श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 355, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंबारहवाँ अध्याय ३३९
प्रयत्न किया लेकिन उनके हाथों की गाँठ छूटती ही नहीं थी और उनकी साँस उनके देह में वापस लौट नहीं रही
थी। वे लाज-शर्म बिल्कुल भूल गयीं। ससुर, पति तथा पिता के सामने मेरे चरणों पर माथा रखकर जोर-जोर से
आक्रोश करने लगीं। उन्हें मेरे सिवा चारों ओर शून्य दिखायी देन लगा। वे बड़ी आशा से बार-बार मेरी ही राह
देखने लगीं और लम्बी साँस लेकर बिलख-बिलख कर रोते हुए कहने लगीं, ''यह दुष्ट हमारे प्रिय मित्र को ले
जा रहा है।'' अक्रूर को उसके ही सामने क्रूर कहने लगीं और अत्यन्त दीन होकर मेरे पास आयीं। मेरे सामने
खड़ी होकर उन्होंने मेरा सुन्दर मुख देखा, तभी उन्हें मेरे वियोग के दुःख का स्मरण हुआ और वे नीचे मुँह छिपा
कर विलाप करने लगीं। इतनी वे मुझ पर आसक्त हो गयी थीं। उन्होंने अपना हृदय अनन्य भाव से मुझे ही सौंप
रखा था। वे अपने सारे देहसुख भूल गयीं। मुझ पर उनका इतना अधिक प्रेम था। सचमुच ही उन्हें मेरे वियोग से
अत्यन्त दुःख हो रहा था। लेकिन उनके दुःख की अवस्था मैं शब्दों में नहीं व्यक्त कर सकता। मेरे सिवा जो
कुछ भी सुख था उसे वे गोपियाँ दुःख ही समझने लगीं। कितना अलौकिक था उनका मेरे प्रति प्रेम। वे अपने
अंतःकरण से मुझे निकाल ही नहीं पा रही थीं। मैं गोकुल में रहने आया तब से वे मुझ पर आसक्त हो गयी थीं।
उसी आसक्ति की साद्यंत कथा सुनो।
तास्ताः क्षपाः प्रेष्ठतमेन नीता मयैव वृन्दावनगोचरेण।
क्षणार्धवत्ताः पुनरङ्ग तासां हीना मया कल्पसमा बभूवुः ॥ ११॥
उन गोपियों का हर्ष कितना विस्मयकारी था। जरा देखो मुझे वृन्दावन जाते देख वे मेरा मुख देखकर
प्रातःकाल आनन्द का उपभोग करती थीं। दूसरे पहर मैं गौओं को पानी पिलाकर गोठों पर बिठाता था। वहाँ मुझे
देखने के लिये वे गोपियाँ पानी पीने के बहाने आती थीं। वहाँ नाना प्रकार के विनोद, अनेक प्रकार की लीलायें
तथा अनेक प्रकार के खेल खेलते समय तरह-तरह की मौज देखकर वे प्यारी गोपियाँ आनन्द से सुखी होती थीं।
शाम को मुझे गाँव में आते देख वे आरती और न्यौछावर लेकर मेरे सामने दौड़ी आती थीं और बड़ी प्रसन्नता से
मेरे चरणों पर मस्तक रखती थीं। इस प्रकार सुबह, दोपहर तथा सायंकाल मेरे दर्शन लेते हुए भी वे तृप्त नहीं
होती थीं। उससे भी परे एक अत्यन्त गुप्त तथा एकान्त में घटी एक बात है। उद्धव ! उस गुप्त बात का महत्त्व मैं
तुम्हें समझाऊँगा। वह महान सुख का भी सुखस्थान है। स्वयं श्रीकृष्ण होते हुए भी मैं उसमें नाचता रहा।
रासक्रीड़ा की रात हम सबको जिस सुख की प्राप्ति हुई, वह सुख या तो गोपियाँ ही जानती हैं या फिर मैं
श्रीकृष्ण। उस सुख की माधुरी बेचारी लक्ष्मी भी क्या जान पायेगी? ब्रह्मदेवादिदेव भी पागल हो गये किन्तु उस
सुख की माधुरी नहीं जान पाये। वह सुख प्राप्त करने के लिये शंकर ने योगाभ्यास किया फिर भी उसे उस सुख
की प्राप्ति नहीं हुई। मोहिनी को देखकर वह उस पर मोहित हो गया। पार्वती ने भीलनी का रूप लेकर शंकर को
वशीभूत किया। उस सुख की सुखकारी कथा हठयोगी और तपस्वी नहीं जानते। उद्धव ! महामूर्ति संकर्षण पास
में होते हुए भी उसे उस सुख की जरा भी प्राप्ति नहीं हुई। गोपियों के साथ जो यह रासक्रीड़ा हुई उसे कोई
कामासक्ति कहेगा लेकिन वहाँ काम की प्राप्ति कैसे हो? उद्धव ! ध्यान से सुनो। काम ने शंकर पर पूर्णतयः
विजय प्राप्त कर ली थी अतः वह कहने लगा, ''मैं बड़ा पराक्रमी हूँ।'' वह अपने धनुषबाण से सुसज्जित होकर
मेरी रासक्रीड़ा का भेद करने निकल पड़ा। लेकिन जहाँ मेरा स्वरूप ढाल बनकर सुरक्षा के लिये खड़ा हो वहाँ
काम का कोई प्रभाव नहीं होता। मेरे स्मरण की ढाल इतनी शक्तिशाली है कि मदन के बाण के टुकड़े-टुकड़े हो
गये। मदन की दृष्टि अत्यन्त चपल होती है। पराक्रमी मदन मौका देखकर कामीजनों को अपने प्रखर बाणों से