श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 356, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें३४० श्रीमद् एकनाथी भागवत
विद्ध करता है लेकिन वह कामबाणवृष्टि श्रीहरि के रंग में बिलकुल नहीं ठहर पाती। जहाँ मैं स्वयं आत्माराम
क्रीड़ा करता रहता हूँ वहाँ बेचारा काम कैसे प्रवेश कर पायेगा ? मेरी प्राप्ति की इच्छा से ही गोपियाँ कामरहित हो
गयीं। उनमें कामवासना ही शेष नहीं रही। जो भी कोई मेरे नाम का स्मरण करता है उसकी ओर काम देख भी
नहीं सकता। जिस स्थान पर मैं पुरुषोत्तम रमण करता हूँ, वहाँ कामकर्म का प्रवेश नहीं हो सकता। काम कहता
है, "हाय हाय ! भाग्यवान होते हुए भी मैं अभागा हो गया। रासक्रीड़ा के अन्तिम क्षण तक मैं अभागा पहुँच ही
नहीं सकता।" मौज की वह रासलीला देखकर काम घण्टों तक लार चाटता रह गया लेकिन उसका अंश भी
प्राप्त नहीं हुआ। इसलिये वह सुख प्राप्त करने के लिये उसने मेरे ही पेट से जन्म लिया। उस मदन को मैंने
अपने अंक में लिया और निजभाव से उसे आनन्दित किया। गोपियों ने मेरा ऐसा आत्मसुख रासक्रीड़ा के बहाने
भोगा। रासक्रीड़ा की वह रात मैंने छह महीने की (मानव के ३६०००० महायुगों जितनी) बनायी थी। जहाँ मेरे
ही क्रीड़ासुख की लहरें उछल रही थीं वहाँ काल और समय का स्मरण किसे रहता है? गोपियों का भाग्य
अत्यन्त बलवान था तभी मेरा शुद्ध सुख उन्हें प्राप्त हुआ। मेरी ऐसी संगति में उन्होंने कितनी रातें व्यतीत कीं
इसको कोई गिनती ही नहीं है। फिर भी उनकी तृप्ति नहीं हुई। मुझ पर उनका प्रेम बढ़ता ही चला गया। गोपियों
ने मेरी भक्ति कर मुझ श्रीकृष्ण को प्रसन्न कर लिया और मेरी सुखप्राप्ति के लिये एकान्त में रासक्रीड़ा माँगी। वे
गोपियाँ वेद के उदर की श्रुति थी यह जान लो। श्रुति के रूप में उन्हें मेरी प्राप्ति नहीं हुई इसलिये वे 'नेति नेति'
(यहाँ परमेश्वर की प्राप्ति नहीं होगी) कहते हुए वहाँ से लौट गयीं। मेरे सुख की संगति उन्हें वहाँ प्राप्त नहीं
हुई। विषयबुद्धि यही मुख्य अज्ञान है। वह होने पर मैं कभी भी नहीं प्राप्त होता इसे ध्यान में रखो। वेदोक्तविधि
का ज्ञाता होने पर भी मैं पूर्णरूप से नहीं मिलता। ज्ञान-अज्ञान दोनों निःशेष होने पर ही मेरा आत्मसुख प्राप्त होता
है। श्रुति ने यह बात निश्चित रूप से जान ली इसलिये वे सुख के लिये गोकुल में आयीं। वही सारी श्रुतियाँ
गोपियों के रूप में गोकुल में आयीं थीं यह जान लो और रासक्रीड़ा के बहाने वे एकान्त में मेरी सुखप्राप्ति का
उपभोग करने लगीं। उद्धव ! इन बातों को भी एक ओर रहने दो। जिसकी जैसी भावना रहती है उसके लिये मैं
वैसा ही देवता बना रहता हूँ इसमें जरा भी सन्देह नहीं है। हे उद्धव! मैं भक्तों से किसी भी समय विन्मुख नहीं
होता। जो भक्त जैसी भावना रखता है उसके अनुसार मैं फलद्रूप होता हूँ। मैं लोगों से सन्मुख रहता हूँ लेकिन वे
ही मुझसे विन्मुख हो जाते हैं। इसका कोई इलाज नहीं है। वे जानबूझ कर दुःख भोगते हैं। मैं सकाम के लिये
संकाम रहता हूँ और निष्काम के लिये निष्काम बन जाता हूँ। नास्तिक के लिये तो मैं तीनों लोकों में होते हुए भी
नास्तिकता के कारण नहीं रहता हूँ। अस्तु ! इस उपपत्ति का कितना वर्णन करूँ? सुनो ! गोपियों को मेरे प्रति प्रेम
था इसलिये उन्होंने मेरी संगति में जितनी रातें भोगीं उन्हें उन्होंने निमिषार्ध की तरह माना। लेकिन उन्हें प्राकृतिक
रूप से जो रात्रियाँ उपलब्ध हुई थीं उन्हें वे अपने पति के सान्निध्य के होते हुए भी मेरे वियोग के कारण कल्प के
समान बड़ी लगने लगीं। उनके उस दुःख की स्थिति को शब्दों में बताना कठिन है। मेरे वियोग में मेरा स्मरण
करते हुए वे समाधिस्थ हो गयीं।
ता नाविदन् मय्यनुषङ्गबद्धधियः स्वमात्मानमदस्तथेदम्।
यथा समाधौ मुनयोऽब्धितोये नद्यः प्रविष्टा इव नामरूपे ॥ १२ ॥
मैं गोकुल में था तभी से वे गोपियाँ मेरे प्रति आसक्त हो गयी थीं यह पूरी कथा मैंने तुम्हें यथातथ्य रीति से
सुनायी। उन गोपियों को जब मैं अत्यन्त निष्ठुर होकर कृतघ्न की तरह छोड़कर जा रहा था उस समय मेरे वियोग