गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
प्रस्तावना 21
प्रयुक्त करने, तथा गणित में गति लाने में कहां तक प्रेरक रहा होगा, इस पर हमें अभी विचार करना
शेष है। उपर्युक्त गणित के प्रयोग हम प्राकृत ग्रंथों में देखते हैं, परन्तु विशेषरूप से दो तथ्य हमें आश्चर्य
में डाल देते हैं:—
( १ ) तिलोय-पण्णत्ती के चतुर्थ अधिकार में गाथा १८० और १८१ में दिये गये सूत्र जीवा और धनुष
का प्रमाण निकालने के लिए उद्धृत हुए हैं। गणना √१० के आधार पर इन सूत्रों की संरचना का
प्रमाण मिलता है। जीवा के विषय में बिल्कुल ऐसा ही सूत्र,
जीवा = √[ ४[ ( व्यास / २ )² - ( व्यास / २ - बाण )² ] के रूप में, बेबिलन के अभिलेखों के
आधार पर २६०० ई० पूर्व (?) उपस्थित होना आश्चर्य जनक है। जहाँ π का मान ३ होना स्वीकृत हो
चुका था वहाँ पिथेगोरस के साध्य के आधार पर इस सूत्र का होना उपयुक्त प्रतीत होता है । धनुष के
सम्बन्ध में दिया गया सूत्र, π का मान √१० लेने के आधार पर है जो बेबिलन में अप्राप्य है ।‡
( २ ) वीरसेन ने क्षेत्र प्रयोग विधिके आधार पर जो बीजीय समीकरणों का रैखिकीय निरूपण दिया
है, वह भी क्या बेबिलन अथवा यूनान से लिया गया है, अथवा पारपरिमित गणात्मक संख्याओं के
निरूपण के लिये प्रचलित अनेक विधियों में से एक यह विधि भी जैनाचार्यों की मौलिक रूप से आविष्कृत
विधि है, यह भी विचारणीय है ।*
( ३ ) षाष्टिका पद्धति का उद्गम स्थल बेबिलन माना जाता है । ६० को आधार लेने के कई
कारण प्रस्तुत किए गये हैं। यह पद्धति ज्योतिष में विशेष रूप से स्थान पाये हुए है। तिलोय पण्णत्ती में
सूर्य का एक पूर्ण परिभ्रमण ६० मुहूतों में माना है। ६०, माने हुए १०९८०० गगन खंडों का एक गुणनखंड
भी है । यह गणना भी बेबिलन और चीन से सहसम्बन्ध खोजने में सम्भवतः सहायक सिद्ध हो सकती है ।
अब हम यूनान में प्रवेश करते हैं। यहाँ, निस्संदेह, ज्योतिष गणना में राशि सिद्धान्त, १२ घंटे का
दिन, छाया माप निरूपण ( सूर्य घड़ी के रूप में Gnomon और Polos ), चन्द्र और ग्रहों की गतियों
का अवलोकन, बेबिलनीय प्रभावों से अछूता नहीं है। परन्तु यह सब प्रभाव क्या पिथेगोरस कालीन है,
अथवा पिथेगोरस पर ज्योतिष का भी प्रभाव किसी दूसरे देश का था, इस पर विचार करना है । इस में
सन्देह नहीं कि उक्त प्रभाव पिथेगोरस के बाद दृष्टिगत अवश्य होता है । परन्तु हमें पिथेगोरस के काल
का अध्ययन बड़ी सावधानी से करने की आवश्यकता है । इसके विषय में हम सर्वप्रथम कुछ किंवदंतियों
और तथ्य पाठकों के सम्मुख रखना चाहेंगे।
( १ ) यूनान के “सात ज्ञानियों” में से थेलीज़ प्रथम था, जिनके विषय में कहा जाता था,
“Sayings such as the celebrated Delphic “Know thyself” were
ascribed to themӠ
( २ ) सूर्य ग्रहण के विषय में जो फलित थेलीज़ ने घोषित किया था, उसके विषयमें वाएर्डेन का
का यह कथन है—
“Herodotus reports ( see p. 84 ) that, during the battle on the
Halys, day was suddenly turned into night and that Thales had pre-
‡ J. L. Coolidge : A History of Geometrical Methods, pp. 6, 7 ( 1940 ).
- षट् खंडागम पु., ३, पृ. ४२-४३ ।
† Science Awakening, p. 85.
22 गणितसारसंग्रह
dicted this event to the Delians for that year. According to Diogenes
Laertius, Xenophanes voiced his admiration of Thales for this pre-
diction. Thus, besides Herodotus, we have the older witness Xenopha-
nes for this accomplishment. At present it is generally agreed that
this event refers to the solar eclipse of 585 B. C.
How was it possible for Thales, who according to all our sources,
is the first Greek astronomer, to predict a solar eclipse ? Such a
feat requires the experience of more than forty years, no matter how
one proceeds. It is not possible for one man alone to gather this ex-
perience. But Thales had no Greek predecessors. The conclusion is
inescapable that he must have drawn upon the experience of Oriental
astronomers."*
( ३ ) थेलीज़ को सम्भवतः बेबिलन वासियों (?) से निम्नलिखित ज्यामितीय फल प्राप्त हुए थे,
जिनके लिए उसने उपपत्ति आदि देने का प्रयत्न किया :
( अ ) वृत्त का व्यास उसे समद्विभाजित करता है ।
( ब ) सम द्विबाहु त्रिभुज के आधारीय कोण समरूप ( similar ) होते हैं ।
( स ) युडीमस के अनुसार, उसने यह खोजा था कि दो सरल रेखाओं के प्रतिच्छेदन से
प्राप्त कोण समान होते हैं । इत्यादि ।
( ४ ) थेलीज़ के काल में मिस्र और बेबिलन का गणित मृतप्राय हो चुका था ।†
( ५ ) नीओ-प्लेटोनिस्ट ( Neo-Platonist ) प्रोक्लस ( Proclus, 412-485 A. D. ) ने
पिथेगोरस की ज्यामिति के सम्बन्ध में यह उल्लेख किया है,
Pythagorus, who came after him, transformed this science into
a free form of education; he examined this discipline from its first
principles and he endeavoured to study the propositions, without
concrete representation, by purely logical thinking. He also dis-
covered the theory of irrationals ( or of proportions ) and the con-
struction of the cosmic solids ( i. e. of the regular polyhedra )‡
उपर्युक्त विवरण से प्रतीत होता है कि ज्यामितीय और ज्योतिषीय सामग्री, यूनान में इस काल में
बाहरी देशों से लाकर, सूक्ष्मरूप से अवलोकित कर, तर्क पर आधारित गहन अध्ययन का विषय बनाई
गई । इसमें सन्देह नहीं, कि उक्त सामग्री ने इन विद्वानों को प्रभावित किया होगा, क्योंकि बिना प्रभाव
के, किसी विषय की ओर ध्यान आकृष्ट होना साधारणतः सम्भव प्रतीत नहीं होता । जो बात, बीजरूप
से प्रभावक प्रतीत होती है, वह “गणित द्वारा प्रतिपादित धर्म से आत्मा का उत्थान करना” दृष्टिगत
- Ibid. p. 86.
†·Ibid. p. 89.
‡ Ibid. p. 90.
प्रस्तावना 23
होती है। देखें कि प्रभाव का यह माध्यम पिथेगोरस के वर्ग और वर्द्धमान महावीर के तीर्थ से कहाँ तक
सदृशता रखता है ?
( १ ) ऐसा प्रतीत होता है, कि ईसा से प्रायः ( ५८२–५०० ? ) वर्ष पूर्व मिस्र में प्रबल स्वेच्छा
से रहते हुए पिथेगोरस ने जिनके संसर्ग में स्वतः को विभिन्न विज्ञानों से ( a lot of knowledge
without intellect )⁕ परिचित किया था, उनके मिशन का प्रभाव उसके नैतिक जीवन में पशु
के प्रति ( मुक्ति हेतु ), विशुद्ध दया की छाप छोड़ बैठा था,
“But this crazy crank Pythagorus had made quite a fuss when he
saw one of the prominent citizens taking a stick to his dog. “Stop
beating that dog !” he had shouted like a madman. “In his howls of
pain l recognize the voice of a friend who died in Memphis twelve
years ago. For a sin such as you are committing he is now the dog of
a harsh master. By the next turn of the Wheel of Birth, he may be
the master and you the dog. May he be more merciful to you than
you are to him. Only thus can he escape the Wheel. In the name of
Apollo my father, stop, or I shall be compelled to lay on you the
tenfold curse of the tetractys.Ӡ
( २ ) इस चदुचंक्रमण ( tetractys ), चतुर्गति बंधन ( स्वस्तिक प्ररूपणा ? ) से विमुक्ति
हेतु पिथेगोरस और आगे बढ़कर, हरे पौधों के प्रति भी, ममता प्रदर्शित करता है,
“Then, too, there was all this talk about what he ate, or rather
about what he would not eat. What could the man possibly have
against beans ? They were a staple of everyone’s diet; and here was
Pythagorus refusing to touch them because they might harbour the
souls of his dead friends……..He had even deterred a cow from
trampling a patch of beans by whispering some magic word in its
ear”‡
इसी प्रकार, ( एकेन्द्रिय जीव, बालों, से निर्मित ) ऊनी कपड़ों से सम्बन्धित अभ्युक्ति निम्न
प्रकार है,
“He also tells that the Pythagoreans did not bury their dead in
woollen clothing.² This looks more like religious ritual than like
mathematics. The Pythagoreans, who were held up to ridicule on the
stage, were presented as superstitious, as filthy vegetarians,³ but not
as mathematicians”. []
⁕ Ibid. p. 13.
† E. T. Bell, The Magic of Numbers, p. 87, ( 1946 )
‡ The Magic of Numbers pp. 91, 92.
[] Science Awakening p. 92.
24 गणितसारसंग्रह
( ३ ) पुनः, मांस भक्षण निषेध की शैली में आत्मा की नियत संख्या के रूप में गणित का प्रवेश है,
"The thought of all the souls they might have left shivering
in the void by devouring their own goats and swine made the good
Samians extremely unhappy. A few weeks more of these upsetting
suggestions, and they would all be strict vegetarians—except for beans.
Equally upsetting was the ghastly thought that some of their
own children might be malicious little monsters with no souls to
restrain their bestial instincts. For Pythagorus had assured them
that the total number of souls in the universe is constant".*
आत्माओं के पुनर्जन्म तथा आत्मा की अमरता का उपदेश देने वाले पिथोगोरस के वर्ग बन्धुत्व में,
गणित की महत्ता दर्शाने वाला उल्लेख निम्नलिखित भी है :
"The Pythagoreans thus have purification and initiation in co-
mmon with several other mystery-rites. Ascetic, monestic living, vege-
tarianism, and common ownership of goods occur also in other sects.
But, what distinguishes the Pythagoreans from all others, is the road
along which they believe the elevation of the soul and the union with
God to take place, namely by means of mathematics. Mathematics
formed a part of their religion. Their doctrine proclaims that God
has ordered the universe by means of numbers. God is unity, the
world is plurality and it consists of contrasting elements. It is har-
mony which restores unity to the contrasting parts and which moulds
them into a cosmos. Harmony is divine, it consists of numerical ratios.
Whosoever acquires full understanding of this number-harmony, he
becomes himself divine and immortal."†
अभी यह कहना कठिन है कि पिथेगोरस ने वही प्रतिपादन किया जो वर्द्धमान महावीर के तीर्थ
में परम्परा के आधार पर किया गया प्रतीत होता है । परन्तु, धवला ग्रंथों ( विशेषकर, षट्खंडागम पु. ३ )
को देखने पर यह अवश्य प्रतीत होता है कि इन दोनों वर्गों के लक्ष्य प्रायः एक से रहे हैं । इसकी पुष्टि,
पुनः, निम्नलिखित उद्धरण से होती है,
"According to Hėraclides of Pontus, Pythagorus said that,
"Beatitude is the knowledge of the perfection of the numbers of
the soul". Mathematics and number mysticism mingle fantastically
in the Pythagorean doctrine. Nevertheless, it was from this mystical
doctrine that the exact science of the later Pythagoreans deve-
loped."()
- The magic of Numbers, p. 92.
† Science Awakening p. 93.
() Ibid p. 94.
प्रस्तावना 25
( ४ ) पिथेगोरस के लिये “a lot of knowledge without intellect” से सम्बन्धित
अभ्युक्ति वाएर्डेन ने इस प्रकार दी है :
“This contemptuous remark cannot refer to a logically
constructed theory of numbers and a geometry such as we find in the
writings of the later Pythagoreans. But, if Pythagorus gathered into
one lump, all kinds of half-assimilated learning about the gods and
the stars, about musical scales, sacred numbers and geometrical
calculations, and proclaimed such an omnium-gatherum to his
followers as divine wisdom in a prophetic manner, then Heraclitus’
ridicule, as well as the veneration of mystics, such as Empedocles,
become entirely understandable”.*
इसी प्रकार, एक और ऐसा उल्लेख है जो विचारणीय है :
“What inspiration laid forceful hold on Pythagorus when he
discovered the subtle geometry of (the heavenly) spirals and comp-
ressed in a small sphere the whole of the circle which the aether
embraces.Ӡ
पिथेगोरीय वर्ग ने ग्रहों को जीवित देवताओं की मान्यता दी है । एक और महत्वपूर्ण तथ्य है,
“चन्द्र सम्बन्धी गणना में ५९ का आधार”, यथा,
“Firmly convinced of the mystic values of numbers, Pytha-
gorus determined to a base a brand new cycle on a primary founda-
tion of arithmetic. Fifty-nine was a “beautiful” number, since it
was a prime. When to this was added the undoubted fact that,
when we count the days and nights in every one of the moon’s
months, the total is always 59,......”‡
इस ५९ दिन और रात्रि प्रकरण से सम्बन्धित आधारभूत प्राकृत ग्रंथों में विशेष विस्तार से वर्णित
चंद्र सम्बन्धी गणना है । यह ज्ञात है कि सूर्य की अपेक्षा से चंद्र एक मुहूर्त में ६२ गगनखंड पीछे रह जाता
है, इसलिये १०९८०० गगनखंड अथवा एक परिभ्रमण पूर्ण करने में ५९ ३६/६२ दिन लगते हैं,
इस आधार पर चंद्र अर्द्धचक्र का synodic मास २९.५१२······दिन निकलता है । यहाँ
बतलाना आवश्यक है कि हिन्दू ज्योतिष ग्रंथों की अयन प्रवृत्ति प्राकृत ज्योतिष ग्रंथों से भिन्न है ।()
( ५ ) आगे, जहाँ परिमित, अपरिमित, एकत्व, अनेकत्व, सांत, अनन्त आदि के विषय में रुचि
लेने वाले पिथेगोरस के वर्ग ने अपरिमेय राशियों को दृश्यरूप देकर परिमेय बनाया और इस प्रकार
- Ibid. p. 95.
† Heath, Greek History of Mathematics, Vol. 1, p. 163. ( 1921 )
‡ A. T. Olmsteed, History of Persian Empire, Chicago, p. 209, ( 1948 )
() जैन-सिद्धांत-भास्कर, भाग ८, किरण २, पृ. ७७, ( १९४१ )
ग० सा० सं० प्र०-४
26 गणितसारसंग्रह
ज्यामिति पर आधारित अद्वितीय साधन को प्रकाश में लाया, उसी प्रकार यहाँ भारत में षट्खंडागम जैसे
सिद्धान्त ग्रन्थों में न केवल दर्शन और धर्म को, वरन् द्रव्यों (जीव और पुद्गल) के प्रमाणों को द्रव्य, क्षेत्र,
काल, भाव, विकल्प, अल्प बहुत्व के साधनों से दृश्य रूप दिया। इसका वृहद विवेचन यहाँ देना सम्भव
नहीं है। इसके हेतु तिलोय पण्णत्ती के गणित के सिवाय धवल ग्रन्थों में मुख्यतः पुस्तक ३ और ४, केशव
वर्णी अथवा टोडरमल की गोम्मटसार की टीका तथा गोपालदास बरैया कृत जैनसिद्धान्तदर्पण दृष्टव्य हैं।
यहाँ यह बात बतलाना आवश्यक है कि पिथेगोरीय वर्ग ने जहाँ अपरिमेयको परिमेय बनाने के
लिये ज्यामिति आकृतियों का आश्रय लिया है, वहाँ प्राकृत ग्रन्थों में परिमेय का बोध देने के पश्चात् उसे
अपरिमेय रूप में भी प्रस्तुत किया है। यहीं सामान्यकरण का बीज छिपा है। इनके प्रदर्शन के लिये प्राकृत
ग्रन्थों में जहाँ परमाणु द्वारा अवगाहित आकाश-प्रदेश (बिन्दु) को मूलभूत लिया है, वहाँ पिथेगोरस का
बिन्दु भी उल्लेखनीय है,
"Points are the primary elements of space for Pythagorus, and
a point is that which has position only. Unlike material things a
point has neither parts nor magnitude. These defects are shared
by 1 when the latter is regarded as the Monad or the generative
element of number. If Pythagorus thought of space as being made
up of points, then points generated his space. But whatever he
imagined space to be, he identified a point with 1."*
(६) १ को संख्या राशि में समन्वित न करने वाले और सम्भवतः भारतीय पगड़ी† को धारण
करने वाले पिथेगोरस का बिन्दु हमें एलिया निवासी ज़ीनो के चार असद्भासों (विरोधाभासों) की ओर
भी आकृष्ट करता है। प्लेटो ने उल्लेख किया है कि वह समझ चुका था कि किसी वस्तु को समान और
असमान, एक और अनेक, स्थिर और गतिवान् कैसे सिद्ध करना।‡
ज़ीनो के "सान्त की अनन्त विभाज्यता के खंडन" और अविभागी "समय" ( now ) अथवा
"वर्तमान काल" जैसी अवधारणाओं (concepts) में हम जिनागम प्रणीत "प्रदेश" और "समय"
सम्बन्धी मान्यताओं का स्पष्ट बिम्ब देखते हैं। इस सम्बन्ध में ऐसा प्रतीत होता है मानो स्याद्वाद पर
आधारित अनेकान्तात्मक वस्तु स्वरूप विषयक ज्ञान का ज़ीनो ने आधार लेकर सम्भवतः इन असद्भासों
आदि का संकलन केवल अपने आराध्य पारमेनिडीज़ (Parmenides, fl. 5th century B. C.)
के सिद्धान्तों की रक्षा के लिए विवादोत्सुक विद्वानों को विडम्बना में डालने के हेतु किया हो। इसकी पुष्टि
निम्नलिखित अवतरण से होती प्रतीत होती है :
"'Yes, Socrates', said Zeno; 'but though you are as keen as a
Sparton hound, you do not quite catch the motive of the piece,
which was only intended to protect Parmenides against ridicule...'"[]
- The Magic of Numbers, p. 161.
† Science Awakening, Plate 13, p. 112.
‡ T. Heath : Greek History of Mathematics, vol. (i), p. 273.
[] The Dialogues of Plato by B. Jowett, vol. II, p 634, (1953) Oxford.
परिकर्माधिकार एवं कलासवर्ण व्यवहार (अंकगणितीय संक्रियाएँ व भिन्न)
प्रस्तावना 27
इसके साथ ही सत्य के पुजारी और विष प्याले के ग्राहक सॉक्राटीज़ ( Socrates, 469-399
B. C. ) सम्बन्धी अभ्युक्ति भी विचारणीय है,
“Here we have, first of all, an unmistakable attack made by
the youthful Socrates on the paradoxes of Zeno. He perfectly under-
stands their drift, and Zeno himself is supposed of to admit this.
But they appear to him, as he says in the Philebus also to be rather
truisms than paradoxes.”*
एरिस्टाटिल के शब्दों में प्रथम दो तर्क निम्नलिखित हैं :—
( १ ) डाइकॉटोमी ( Dichotomy ) :—कोई भी गमन नहीं होता, क्योंकि जिसे गति क्रिया
रूप में परिणत किया जाता है उसे अंत में पहुँचने के पूर्व ( दूरी के ) मध्य में पहुँचना पड़ेगा' ( और
उस अर्द्ध भाग को तय करने के पूर्व अर्द्ध का अर्द्ध भाग तय करना होगा और इस प्रकार अनन्त तक ।)†
( २ ) आकिलीज़ ( The Achilles ) 'कथन है कि मन्द गतिवान् को तीव्र गतिवान् कभी
न पकड़ सकेगा; क्योंकि जिस स्थान को मंद गतिवान् ने छोड़ा है वहाँ तक तीव्र गतिवान् को पहुँचना
पड़ेगा और इसलिये मंद गतिवान् आवश्यककीय रूप से सदा कुछ दूर आगे ही रहेगा।' ‡
स्पष्ट है कि ये दो तर्क परिमित अखंड महत्ताओं की अनन्त विभाज्यता का खंडन करते हैं । जिनागम
के अनुसार अमूर्तिक आकाश द्रव्य को स्यात् अखंड और स्यात् अनन्त प्रदेशवान् माना गया है । प्रदेश
(खंड) की अवधारणा पुद्गल परमाणु की अविभाज्यता या अंत्य महत्ता के आधार पर मुख्य रूप से की गई
है । इस प्रकार अमूर्त द्रव्य में भेद (विभाजन) की कल्पना को स्थान न देकर केवल मूर्त द्रव्य पुद्गल में भेद
की सम्भावना की पुष्टि कर, और प्रदेश की परिभाषा, “जितने आकाश को एक अविभागी पुद्गल परमाणु
को व्याप्त करे” रूप में देकर, लोकाकाश में असंख्यात प्रदेशों की मुख्य रूप से कल्पना की गई है ।
यहाँ तक ही नहीं, वरन् एक सूच्यंगुल में प्रदेशों की संख्या का प्रमाण, संख्यामान और उपमामान में
समीकरण स्थापित करते हुए, वह प्रमाण बतलाया गया है जो पल्योपम काल राशि में स्थापित समयों
की संख्या के अर्द्धच्छेद प्रमाण का परस्पर गुणन करने पर प्राप्त हो । इस परम्परागत समीकरण के आधार
पर प्रथम तर्क का समाधान होता प्रतीत होता है, क्योंकि सृष्टि में परमाणु को अंत्य महत्ता प्राप्त करा
देने पर, किसी परिमित दूरी में अर्द्धच्छेदों की संख्या का प्रमाण अधिक से अधिक असंख्यात ही होने पर,
अनन्त विभाज्यता का प्रश्न उठता प्रतीत नहीं होता । असंख्यात प्रमाण मुख्यरूप कल्पना के आधार पर,
द्वितीय तर्क भी समाधानित होता प्रतीत होता है, क्योंकि परमाणु स्वरूप अंत्यमहत्ता वाली वस्तुओं के
भी गमनसम्बन्धी सद्भाव में किसी दूरी के अर्द्धच्छेद, त्र्यक्च्छेद, चतुर्थच्छेद आदि सभी की संख्या, प्रदेश
की कल्पना के आधार पर असंख्यात अथवा संख्यात ही होगी, अनन्त नहीं; और इस प्रकार “कभी
नहीं” प्रश्न भी समाधानित होता प्रतीत होता है । ऐसा प्रतीत होता है मानो ज़ीनो ने भौतिक संसार
में होने वाली घटनाओं को ही वास्तविक आधार मानकर अमूर्तिक आकाश की विभाज्यता की कल्पना
का खंडन किया है। ऐसा कहा जाता है कि ये तर्क पिथेगोरीय सिद्धान्तों के खंडन के लिये नहीं थे,
* Ibid. p. 638.
† T. Heath, Greek History of Mathmetics vol. I, p. 275, ( 1921 )
‡ Ibid. pp. 275 276.
28 गणितसारसंग्रह
क्योंकि पिथेगोरीय वर्ग ने बिन्दु अथवा प्रदेश की परिभाषा, “स्थिति वाला एकक” ( unit
having position ) के रूप में स्थापित की थी। *
इन दो तर्कों के आधार पर, वीरसेन की शैली में, “परन्तु ऐसा है नहीं” यह अन्यथा युक्ति
खंडन ( अनिष्ट प्रदर्शन ) विधि, जिनागम प्रणीत उक्त तथ्यों की पुष्टि करने की विधियों के समान प्रतीत
होती है । अथवा ऐसा मालूम पड़ता है मानो सीमित क्षेत्र में संख्यात या असंख्यात ( परिमित )
प्रदेश संख्या राशि की पुष्टि करने के लिये ही ये तर्क प्रस्तुत किये गये हैं ।
आगे, एरिस्टाटिल के शब्दों में जीनो के अंतिम दो तर्क ये हैं--
( ३ ) बाण ( The Arrow ) :– “यदि, ज़ीनों का कथन है, प्रत्येक वस्तु या तो स्थिर है
या गति क्रिया में परिणत है ( गमन में है ) जब कि वह ( स्वतः ) के समान आकाश को व्याप्त
करती है, जब कि वह गतिवान् वस्तु उसी क्षण ( in the now ) में सदा है, तो गतिवान् बाण स्थिर
है ( गतिवान् नहीं है )।”†
( ४ ) क्रीड़ांगन ( The Stadium ) :– “चौथा तर्क समान वस्तुओं की समान संख्या वाली
दो पंक्तियों के सम्बन्ध में है जो किसी दौड़क्षेत्र में समान प्रवेग से विरुद्ध दिशाओं में एक दूसरे का
अतिक्रमण करती हैं, एक पंक्ति क्षेत्र के अंत से तथा दूसरी मध्य से प्रस्थान करती हैं । यह, वह सोचता
है, इस उपसंहार पर पहुँचाती है कि दत्त समय का अर्द्ध भाग, द्विगुणित के तुल्य होता है······”‡
वीरसेनाचार्य ने व्यवहारकाल की अंत्य महत्ता को, अविभागी समय में परमाणु की गमनशीलता
के आधार पर प्रस्तुत किया है,
“एक परमाणु का दूसरे परमाणु के व्यतिक्रम करने में जितना काल लगता है, उसे समय कहते
हैं । चौदह राजु आकाश प्रदेशों के अतिक्रमण मात्र काल से जो अतिक्रमण करने में समर्थ परमाणु है,
उसके एक परमाणु अतिक्रमण करने के काल का नाम समय है ।”()
इस प्रकार लोकान्त से लोकाग्र तक प्रत्येक बिन्दु पर से जाने वाले परमाणु के गुजरने की घटना,
प्रत्येक प्रदेश पर स्थित घड़ी, तथा गमनशील परमाणु में स्थित ऐसी ही घड़ी (?), वहीं “एक अविभाज्य
समय, तत्क्षण,” बतलावेगी जिस ‘एक समय’ में वह पुद्गल परमाणु, गमनरूप क्रिया में परिणत हुआ,
लोकाग्र पर जाकर, स्थिर पर्याय को प्राप्त होता है । इस प्रकार प्रत्येक प्रदेश से गुजरने की एक समय
कालीन घटना में युगपतत्व का समावेश है । व्यवहार से, काल के अनन्त समय, वर्तमान काल को एक
समय मानकर बतलाए गये हैं । निश्चय नय से अमूर्त, अप्रदेशी काल द्रव्य वर्तना का कारण होने से,
तथा प्रति समय अनन्त वर्तनाएँ होने से, मुख्य कालाणु अनन्त समय वाला भी माना गया है ।[] काल
की अंत्य प्रमाण छोटी पर्याय से घिरे हुए काल को समय बतलाया गया है ।
ऐसे अविभागी [ क्योंकि कोई पर्याय के बदलने में सृष्टि में होने वाली ‘पर्यायांतरी क्रिया में’,
- Ibid. p. 278.
† Ibid. p. 276.
‡ Ibid. p. 276.
- () षट् खंडागम पु० ४, पृ० ३१८ ।
[] तत्त्वार्थराजवार्तिक, अध्याय ५, पृ० ४३४ ( पन्नालाल, वाकलीवाल )
एक समय से कम काल नहीं लगता ] समय में उर्ध्वगमनत्व स्वभाववाला सिद्धात्मा, मध्य लोक
से लोकाग्र स्थित सिद्ध शिला पर पहुँच जाता है । इसी प्रकार एक ही समय में ईर्यापथ आस्रव
में कर्मों का आना, आत्मा से स्पर्श करना और निर्जरित हो जाना; तथा चार समय से पहिले
मरणान्तिक समुद्घात में आत्मा के प्रदेशों का अनुश्रेणि विग्रह गति से लोक में स्थित किसी भी प्रदेश स्थित
जन्म स्थान का स्पर्श करना और चार समय में दंड, कपाट, प्रतर एवं लोकपूरण क्रिया का होना, ये
सब क्रियाएँ, अथवा पर्यायों में अंतर आदि का एक समयवर्ती होने का ज्ञान ज़ीनो के उक्त असद्भासों
का विषय बन जाता है; कि क्या इन पर्यायों अथवा क्रियाओं से भी कोई सूक्ष्मतर पर्यायें नहीं होती हैं,
जो ज्ञान में आ सकें, क्योंकि वे एक समय के अवक्तव्यम् भाग (!) में घटित होती हैं! क्रिया की परिभाषा
श्री अकलंक देव द्वारा निम्न रूप में प्रस्तुत है, "उभय निमित्तापेक्षः पर्याय विशेषो द्रव्यस्य देशांतर प्राप्ति
हेतुः क्रिया ॥"*
ऐसा समझा जाता है कि उपरोक्त तर्क संतत महत्ताओ की अविभाज्य तत्वों द्वारा संरचना की
कल्पना के विरुद्ध हैं।, परन्तु ऐसा प्रतीत होता है मानो तृतीय असद्भास अविभागी समय के खंडन के
लिए नहीं है, वरन् उस एक समय में "१४ राजु जो देशान्तर प्राप्ति है, वह केवल स्थिरता अथवा
गतिवान् रूपादि अनेक अलग-अलग वर्तनाएँ रूप नहीं है, वरन् उन वर्तनाओं का एक समय में एक
पर्याय परिवर्तन रूप होना है", इस प्रकार के होने वाले पर्याय परिवर्तन की सम्भाव्यता की पुष्टि के
लिए है । कारण यह है कि गतिवान् बाण की एक समय में स्थिरता और गमन रूप होना स्वाभाविक
प्रतीत होता है, और एक-एक प्रदेश पर गुजरते हुए उसका गमन रूप रहते हुए स्थिर कहना न्याय
संगत नहीं है; वरन् उस एक समय में सहसा ७-१४ राजु प्रमाण प्रदेश राशि का‡ शीघ्र बाण के समान
अतिक्रमण करते हुए लोकाग्र पर जाकर स्थिरता पर्याय का ग्रहण करना अस्वाभाविक इसलिये प्रतीत हो
कि समय अविभाज्य है, पर इस वर्तमान काल रूप एक समय में ऐसा होता है—"नहीं तो वह बाण
चलता ही नहीं", तर्क से अवस्थित ( established ) आभासित होता है ।
चतुर्थ तर्क सम्भवतः उक्त समय ( now ) के आधार पर उपस्थित हुआ प्रतीत होता है ।
हमारी समझ में यहाँ यह प्रश्न उठाया गया है कि एक परमाणु का दूसरे परमाणु का व्यतिक्रमण करते
समय, अथवा १४ राजु में स्थित प्रदेशों का अतिक्रमण करते समय, उस एक समय में प्रदेश की
सीमा का उल्लंघन करते समय, अथवा एक साथ असंख्यात प्रदेशों का उल्लंघन करते समय,
उक्त समय के विभाजित हो जाने की कल्पना न्यायसंगत है, अथवा नहीं ? ऐसा प्रतीत होता है,
मानो ज़ीनो ने 'एक समय' की अविभाज्यता की कल्पना को न्यायसंगत बतलाने के लिए यह असद्भास
उल्लिखित किया हो कि क्या कोई समय का अर्द्धमान उसके द्विगुणित प्रमाण के तुल्य होता है ?
जो कुछ हो, वर्द्धमान महावीर के तीर्थ में परम्परागत अनुगमों में प्रचुर मात्रा में प्रयुक्त ये
तथ्य हमें विश्वबंधुत्व के प्राङ्गण में हुए सम्भावित आदान-प्रदान की झलकें प्रस्तुत करते प्रतीत होत हैं ।
हम अभी यह भी नहीं कह सकते कि यूनानियों द्वारा शंकु के छेद ( काट ) से प्राप्त विभिन्न छदों
( sections ) के गहन अध्ययन की प्रेरणा सूर्य, चंद्रादि के सुमेरु के परितः समापन, असमापन
- देखिये वही, पृ० ८४, अ० ५, सूत्र ७।१
† T. Heath Greek History of Mathematics, Vol. ( 1 ), p. 278 ( 1921 )
‡ तत्वार्थ राजवार्तिक, अ० ५, सू० २४।२६
30 गणितसारसंग्रह
सर्पिलों ( spirals ) में परिभ्रमण को आँख पर आपतित तिर्यक् शंकु रूप में परिलक्षित ( प्रेक्षित ) करने
के फलस्वरूप प्राप्त हुई हो। इतना अवश्य है तिलोय पण्णत्ती जैसे ग्रंथ में ग्रहों के गमन का विवरण कालवश
विनष्ट होना ही बतलाया है, परन्तु अपोलोनियस ( Apollonius, circa 262–190 B. C. )
और टालेमी की कृतियों से संकलन का प्रयास नहीं किया गया है ।
अब हम देखेंगे कि क्या गणित इतिहास की श्रृंखला की भग्न कड़ियों में से वर्द्धमान महावीर के
तीर्थ में प्रतिपादित अलौकिक गणित का विकास भी एक कड़ी है । भग्नकड़ियों के विषय में उल्लिखित
वाएर्डेन की अभ्युक्ति यह है :
“We have no real proofs for the existence of such an uninter-
rupted tradition; too many connecting links are missing for this.
It is rather a general impression of relatedness which makes itself
felt when one knows the cuneiform texts and then looks through
Heron or Diophantus, or the Chinese “classic of the maritime isle”,
or the Aryabhayṭa* of Aryabhaṭa or the Algebra of Alkhwarizmi.
According to all Arabic sources, Alkhwarizmi was the first writer
on algebra, but his algebra is so mature that we cannot assume that
he discovered everything himself. The algebra of Alkhwarizmi can
hardly be accounted for on the basis of the Greek and Indian
sources which we know; one gets more and more the impression
that he has drawn on older sources which in some way or other are
connected with Babylonian algebra.” †
बेबिलन से चीन तक अन्य सामग्री पहुँचने अथवा बेबिलन और चीन के प्रयुक्त अनुपात सिद्धान्त
से सहसम्बन्धित भग्न कड़ी का अनुरेखण करने में भी इतिहासज्ञों ने अपनी असमर्थता प्रकट की है :
“The oldest Chinese collection of problems on applied pro-
portions¹ looks like an ancient Babylonian text, but it is next to
impossible to prove their dependence or to trace the road along
which they were transmitted.”‡
इसमें सन्देह नहीं है कि चीनियों ने हजारों वर्षों से ज्ञान का आदान प्रदान करते हुए भी अपने
लक्षण (character) और मौलिकता (originality) को अक्षुण्ण रखा है। हम यहाँ केवल थोड़े से
उद्धरणों द्वारा वर्द्धमान महावीर के तीर्थ से सहसम्बन्धित सत्य, अहिंसा और गणित के प्रांगण में चीन और
भारत के समान्तर रूप से विकसित तथ्यों पर प्रकाश डालना चाहते हैं। ईस्वी पश्चात् ६५ के लगभग
चीन में सर्वप्रथम बौद्ध धर्म प्रकट होता प्रतीत होता है। हम इसके कुछ शताब्दियों पूर्व उमड़ी विश्व-
बन्धुत्व की लहरों से प्रभावित क्षेत्र, काल, भाव का अवलोकन करना उपयोगी समझते हैं :
⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯⎯
- शुद्ध रूप “Arybhatiya” है ।
† Science Awakening, p. 280.
‡ Ibid. p. 278.
प्रस्तावना 31
( १ ) एक ओर जहाँ यूनान में पौधों में जीव का अस्तित्व माना गया है, वहाँ चीन में भी इससे
सम्बन्धित सिद्धान्त पर जोज़ेफ़ नीडेम द्वारा प्रकाश डाल गया है :
"Another case which seems to me comparable is the Aristotelian
doctrine of the 'ladder of souls' in which plants were regarded
as possessing a vegetative soul, animals a vegetative and a sensitive
soul, and man a vegetative, a sensitive and a rational soulᶜ. I shall
later show (sect. 9 e) that a very similar doctrine was taught by
Hsun Tzu (Hsun Chhing).² Aristotle lived from —384 to —322,
Hsün Chhing from — 298 to —238."*
उपर्युक्त का सम्बन्ध प्राकृत ग्रंथों में वर्णित जीवों के गुणस्थान और मार्गणास्थानों से अनुरेखित
करना उपयोगी प्रतीत होता है । इस ओर आकृष्ट करने वाले तथ्य निम्नलिखित हैं :—
"In the realm of philosophical theory and practice, determined
efforts have been made to show that early Taoism owed much both
to the Indian Upanishad literature for its theoryᵃ, and to Indian
yogism for some of its practices;ᵇ further, that Chinese Chhan
Buddhism was an importation from Indiaᶜ. These views, however,
as Creel says,ᵈ have never been really convincing. The Upanishadsᵉ
are metaphysical commentaries on the Vedas, and date from the
—8th to the —4th centuries,ᶠ so that they are little earlier than the
first period of elaboration of Taoist doctrine. Their strongly marked
metaphysical idealism, with its conception of the unity of the
brahman and the atman, the absolute and the self, is not at all
characteristic of the Taoists; though the latter, as we shall see,
greatly emphasised the unity of nature, and the incorporation of the
individual within it. For the influence of Yoga practices,ᵍ especially
the breathing exercises, which are certainly very ancient in India,
upon early Taoism, a better case can be made out (Filliozat, 3).
Some Taoist schools, at any rate, practised self-hypnosis by
concentration on the inhaling and exhaling processes (Waleyʰ),
butit was not universal as Chuang Tzu has a passage condemning
it. In any case the aims of this samādhi or dhyāna among the Taoists
were entirely different from those of the Indian rishis. Both wished
to master organic life and to attain 'supernatural' powers, but while
- J. Needham, Science and Civilization in China, p. 155, vol. I,
Cambridge (1954).
32 गणितसारसंग्रह
the Indians sought for an ascetic virtue which would enable them
to dominate the gods themselves (cf. Wilkinsⁱ), the Taoists sought
a material immortality in a universe in which there were no gods
to overcome, and asceticism was only one of the methods which
they were prepared to use to attain their end.’’*
उपर्युक्त तुलना में हम शुभचंद्राचार्य के 'ज्ञानार्णव' की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करेंगे,
जहाँ आत्मा के व्यक्तित्व के चरम विकास के लिये (अंततः मुक्ति के लिए) प्राणायाम को विघ्न का कारण
निरूपित किया है—
सम्यक् समाधि सिद्ध्यर्थे प्रत्याहारः प्रशस्यते ।
प्राणायामेन विक्षिप्तं मनः स्वास्थ्यं न विन्दति ॥ ४ ॥
वायोः संचार चातुर्यं मणि मातङ्ग साधनम् ।
प्रायः प्रत्यूह बीजं स्यान्मुनेर्मुक्तिमभीप्सतः ॥ ६ ॥
प्राणस्यायमने पीडा तस्यां स्यादार्त्त सम्भवः ।
तेन प्रच्याव्यते नूनं ज्ञात तत्वोऽपि लक्ष्यतः ॥ ९ ॥
नातिरिक्तं फलं सूत्रे प्राणायामात्प्रकीर्तितम् ।
अतस्तदर्थ मस्माभिर्नातिरिक्तः कृतः श्रमः ॥११॥
( प्रकरण संख्या ३० )
साथ ही वर्द्धमान महावीर के तीर्थ में सिद्ध पद प्राप्त करने हेतु सम्यक् तप को जो प्रधानता
दी गई थी वह परम्परा से प्रचलित प्रतिक्रमण में इस प्रकार दृष्टिगत होती है ।
“तवसिद्धे णयसिद्धे संजमसिद्धे चरित्तसिद्धे य ।
णाणम्मि दंसणम्मि य सिद्धे सिरसा णमंसामि ॥”
( २ ) चीन और भारत के बीच सम्बन्ध जोड़ने वाला एक तथ्य और है, “परिमित क्षेत्र की
अनन्त विभाज्यता का खंडन ।” इसके साथ ही सम्बन्धित युगपतत्व ( simultaneity ) और
परमाणु सम्बन्धी तथ्य हैं जिनके लिये वर्द्धमान महावीर के तीर्थ में संकलित सामग्री आदि का तुलनात्मक
अध्ययन कितना उपयोगी होगा यह निम्नलिखित उद्धरण से स्पष्ट हो जावेगा,
“Finally, he discusses the relation between the paradoxes of
Hui Shih² and the Eleatic paradoxes,ᵈ without attaining any definite
conclusion – the correspondence is, indeed, another example of that
extraordinary simultaneity between phenomena which we some-times
find at the two ends of the Old World. For the date of Hui
Shih² is late –5th century, and Eleatic Zeno's floruit is placed
about –460.’’†
- Ibid. p. 153.
† Ibid. p. 154.
प्रस्तावना 33
आगे,
“One might take the theories of atomism as an example. Its
story in our own classical civilization, beginning with such men as
Leucippus and Democritus of Abdera, of the -5th century, and
culminating in Epicurus and Lucretius of the late -3rd and early
-1st, is well known to us.ʰ Indian atomism seems to be later in date,
the Jaina System of Umāsvāti showing its greatest strength about
- 50, and the Vaiśeshika darśana (theory) of Kaṇāda flourishing
in the second half of the + 2nd Centuryⁱ. But there are reasons, as
Reyʲ urges, for believing that the roots of the theory of paramānu
(atoms) go much further back in the history of Indian thought.
Thirdly, in Chinese physics atomism never arose, as we shall seeᵃ,
but the geometry of the Mo Ching¹ (the Mohist Canon, which must
have been put together somewhere in the neighbourhood of - 370)
seems to define a point as a line which has been cut so short that it
cannot be cut any furtherᵇ.”*
(३) आगे यह जानते हुए कि चीन और भारत में बौद्ध धर्म सम्बन्धी आदान प्रदान
का प्रारम्भ ईसा की चौथी सदी से हुआ, हम इससे पूर्व का एक ऐसा उल्लेख भी पाते हैं जो सम्भवतः
भारत से सम्बन्धित हो,
“The Huai Nan Tzu book (c. - 200) containsᶜ a remark that
Yü the Great ‘when he went to the country of the Nacked People,
left his clothes before entering it and put them on when he came
out, thus showing that wisdom adapts itself to circumstances.’”‡
(४) इसमें सन्देह नहीं कि चीनी गणित का प्रत्यक्ष सम्बन्ध भारतीय गणित के साथ दिखाई
देता है, पर यह काल वर्द्धमान महावीर के शताब्दियों पश्चात् का है :
“The proof of the Pythagoras Theorem used by Chao
Chün-Chhing² in his + 2nd-century commentary on the Chou Pei³
(the oldest mathematical classic) appears again in the work of Bhāskar
(+ 1150). The rule for the area of the segment of a circle given in
the Chiu Chang Suan Shu⁴ (Nine Chapters on the Mathematical Art)
of the + 1st-century appears again in the + 9th-century work of
Mahāvīra. Indeterminate problems of the Sun Tzu Suan Ching⁵
(Master Sun’s Mathematical Manual) of the + 3rd century are found
in Brahmagupta (+ 7th century). Āryabhaṭa (+ 5th century) has
- Ibid. p. 155.
‡ Ibid. p. 206.
34 गणितसारसंग्रह
geometrical survey material very like that of Liu Hui of the
- 3rd .'*
जहाँ तैत्तिरीय संहिता में केवल २७ नक्षत्रों को मान्यता दी है, वहाँ चीन में २८ नक्षत्र माने गये
हैं। तिलोय पण्णत्ती में भी १ चंद्र के २८ नक्षत्र माने गये हैं (७-४६५), तथा चंद्र के कारणभूत
शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में पातालों के पवन का बढ़ना और घटना बतलाया गया है (४-२४०३)। यहाँ
इस तथ्य से समानता रखता हुआ यूनान और चीन से सम्बन्धित उल्लेख ध्यान देने योग्य है। जहाँ ईसा
पूर्व सातवीं सदी के चीनी ताओ सिद्धान्त के ग्रन्थ कुआन त्जु ( Kuan Tzu ) में चंद्रमा के शुक्ल और
कृष्ण पक्ष में समुद्री जीवों का बढ़ना और घटना बतलाया है, वहाँ यूनान में एरिस्टाटिल ( Aristotle )
ने भी यही उल्लिखित किया है।† गणित सम्बन्धी अन्य तुलनाएं तिलोय पण्णत्ती के गणित तथा टोडरमल
की गोम्मटसार टीका आदि से की जा सकती हैं। इस सम्बन्ध में उल्लिखित ग्रन्थ के अन्य भाग ( १-७ )
भी द्रष्टव्य हैं।‡ यहाँ इतना कहना आवश्यक है कि वर्द्धमान महावीर के तीर्थ में अनन्तात्मक राशियों
का अल्पबहुत्व अन्यत्र कहीं देखने में नहीं आया है। दर्शन में गणित के प्रयुक्त करने की अनुपम प्रणाली
“अल्प बहुत्व” में परिलक्षित होती है। केशववर्णी की गोम्मटसार टीका में इस तथा अन्य विषयक
प्ररूपणा में प्रयुक्त प्रतीकों में शून्य, धन और ऋणादि के लिये एक से अधिक चिह्न उपयोग में लाये
गये हैं, जो ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं।
उपर्युक्त अवलोकन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि पिथोगोरस कालीन अखिल विश्व में जो
गणित युक्त दर्शन का पुनर्जागरण हुआ, उसके इतिहास की भग्न श्रृंखला की एक कड़ी वर्द्धमान महावीर
का तीर्थ कालीन लोकोत्तर गणित ( अर्थेमितिकी ) भी है।
- Ibid. p. 213.
† Ibid. p. 150.
‡ चीनी π के मान ३, √१०, ३५५/११३ तथा दाशमिक पद्धति सहित शलाका गणन
द्रष्टव्य हैं।
कृतज्ञता प्रकाशन
प्रस्तुत ग्रंथ के हिंदी अनुवाद की प्रेरणा मुझे डा० हीरालाल जैन ने प्रायः ग्यारह वर्ष पूर्व नागपुर
में दी थी । इस सम्बन्ध में समय समय पर दिये गये उनके सुझावों के लिए मैं उनका आभारी हूँ । संस्कृत
के विद्यार्थी होने का सौभाग्य मुझे प्राप्त नहीं हुआ, इसलिये प्रस्तुत अनुवाद मुख्यतः प्रोफेसर एम. रंगाचार्य
के सटीक आङ्गल भाषानुवाद पर आधारित है । इस अनुवाद में शासन द्वारा प्रकाशित पारिभाषिक
शब्दावलि का उपयोग किया गया है । संस्कृत के प्रूफ देखने का श्रेय डा. ए. एन. उपाध्ये को है ।
इस कार्य में प्रयुक्त कतिपय ग्रंथों की पूर्ति पूज्य श्री १०५ क्षु० मनोहरलाल जी वर्णी "सहजानन्द"
ने की, जिसके लिये मैं उनका चिर कृतज्ञ हूँ ।
महाकौशल महाविद्यालय (राबर्टसन कालिज), जबलपुर के भूतपूर्व प्राचार्य स्वर्गीय श्री उमादास
मुखर्जी का मैं आभारी हूँ, जिन्होंने मुझे अपनी सहज दया का पात्र बनाकर प्रस्तुत अनुवाद के कार्य
को भली भाँति सम्पन्न करने हेतु संरक्षण प्रदान किया । इसी महाविद्यालय के गणित विभाग के भूतपूर्व
अध्यक्ष प्रोफेसर श्री सी. एस. राघवन द्वारा प्रदत्त सुविधाओं.के लिये भी मैं उनका आभारी हूँ ।
मैं श्री वी. एस. पंडित, एडवोकेट, जबलपुर, तथा श्री प्रबोधचंद्र जैन, एडवोकेट, छिंदवाड़ा का
आभारी हूँ जिनकी अप्रत्यक्ष सहायता के बिना यह कार्य न हो सका होता । अप्रकट रूप से सहायक
विद्यार्थी वर्ग भी धन्यवाद का पात्र है ।
अंत में, मैं उन ग्रंथकारों के प्रति कृतज्ञ हूँ, जिनके ग्रंथों की सहायता लेकर यह कार्य निष्पन्न
हुआ है ।
३० जनवरी, १९६३
गवर्नमेंट साइंस कालिज, { लक्ष्मीचंद्र जैन
जबलपुर ।
ॐ
महावीराचार्यप्रणीतः
गणितसारसंग्रहः
१. संज्ञाधिकारः
मङ्गलाचरणम्
अलङ्घ्यं त्रिजगत्सारं यस्यानन्तचतुष्टयम् । नमस्तस्मै जिनेन्द्राय महावीराय तायिने ॥ १ ॥
संख्याज्ञानप्रदीपेन जैनेन्द्रेण महौ१त्विषा । प्रकाशितं जगत्सर्वं येन तं प्रणमाम्यहम् ॥ २ ॥
२प्रीणितः प्राणिसस्यौघो३ निरीतिर्निरवग्रहः । श्रीमतामोघवर्षेण येन स्वेष्टहितैषिणा ॥ ३ ॥
पापरूपाः परा यस्य चित्तवृत्तिहविर्भुजि । भस्मसाद्४भावमीयुस्तेऽवन्ध्यकोपोऽभवै५त्ततः ॥ ४ ॥
वशीकुर्वन् जगत्सर्वं स्वयं नानुवशः परैः । नाभिभूतः प्रभुरतस्मादपूर्वमकरध्वजः ॥ ५ ॥
६यो विक्रमक्रमाक्रान्तचं७क्रिचक्रंकृतक्रियः । चक्रिकाभञ्जनो नाम्ना चक्रिकाभञ्जनोऽ८ञ्जसा ॥ ६ ॥
१ MB मह्° । २ M प्रणीतः । ३ M सर्गौ° । ४ MK सद्धां । ५ KPB भवेत् । ६ B योऽयं ।
७ M क्री° । ८ MB ज्ञ° ।
१. संज्ञा ( पारिभाषिक शब्द ) अधिकार
मङ्गलाचरण
जिन्होंने तीनों लोकों में सारभूत एवं मिथ्या दृष्टियों द्वारा अलंघ्य अनन्त दर्शन, अनन्त ज्ञान,
अनन्त वीर्य और अनन्त सुख नामक अनन्त चतुष्टय को प्राप्त किया, ऐसे रक्षक जिनेन्द्र भगवान् महावीर
को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥ मैं महान् विभूति को प्राप्त जिनेन्द्र को नमन करता हूँ जिन्होंने संख्या-
ज्ञान के प्रदीप से समस्त विश्व को प्रकाशवान किया है ॥ २ ॥ धन्य हैं वे अमोघवर्ष (अर्थात् वे जो
वास्तव में उपयोगी वृष्टि की वर्षा करते हैं, ) जो हमेशा अपने प्रियपात्रों के हितचिन्तन में रहते हैं और
जिनके द्वारा प्राणी तथा वनस्पति, महामारी और दुर्भिक्ष आदि से मुक्त होकर सुखी हुए हैं ॥ ३ ॥
जिन ( अमोघवर्ष ) के चित्त की क्रियायें अग्निपुंज सदृश होकर समस्त पापरूपी वैरियों को भस्म में
परिणत करने में सफल हैं, और जिनका क्रोध व्यर्थ नहीं जाता ॥ ४ ॥ जिन्होंने समस्त संसार को अपने
वश में कर लिया है और जो किसी के वश में न रहकर शत्रुओं द्वारा पराजित नहीं हो सके हैं, अपूर्व
मकरध्वज की तरह शोभायमान हैं ॥ ५ ॥ जिनका कार्य, अपने पराक्रम द्वारा पराभूत राजाओं के चक्र
( समूह ) द्वारा होता है, और जो न केवल नाम से चक्रिका भंजन हैं वरन् वास्तव में भी चक्रिका
भंजन ( अर्थात् जन्म और मरण के चक्र के नाशक १ ) हैं ॥ ६ ॥ जो अनेक ज्ञान सरिताओं के अधिष्ठाता
१ भविष्य की अपेक्षा से ।
२ ] गणितसारसंग्रहः [ १. ७-
यो विद्यानद्यधिष्ठानो मर्यादावज्रवेदिकः । रत्नगर्भो यथाख्यातचारित्रजलधिर्महान् ॥ ७ ॥
विध्वस्तैकान्तपक्षस्य स्याद्वादन्यायवादिनः । देवस्य नृपतुङ्गस्य वर्धतां तस्य शासनम् ॥ ८ ॥
गणितशास्त्रप्रशंसा
लौकिके वैदिके वापि² तथा सामायिकेऽपि³ यः । व्यापारस्तत्र सर्वत्र संख्यानमुपयुज्यते ॥ ९ ॥
कामतन्त्रेऽर्थशास्त्रे च गान्धर्वे नाटकेऽपि वा । सूपशास्त्रे तथौ⁴ वैद्ये वास्तुविद्यादिवस्तुषु ॥१०॥
छन्दोऽलङ्कारकाव्येषु तर्कव्याकरणादिषु । कलागुणेषु सर्वेषु प्रस्तुतं गणितं परम् ॥११॥
सूर्यादिग्रहचारेषु ग्रहणे ग्रहसंयुतौ । त्रिप्रश्ने चन्द्रवृत्तौ च सर्वत्राङ्गीकृतं हि तत् ॥१२॥
द्वीपसागरशैलानां संख्याव्यासपरिक्षिपैः । भवनव्यन्तरज्योतिर्लोककल्पाधिवासिनाम् ॥१३॥
————————————————————————————————————————————————
१ P वेदिनः । २ M स्यात् ; B चापि । ३ B च । ४ KM महा⁰ । ५ MB दण्डा⁰ । ६ MB पुरा ।
७ MM⁰ क्षिपाः ।
होकर सच्चरित्रता की वज्रमयी मर्यादा वाले हैं और जो जैन-धर्म रूपी रत्न को हृदय में रखते हैं,
इसलिये वे यथाख्यात चारित्र के महान् सागर के समान सुप्रसिद्ध हुए हैं ॥ ७ ॥ एकान्त पक्ष को
नष्ट कर जो स्याद्वादरूपी न्यायशास्त्र के वादी हुए हैं ऐसे महाराज नृपतुंग का शासन फले-फूले ॥ ८ ॥
गणितशास्त्रप्रशंसा
सांसारिक, वैदिक तथा धार्मिक आदि सब कार्यों में गणित उपयोगी है ॥ ९ ॥ कामशास्त्र में,
अर्थशास्त्र में, संगीत व नाट्यशास्त्र में, पाकशास्त्र ( सूपशास्त्र ) में और इसी तरह औषधि-शास्त्र में तथा
वास्तु-विद्या ( निर्माण-कला ) में, छन्द, अलंकार, काव्य, तर्क, व्याकरण आदि इन सभी कलाओं में
गणना का विज्ञान श्रेष्ठ माना जाता है ॥१०-११॥ सूर्य तथा अन्य ग्रह-नक्षत्रों की गति के संबंध में
ग्रहण और ग्रह-संयुति ( संयोग ) के सम्बन्ध में, त्रिप्रश्न के विषय में और चन्द्रमा की गति के विषय
में—सर्वत्र इसे उपयोग में लाते हैं ॥१२॥ द्वीपों, समुद्रों और पर्वतों की संख्या, व्यास और परिमिति;
भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिर्लोकवासी, कल्पवासी देवों के तथा नारकी जीवों के श्रेणिबद्ध और इंद्रक
————————————————————————————————————————————————
(८) 'स्यात्' शब्द निपात है जो एकान्त का निराकरण करके अनेकान्त का प्रतिपादन करता है ।
यह शब्द 'कथंचित्' का पर्यायवाची है और एक निश्चित अपेक्षा को निरूपित करता है । इस प्रकार,
वैज्ञानिक एवं युक्तियुक्त स्याद्वाद जो जैन-दर्शन एवं तत्त्वज्ञान की नींव है, वस्तु के यथार्थ स्वरूप को
प्रकट करने के हेतु उसके अनन्त धर्मों में से एक समय में एक धर्म का प्रतिपादन करता है । प्रत्येक
धर्म का वर्णन उसके प्रतिपक्षी विरोधी धर्म की अपेक्षा से सप्तभंगी में किया जाता है । उदाहरणार्थ—
अस्तित्व एक धर्म है, और नास्तित्व उसका प्रतिपक्षी धर्म है । अपने प्रतिपक्षी सापेक्ष अस्तित्व धर्म की
अपेक्षा से सप्तभंगी इस प्रकार बनेगी—(१) घट कथंचित् है, (२) घट कथंचित् नहीं है, (३) घट
कथंचित् है और नहीं है, (४) घट कथंचित् अवक्तव्य है, (५) घट कथंचित् है और अवक्तव्य है,
(६) घट कथंचित् नहीं है और अवक्तव्य है, (७) घट कथंचित् है, नहीं है, और अवक्तव्य है ।
(१२) त्रिप्रश्न संस्कृत के ज्योतिर्लोक विज्ञान विषयक ग्रन्थों में वर्णित एक अध्याय का नाम
है जो तीन प्रश्नों के विषय में प्रतिपादन करने के कारण इस नाम से प्रसिद्ध है ।
ये प्रश्न ग्रहादि ज्योतिष बिम्बों के सम्बन्ध में दिक् ( दिशा ), दशा ( स्थिति ) एवं काल ( समय )
विषयक होते हैं ।
-१.२४ ] १. संज्ञाधिकारः [ ३
नारकाणां च सर्वेषां श्रेणीबन्धेन्द्रकोत्कराः । प्रकीर्णकप्रमाणाद्या बुध्यन्ते गणितेन ते ॥१४॥
प्राणिनां तत्र संस्थानमायुरष्टगुणादयः । यात्राद्याः संहिताद्याश्च सर्वे ते गणिताश्रयाः ॥१५॥
बहुभिर्विप्रलापैः किं त्रैलोक्ये सचराचरे । यत्किंचिद्वस्तु तत्सर्वं गणितेन विना न हि ॥१६॥
तीर्थकृद्भ्यः कृतार्थेभ्यः पूज्येभ्यो जगदीश्वरैः । तेषां शिष्यप्रशिष्येभ्यः प्रसिद्धाद्गुरुपर्वतः ॥१७॥
जलधेरिव रत्नानि पाषाणादिव काञ्चनम् । शुक्तेर्मुक्ताफलानीव संख्याज्ञानमहोदधेः ॥१८॥
किंचिदुद्धृत्य तत्सारं वक्ष्येऽहं मतिशक्तितः । अल्पं ग्रन्थमनेकार्थं गणितं सारसंग्रहम् ॥१९॥
संज्ञाम्भोभिरथो पूर्णे परिकर्मोर्व्वेदिके । कलासवर्णसंरूढलुठत्पाठीनसंकुले ॥२०॥
प्रकीर्णकमहाग्राहे त्रैराशिकतरङ्गिणि । मिश्रकव्यवहारोद्यत्सूक्तिरत्नांशुपिञ्जरे ॥२१॥
क्षेत्रविस्तीर्णपाताले खाताख्यसिकताकुले । करणस्कन्धसंबन्धच्छायावेलाविराजिते ॥२२॥
गुणकैर्गुणसंपूर्णैस्तदर्थमणयोऽमलाः । गृह्यन्ते करणोपायैः सारसंग्रहवारिधौ ॥२३॥
अथ संज्ञा
न शक्यतेऽर्थो बोद्धुं यत्सर्वस्मिन् संज्ञया विना । आदावतोऽस्य शास्त्रस्य परिभाषाभिधास्यते ॥२४॥
१ KMB बद्धे° । २ M वसु । ३ KP ज्ञान के स्थान में नव । ४ MB अल्प° । ५ K संज्ञायतोयसमा° ।
६ M द्व ( सम्भवतः त्य को लिखने में भूल हुई है । ) ७ MB संकटे । ८ P द्य ।
( श्रेणिरहित ) निवास-स्थानों के माप और अन्य सब प्रकार के विभिन्न माप—सभी गणित के द्वारा
जाने जाते हैं ॥१३-१४॥ उन स्थानों में रहने वाले जीवों के संस्थान, आयु, उनके आठ गुण आदि,
उनकी गति ( यात्रा ) आदि, उनका साथ रहना आदि, इन सबका आधार गणित है ॥१५॥ और व्यर्थ के
प्रलापों से क्या लाभ है ? जो कुछ इन तीनों लोकों में चराचर ( गतिशील और स्थिर ) वस्तुएँ हैं उनका
अस्तित्व गणित से विलग नहीं ॥१६॥ मैं, तीर्थ को उत्पन्न करने वाले, कृतार्थ और जगदीश्वरों से पूजित
( तीर्थङ्करों ) की शिष्य प्रशिष्यात्मक प्रसिद्ध गुरु परम्परा से आये हुए संख्याज्ञान महासागर से उसका
कुछ सार एकत्रित कर, उसी तरह, जैसे कि समुद्र से रत्न, पाषाणमय चट्टान से स्वर्ण और शुक्ति
( oyster shell ) से मुक्ताफल प्राप्त करते हैं, अल्प होते हुए भी अनल्प अर्थ को धारण करने वाले
सारसंग्रह नामक गणित ग्रंथ को अपनी बुद्धि की शक्ति के अनुसार प्रकाशित करता हूँ ॥१७-१८-१९॥
तदनुसार, इस सारसंग्रह के सागर से, जो पारिभाषिक शब्दावलि रूपी जल से परिपूर्ण है और
जिसकी आठ गणित की क्रियायें किनारे रूप हैं; पुनः जो भिन्न की क्रियाओं रूपी निर्भय गतिशील
मछलियों से युक्त है और विविध प्रश्नों के अध्यायरूपी महाग्राह ( मगर ) से व्याप्त है; पुनः जो त्रैराशिक
की अध्यायरूपी लहरों से आंदोलित है और मिश्र प्रश्नों के अध्याय-सम्बन्धी उत्कृष्ट भाषारूपी मोतियों
की आभा से रंजित है, और पुनः जो क्षेत्रफल-सम्बन्धी प्रश्नों के अध्याय द्वारा पाताल तक विस्तृत है
तथा घनफल के अध्याय रूपी रेत से पूर्ण है; और जो ज्योतिलोंकीय व्यावहारिक गणना से सम्बन्धित
छाया-सम्बन्धी अध्याय रूपी बढ़ते हुए ज्वार से चमकता है—( ऐसे ज्ञानसागर से ) सम्पूर्ण गुण सम्पन्न
गणितज्ञ गणित की सहायता से अपनी इच्छानुसार निर्मल मोती प्राप्त कर सकेंगे ॥२०-२३॥ इस विज्ञान
के आरम्भ में आवश्यक पारिभाषिक शब्दावलि दी जाती है क्योंकि बिना शुद्ध परिभाषाओं के विषय
तक पहुँच सम्भव नहीं है ॥२४॥
४ ] गणितसारसंग्रहः [ १. २५-
तत्र तावत् क्षेत्रपरिभाषा
जलानलादिभिर्नाशं यो न याति स पुद्गलः । परमाणुरनन्तैस्तैरणुः सोऽत्रादिरुच्यते ॥२५॥
त्रसरेणुरतस्तस्माद्रथरेणुः शिरोरुहः । परंमध्यजघन्याख्यौ भोगभूकर्मभूसुवाम् ॥२६॥
लीक्षा तिलस्स एवेह सर्षपोऽथ यवोऽङ्गुलम् । क्रमेणाष्टगुणान्येतद्व्यवहाराङ्गुलं मतम् ॥२७॥
तत्पञ्चकशतं प्रोक्तं प्रमाणं मानवेदिभिः । वर्तमाननराणामङ्गुलमात्माङ्गुलं भवेत् ॥२८॥
व्यवहारप्रमाणे द्वे^५ राद्धान्ते लौकिके विदुः । आत्माङ्गुलमिति त्रेधा तिर्यक्पादः षडङ्गुलैः ॥२९॥
पादद्वयं वितस्तिः स्यात्ततो हस्तो द्विसङ्गुणः । दण्डो हस्तचतुष्केण क्रोशस्तद्द्विसहस्रकम् ॥३०॥
योजनं चतुरः क्रोशान्प्राहुः क्षेत्रविचक्षणाः । वक्ष्यतेऽतः परं कालपरिभाषा यथाक्रमम् ॥३१॥
अथ कालपरिभाषा
अणुरण्वन्तरं काले व्यतिक्रामति यावति । स कालः समयोऽसंख्येः समयैरावलिर्भवेत् ॥३२॥
१ KP णु । २ MB वो । ३ PB ख्य । ४ P ध्रि । ५ M ऽन्ये ।
क्षेत्र परिभाषा [ क्षेत्रमाप सम्बन्धी पारिभाषिक शब्दावलि ]
पुद्गल का अनन्तवाँ सूक्ष्म वह भाग जो न तो पानी द्वारा, न अग्नि द्वारा और न अन्य किन्हीं
ऐसी वस्तुओं द्वारा नाशको प्राप्त है, परमाणु कहलाता है । ऐसे अनन्त परमाणुओं द्वारा उत्पन्न एक-एक
अणु क्षेत्रमाप में प्रथम माप है । इससे उत्पन्न क्रमशः आठ-आठ गुणे त्रसरेणु, रथरेणु, बालमाप, जूं
माप, तिल या सरसों माप, यव माप तथा अंगुल माप हैं । अंगुल माप आदि उनके लिये हैं जो भोग-
भूमि और कर्मभूमि में उत्पन्न होते हैं । ये उत्कृष्ट, मध्यम, जघन्य प्रकार के होते हैं । यह अंगुल
व्यवहारांगुल भी कहलाता है ॥२५-२७॥ जो माप की विधियों से परिचित हैं, कथन करते हैं कि इस
व्यवहार-अंगुल का ५०० गुणा प्रमाणांगुल होता है । वर्तमान काल के मनुष्यों की अंगुली का माप
आत्मांगुल कहा जाता है ॥२८॥ वे कहते हैं कि संसार के स्थापित व्यवहारों में अंगुल तीन प्रकार का
होता है, प्रथम व्यवहारांगुल, द्वितीय प्रमाणांगुल और तृतीय उनका आत्मांगुल । छः अंगुल मिलकर
पाद-माप बनता है जो आरपार रूप से नापा जाता है ॥२९॥ दो ऐसे पाद मिलकर वितस्ति बनाते हैं
और दो वितस्ति मिल कर एक हस्त बनता है । चार हस्त से एक दण्ड बनता है और दो हजार दंड
मिलकर एक क्रोश बनता है ॥३०॥ जो क्षेत्रफल के मापज्ञान में सिद्धहस्त हैं, कहते हैं कि चार क्रोश
मिलकर एक योजन होता है ॥३१॥ इसके पश्चात्, मैं समय के माप के सम्बन्ध में क्रमवार पारिभाषिक
शब्दावलि का उल्लेख करता हूँ ।
काल-परिभाषा [ काल-सम्बन्धी पारिभाषिक शब्दावलि ]
वह काल जिसमें एक ( गतिशील ) अणु^१ किसी प्रदेशबिन्दु से दूसरे निकटतम प्रदेशबिन्दु तक
जाता है समय कहलाता है । असंख्य समय मिलकर एक आवलि बनती है ॥३२॥
( २५-२७ ) क्षेत्रमाप-सम्बन्धी पारिभाषिक शब्दावलि को स्पष्ट रूप से समझने के लिये परिशिष्ट
३ देखिये ।
अणु से आठ गुना त्रसरेणु, त्रसरेणु से आठगुना रथरेणु, रथरेणु से आठगुना बालमाप इत्यादि
जो माप वर्णित किये गये हैं । वे क्रमवार ऐसे हैं कि प्रत्येक पूर्वानुगामी माप से आठगुना है; तथा प्रत्येक
उत्कृष्ट, मध्यम और जघन्य प्रकार का है ।
१ यहाँ अणु का आशय परमाणु से है ।
-१, ४० ] १. संज्ञाधिकारः [ ५
संख्या तावलिरुच्छ्वासः स्तोकस्तूच्छ्वाससप्तकः । स्तोकाः सप्त लवस्तेषां सार्धाष्टात्रिंशता घटी ॥३३॥
घटीद्वयं मुहूर्तोऽत्र मुहूर्तेस्त्रिंशता दिनम् । पञ्चघ्नैस्त्रिभिर्दिनैः पक्षः पक्षौ द्वौ मास इष्यते ॥३४॥
ऋतुर्मासद्वयेन स्यात्त्रिभिस्तैरयनं मतम् । तद्द्वयं वत्सरो वक्ष्ये धान्यमानमतः परम् ॥३५॥
अथ धान्यपरिभाषा
विद्धि षोडशिकास्तत्र चतस्रः कुडहो भवेत् । कुडहाँश्चतुरः प्रस्थश्चतुः प्रस्थानथाढकम् ॥३६॥
चतुर्भिराढकैर्द्रोणो मानी द्रोणैश्चतुर्गुणैः । खारी मानी चतुष्केन खार्यः पञ्च प्रवर्तिकाः ॥३७॥
सेयं चतुर्गुणा वाहः कुम्भः पञ्च प्रवर्तिकाः । इतः परं सुवर्णस्य परिभाषा विभाव्यते ॥३८॥
अथ सुवर्णपरिभाषा
चतुर्भिर्गण्डकैर्गुञ्जा गुञ्जाः पञ्च पणोऽष्ट ते । धरणं धरणे कर्षः पलं कर्षचतुष्टयम् ॥३९॥
अथ रजतपरिभाषा
धान्यद्वयेन गुञ्जैका गुञ्जायुग्मेन माषकः । माषषोडशकेनात्र धरणं परिभाष्यते ॥४०॥
१ KB वो । २ K वां । ३ सम्पूर्ण धान्य परिभाषा के लिए, P और B में निम्नलिखित रूप
में विशेष उल्लेख है । M का पाठान्तर, कोष्ठकों में अंकित किया गया है । आद्य षोडशिका तत्र कुड
( डु ) बः प्रस्थ आढकः । द्रोणो मानी ततः खारी क्रमेण ( मशः ) चतुराहताः ॥ ( सहस्रैश्च त्रिभिष्षड्-
भिश्शतैश्च ब्रीहिभिरसमम् । यत्सम्पूर्णोऽभवत्सोयं कुडुबः परिभाष्यते ॥ ) प्रवर्तिकात्र ताः पञ्च वाहस्तस्या-
श्चतुर्गुणः । कुम्भस्सपादवाहस्स्यात् ( पञ्च प्रवर्तकाः कुम्भः ) स्वर्णसंज्ञाथ वर्ण्यते ॥
संख्यात आवलियों से उच्छ्वास बनता है, सात उच्छ्वासका एक स्तोक और सात स्तोक का
एक लव होता है तथा साढ़े अड़तीस लव मिलकर एक घटी बनती है ॥३३॥ दो घटी का एक मुहूर्त,
तीस मुहूर्त का एक दिन, पंद्रह दिन का एक पक्ष और दो पक्ष का एक मास होता है ॥३४॥
दो मास मिलकर एक ऋतु, तीन ऋतुयें मिलकर एक अयन और दो अयन मिलकर एक वर्ष बनता
है । इसके पश्चात् मैं धान्य के माप के विषय में उल्लेख करता हूँ ॥३५॥
धान्य-परिभाषा [ धान्यमाप सम्बन्धी पारिभाषिक शब्दावलि ]
चार षोडशिका मिलकर एक कुडहा बनता है, चार कुडहा मिलकर एक प्रस्थ बनता है और चार
प्रस्थ का एक आढक होता है ॥३६॥ चार आढक का द्रोण, चार द्रोण की एक मानी, चार मानी की
एक खारी और पाँच खारी की प्रवर्तिका होती है ॥३७॥ चार प्रवर्तिका का एक वाह और पाँच प्रवर्तिका
का एक कुम्भ होता है । इसके पश्चात् स्वर्णमाप-सम्बन्धी पारिभाषिक शब्दावलि दी जाती है ॥३८॥
सुवर्ण-परिभाषा [ स्वर्णमाप सम्बन्धी पारिभाषिक शब्दावलि ]
चार गंडक मिलकर एक गुंजा बनती है; पाँच गुंजा मिलकर एक पण बनता है और इसका
आठगुणा एक धरण होता है । दो धरण मिलकर एक कर्ष बनता है और चार कर्ष मिलकर एक पल
बनता है ॥३९॥
रजत-परिभाषा [ रजतमाप सम्बन्धी पारिभाषिक शब्दावलि ]
दो धान्य मिलकर एक गुंजा बनती है, दो गुंजा मिलकर एक माशा और सोलह माशा मिलकर
एक धरण बनता है ॥४०॥ ढाई धरण का एक कर्ष एवं चार पुराण ( या कर्ष ) का एक दल होता है ।