श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 361, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंबारहवाँ अध्याय ३४५
उद्धव उवाच
संशयः शृण्वतो वाचं तव योगेश्वरेश्वर।
न निवर्तत आत्मस्थो येन भ्राम्यति मे मनः ॥ १६ ॥
हे कृष्ण ! तुमने वेदों का और शास्त्रों का मंथन कर उसका सार अथवा योगरूप किले का भंजन अथवा
रसमय सुख का सुखसमुद्र ही मुझे उपदेश के रूप में प्रदान किया। तुम योगियों के योगीश्वर हो। तुम सारे
संसार के ईश्वर हो। तुम्हारा भाषण सत्य ही होगा लेकिन मुझे वह संदेहास्पद लगता है। तुमने ही पहले
अत्यन्त दयापूर्वक बताया था कि स्वधर्म का आचरण करना चाहिये और उसे सच मानकर मैंने उस पर
विश्वास कर लिया। जो स्वधर्माचरण करना है वही मेरा भजन है ऐसा तुमने बताया और अब अंत में उसे भी
छोड़ कर शरण में आने की बात करते हो। तो अब आत्मा कर्त्ता है या अकर्त्ता है यही समझ में नहीं आता।
हमें अब सब प्रकार के कर्म करने चाहिये या छोड़ देने चाहिये ? हे श्रीकृष्ण ! तुम्हारा उपदेश करने का ढंग
ही कुछ अव्यवस्थित है। इससे हम दुर्बल लोगों के मन में सन्देह अवश्य उत्पन्न हो जाता है। हे कृष्ण ! अब
क्या किया जाय ? आत्मा यदि अकर्त्ता है तो फिर कर्म का कर्त्ता कौन है ? और आत्मा यदि अकर्त्ता है तो फिर
त्याग की कोई सम्भावना ही नहीं है। उद्धव का यह प्रश्न सुनकर कमलनयन श्रीकृष्ण ने हंस कर क्या कहा
उसे ध्यानपूर्वक श्रवण करें।
श्रीभगवानुवाच
स एष जीवो विवरप्रसूतिः प्राणेन घोषेण गुहां प्रविष्टः।
मनोमयं सूक्ष्ममुपेत्य रूपं मात्रा स्वरो वर्ण इति स्थविष्ठ ॥ १७ ॥
भैया, उद्धव ! सुनो। मैं माया के स्वभाव के अनुसार ही जीवदशा में हूँ इसलिये जीव को जीवधर्म से ही
कर्तृत्व प्राप्त होता है। जल में सूर्य प्रतिबिम्बित होता है और वह प्रतिबिम्ब जब हिलता है तो सूर्य के हिलने का
आभास होता है। उसी प्रकार अकर्त्ता होते हुए भी जीव के अहंता स्वभाव से मैं कर्त्ता दिखायी देता हूँ। राजा निद्रा
के वश में कभी स्वप्न में भिखारी बन जाता है उसी प्रकार प्रकृति के कारण ही मुझमें जीवभाव प्रतीत होता है।
वास्तव में वह स्वयं राजा है लेकिन स्वप्न में वही अन्न की भीख माँगता है। उस समय जो कोई उसे मुट्ठीभर
अनाज देता है उसकी स्तुति करते हुए वह राजा कहता है, "अरे ! तुम राजा हो।" वास्तव में वह स्वयं ही राजा
है लेकिन उस समय उसे यह बात मालूम नहीं रहती। उसी प्रकार जीव की स्थिति रहती है। उसका अपना
पूर्णत्त्व उसकी ही समझ में नहीं आता। जिस प्रकार स्वप्न की अवस्था में राजा भिखारी हो जाता है, उसी प्रकार
अविद्या के कारण मैं कर्मकर्त्ता बन गया हूँ। ऐसी ही अवस्था में हमें वेदोक्त विधि विधान करना आवश्यक हो
जाता है। इसीलिये जब तक ब्रह्मज्ञान प्राप्त नहीं होता तब तक स्वधर्म का आचरण करना चाहिये। राजा जब तक
नींद से जग कर राजवैभव पर नहीं आता तब तक उसके हाथ से भिखारी का काम होता है। राजा जब जागृत
होकर राजपद पर आता है तो उसे 'भीक' शब्द कहने में लज्जा होने लगती है। उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान प्राप्त होने
पर वह 'मैं कर्त्ता' इन शब्दों का उच्चार कभी नहीं करता। राजा को जिस प्रकार झूठा भिखारीपन प्राप्त हुआ था
उसी प्रकार परमात्मा का जीवभाव भी मिथ्या है यह ध्यान में रखो। अब उस जीव को शरीर में संचार करना
पड़ता है उसका भी लक्षण सुनो। जीव जड़ को सजीव करता है इसलिये उसे 'जीव' कहा जाता है। सहज ही
उसके स्वभाव धर्म के अनुसार जीव को चैतन्य रूप प्राप्त होता है। गागर में दीपक रखने पर उसका प्रकाश गागर