स तथा द दिये गये अंश हों तो भिन्नों
को निम्न रीति से जोड़ते हैं—
योग = अ / [न (न + अ)] + ब / [(न + अ) (न + अ + ब)] + स / [(न + अ + ब) (न + अ + ब + स)]

  • द / [द (न + अ + ब + स)]
    = [अ (न + अ + ब) + ब न] / [न (न + अ) (न + अ + ब)] + [स + न + अ + ब] / [(न + अ + ब) (न + अ + ब + स)]
    = [(न + अ) (अ + ब)] / [न (न + अ) (न + अ + ब)] + १ / [न + अ + ब] = [अ + ब + न] / [न (न + अ + ब)]
    = १ / न
    ( ८० ) बीजीय रूप से, यदि अ/न योग है तो प्रथम भिन्न १ / [(न + प)/अ] होता है; और नियम

-३. ८४ ] कलासवर्णव्यवहारः [ ५५
अत्रोद्देशकः
त्रयाणां रूपकांशानां राशीनां के हरा वद् । फलं चतुर्थभागः स्याच्चतुर्णां च त्रिसप्तमम् ।।८१।।
एकांशानामनेकांशानां चानेकांशे फले छेदोत्पत्तौ सूत्रम्—
इष्टहता दृष्टांशाः फलांशसदृशो यथा हि तद्योगः । निजगुणहृतफलहारस्तद्धारो भवति निर्दिष्टः॥८२॥
अत्रोद्देशकः
एकांशांशेन राशीनां त्रयाणां के हरा वद । द्वादशाप्ता त्रयोविंशत्यशंका च युतिर्भवेत् ।।८३।।
त्रिसप्तकनवांशानां त्रयाणां के हरा वद । द्वयूनपञ्चाशदाप्ता त्रिसप्तत्यंशा युतिर्भवेत् ।।८४।।
एकांशकयो राश्योरेकांशे फले छेदोत्पत्तौ सूत्रम्—
१ ८३ और ८४ श्लोक B में छूट गये हैं ।
उदाहरणार्थ प्रश्न
तीन विभिन्न भिन्नीय राशियों का योग १/४ है, तथा उनमें से प्रत्येक का अंश १ है । ऐसी
चार अन्य राशियों का योग ३/७ है । बतलाओ कि हर क्या हैं ? ॥८१॥
जिनका अंश एक अथवा कोई और संख्या हो ऐसे कुछ इच्छित भिन्नों के हर निकालने के लिये
नियम जब कि उन भिन्नों के योग का अंश १ की अपेक्षा अन्य संख्या हो—
ज्ञात अंश कुछ चुनी हुई राशियों द्वारा गुणित किये जाते हैं, ताकि इन गुणनफलों का योग
इष्ट भिन्नों के दिये गये योग के अंश के बराबर हो जावे । यदि इष्ट भिन्नों के दिये गये योग के हर
को उसी गुणक से विभाजित किया जाय ( जिससे कि दिया गया अंश गुणित किया गया है ) तो वह
अंश सम्बन्धी चाहे हुए हर को उत्पन्न करता है ॥८२॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
तीन भिन्नीय राशियों में, प्रत्येक का अंश १ है । उनके हरों का मान निकालो जब कि उन
राशियों का योग २३/१२ हो ॥८३॥ क्रमशः ३, ७ और ९ अंशवाली तीन भिन्नीय राशियों के हरों का
मान बतलाओ जब कि उन राशियों का योग ७३/४८ हो ॥८४॥
१ अंशवाली दो भिन्नीय राशियों के हरों का मान निकालने के लिये नियम जब कि उन
भिन्नीय राशियों के योग का अंश १ हो—
दिये गये योग के हर को चुनी हुई संख्या द्वारा गुणित करने पर किसी एक इष्ट भिन्नीय राशि
का हर प्राप्त होता है । यह हर, एक कम ( पिछली ) चुनी हुई संख्या द्वारा विभाजित किया जाने पर
में शेष भिन्नों का योग [ प / { ((न + प)/अ) · न } ] कथित है, जहां 'प' चुनी हुई राशि है । यह [ प / { ((न + प)/अ) · न } ] स्पष्ट रूप
से [ अ/न - १ / { (न + प)/अ } ] को हल करने से प्राप्त होती है । यहां प को इस तरह चुनना चाहिये कि (न + प)
में अ का पूरा पूरा भाग जा सके ।

५६ ] गणितसारसंग्रहः [ ३. ८५-
वाञ्छाहतयुतिहारश्छेदः स व्येकवाञ्छयाप्तोऽन्यः ।
फलहारहारलब्धे स्वयोगगुणिते हरौ वा स्तः ॥८५॥
अत्रोद्देशकः
राश्योरेकांशयोश्छेदौ कौ भवेतां तयोर्युतिः ।
षडंशो दशभागो वा ब्रूहि त्वं गणितार्थवित् ॥८६॥
एकांशकयोरनेकांशयोश्च एकांशेऽनेकांशेऽपि फले छेदोत्पत्तौ प्रथमसूत्रम्—
इष्टगुणांशोऽन्यांशप्रयुतः शुद्धं हतः फलांशेन । इष्टाप्तयुतिहरघ्नो हरः परस्य तु तदिष्टहतिः ॥८७॥
१ P और B में यह पाठान्तर जुड़ा है:—
शुद्धं फलांशभक्तः स्वान्यांशयुतो निजेष्टगुणितांशः ।
दूसरे इष्ट अंश को उत्पन्न करता है । अथवा, दिये गये योग के हर के सम्बन्ध में किसी चुने हुए
भाजक और प्राप्त भजनफल में से प्रत्येक को उनके योग द्वारा गुणित करने पर दो इष्ट हरों की उत्पत्ति
होती है ॥८५॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे अंकगणित के सिद्धान्तों के ज्ञाता ! दो इष्ट भिन्नीय राशियों के हर निकालो जब कि उनका
योग या तो १/६ अथवा १/१० हो ॥८६॥
जिनका अंश १ अथवा कोई और संख्या है ऐसे दो इष्ट भिन्नों के हरों को निकालने के लिये
नियम जब कि उन भिन्नों के योग का अंश १ अथवा कोई और संख्या हो—
कोई भी एक (either) अंश चुनी हुई संख्या द्वारा गुणित होकर, तब अन्य अंश द्वारा मिलाया
जाकर, तब इष्ट भिन्नों के दिये गये योग के अंश द्वारा विभाजित होकर (ताकि कुछ भी शेष न रहे, )
और तब ऊपर की चुनी हुई संख्या द्वारा विभाजित होकर तथा इष्ट भिन्नों के योग के हर द्वारा
गुणित होकर, चाहे हुए हर को उत्पन्न करता है । अन्य भिन्न का हर इस हर को ऊपर की चुनी हुई राशि
द्वारा गुणित कर प्राप्त कर सकते हैं ॥८७॥
( ८५ ) बीजीय रूप से, जब दो इष्ट भिन्नों का योग १/न है, तो इस नियम के अनुसार भिन्न
क्रमशः १/पन तथा १/((प न)/(प-१)) होते हैं, जहां प कोई भी चुनी हुई राशि है । यह शीघ्र देखने में
आवेगा कि इन दोनों भिन्नों का योग १/न है ।
अथवा, जब योग १/(अ ब) हो, तब भिन्नों को १/(अ (अ + ब)) और १/(ब (अ + ब)) लिया जा सकता है ।
( ८७ ) बीजीय रूप से, यदि अ और ब अंश वाले दो इष्ट भिन्नों का योग म/न है तो वे भिन्न
अ / [((अप + ब)/म) × (न/प)] और ब / [((अप + ब)/म) × (न/प) × प] होंगे, जहाँ 'प' कोई भी संख्या इस तरह चुनी गई है कि
अप + ब को म द्वारा विभाजित किया जा सके । इन भिन्नों का योग म/न प्राप्त होगा ।

-३. ९३ ] कलासवर्णव्यवहारः [ ५७
अत्रोद्देशकः
रूपांशकयो राश्योः कौ स्यातां हारकौ युतिः पादः ।
पञ्चांशो वा द्विहतः सप्तकनवकांशयोश्च वद ॥८८॥
द्वितीयसूत्रम्—
फलहारताडितांशः परांशसहितः फलांशकेन हृतः ।
स्यादेकस्य च्छेदः फलहरगुणितोऽयमन्यस्य ॥८९॥
अत्रोद्देशकः
राशिद्वयस्य कौ हारावेकांशस्यास्य संयुतिः । द्विसप्तांशो भवेद्ब्रूहि षडष्टांशस्य च प्रिय ॥९०॥
अर्धेत्र्यंशदशांशकपञ्चदशांशकयुतिर्भवेद्रूपम् । त्यक्ते पञ्चदशांशे रूपांशावत्र कौ योज्यौ ॥९१॥
दलपादपञ्चमांशकविंशानां भवति संयुती रूपम् । सप्तैकादशकांशौ कौ योज्याविह विना विंशम् ॥९२
युग्मान्याश्रित्य च्छेदोत्पत्तौ सूत्रम्—
युग्मप्रमितान् भागानेकैकांशान् प्रकल्प्य फलराशेः ।
तेभ्यः फलात्मकेभ्यो द्विराशिविधिना हराः साध्याः ॥९३॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
दो इष्ट भिन्नीय राशियों में प्रत्येक का अंश १ है । इनके हरों को निकालो जब कि उन राशियों
का योग या तो १/४ अथवा २/५ हों । साथ ही, उन दो अन्य भिन्नीय राशियों के हर निकालो जिनके अंश
क्रमशः ७ और ९ हैं ॥८८॥
दूसरा नियम निम्नलिखित है :—
इष्ट भिन्नों में किसी एक के अंश को इष्ट भिन्नों के योग के हर द्वारा गुणित कर दूसरे अंश में
मिलाते हैं । प्राप्त फल को इष्ट भिन्नों के योग के अंश द्वारा विभाजित करते हैं तो इष्ट भिन्नों में से
एक भिन्न का हर उत्पन्न होता है । इस हर को जब इष्ट भिन्नों के योग के हर द्वारा गुणित करते हैं तब
वह दूसरे भिन्न का हर हो जाता है ॥८९॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
हे मित्र ! मुझे बतलाओ कि दो भिन्नीय राशियों के (जिनमें प्रत्येक के अंश १, १ हैं) हर
क्या होंगे जब कि उन इष्ट भिन्नों का योग २/७ है । दो अन्य इष्ट भिन्नों के भी हर क्या होंगे जिनके अंश
क्रमशः ६ और ८ हों ॥९०॥ १/२, १/३, १/१० और १/१५ का योग १ है । यदि १/१५ छोड़ दिया जावे तो दो
ऐसे १ अंश वाले भिन्न बतलाओ जिनको शेष भिन्नों में जोड़ने पर योग पुनः कुल के तुल्य हो जावे ॥९१॥
१/२, १/४, १/५ और १/२० का योग १ है । यदि १/२० छोड़ दिया जाय तो क्रमशः ७ और ११ हर वाले ऐसे दो
भिन्न कौन से होंगे जिनको शेष में जोड़ने पर उनका योग कुल योग के तुल्य हो जावे ॥९२॥
कुछ इष्ट भिन्नों को युग्मों (pairs) में लेकर उनके हरों को निकालने के लिये नियम—
सब इष्ट भिन्नों के योग को दिये गये अंशों के युग्मों की संख्या के तुल्य भागों में विपाटित
करने के बाद, (इस तरह कि प्रत्येक के अंश १, १ हों), इन भागों को युग्मों के योग में अलग-अलग
(८९) गाथा ८७ में दिये गये नियम की यह विशेष स्थिति है क्योंकि इष्ट भिन्नों के हर का
आदेशन (substitution) इस नियम में, पिछले नियम में चुनी गई राशि के स्थान में करते हैं।
ग० सा० सं०-८

५८ ] गणितसारसंग्रहः [ ३. ९४-
अत्रोद्देशकः
त्रिकपञ्चकत्रयोदशसप्तनवैकादशांशराशीनाम् । के हाराः फलमेकं पञ्चांशो वा चतुर्गुणितः ॥९४॥
एकसूत्रोत्पन्नरूपांशहारैः सूत्रान्तरतोत्पन्नरूपांशहारैश्च फले रूपे छेदोत्पत्तौ नष्टभागानयनेच
सूत्रम्—
वाञ्छितसूत्रजहारा हरा भवन्त्यन्यसूत्रजहरघ्नाः । दृष्टांशैक्योनं फलमभीष्टनष्टांशमानं स्यात् ॥९५॥
अत्रोद्देशकः
परहतिदलनविधानात्त्रयोदश स्वपरसंगुणविधानात् ।
भागाश्चत्वारोऽतः कति भागाः स्युः फले रूपे ॥९६॥
प्राक्स्वपरहूतविधानात्सप्तस्वाासन्नपरगुणार्धविधानात् ।
भागास्त्रितयञ्चातः कति भागाः स्युः फले रूपे ॥९७॥
रूपांशका द्विषट्द्वादशविंशतिहरा विनष्टोऽत्र । पञ्चमराशी रूपं सर्वसमासः स राशिः कः ॥९८॥
इति भागजातिः ।
लेते हैं । उनमें से चाहे हुए हरों को, दो घटक भिन्नीय राशियों के सम्बन्ध में बतलाये गये नियम
द्वारा निकालते हैं ॥९३॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
उन इष्ट भिन्नों के हर क्या होंगे जिनके अंश क्रमशः ३, ५, १३, ७, ९ और ११ हैं, जब कि
उन भिन्नीय राशियों का योग १ अथवा दै है ? ॥९४॥
जिनका संवादी अंश १ है और जो उपर्युक्त नियमों द्वारा प्राप्त किये गये हैं ऐसे हरों की
सहायता से कुछ हरों को निकालने के लिये ( नियम ); तथा जिनका संवादी अंश १ है और जिनके
इष्ट भिन्नों का योग एक है तथा जो उपर्युक्त अन्य नियमों द्वारा प्राप्त किये गये हैं ऐसे भिन्नों की
सहायता से हरों को निकालने के लिये ( नियम ) और नष्ट भाग का मान निकालने के लिये नियम—
किसी भी चुने हुए नियम के अनुसार प्राप्त हरों को दूसरे नियम से प्राप्त हरों द्वारा गुणित करने
पर चाहे हुए हर प्राप्त होते हैं । इन भिन्नों का योग, विशिष्ट भाग के योग द्वारा हासित किये जाने
पर छोड़े हुए नष्ट भाग का मान होता है ॥९५॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
नियम ७७ द्वारा प्राप्त भिन्नों की संख्या १३ है और नियम क्रम ७८ द्वारा प्राप्त भिन्नों की
संख्या ४ है । इन नियमों की सहायता से प्राप्त भिन्नों का योग १ है, तो बतलाओ कि विघटक भिन्न
कितने हैं ? ॥९६॥ गाथा ७८ के नियम द्वारा प्राप्त भिन्नों की संख्या ७ है और नियम ७७ गाथानुसार
प्राप्त संख्या ३ है । यदि इन नियमों द्वारा प्राप्त भिन्नों का योग १ हो तो बतलाओ विघटक भिन्न कितने
हैं ? ॥९७॥ जिनके अंश १, १ हैं ऐसे कुछ भिन्नों के हर क्रमशः २, ६, १२ और २० हैं । यहां
पांचवीं भिन्नीय राशि छोड़ दी गई है । इन पाँचों भिन्नों का योग १ है, बतलाओ कि वह छोड़ी
गई भिन्नीय राशि क्या है ? ॥९८॥
इस प्रकार, कलासवर्ण षड्जाति में भाग जाति नामक परिच्छेद समाप्त हुआ ।
( ९३ ) दो भिन्नीय राशियों के सम्बन्ध में गाथा ८५, ८७ और ८९ में नियम दे दिये गये हैं ।