श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
बल पर ही मेरे पद तक पहुँच गयीं। मेरी मुरली का स्वर सुनकर गोपियाँ सारा काम-काज छोड़ अपनी देह का
भी ख्याल किये बिना मुझे ढूँढ़ते मेरे पास आयीं। पति और पिता के प्रेम की चिन्ता न कर अथवा वेद और शास्त्र
की परवाह न कर उन्होंने मेरे प्रति ही भक्ति प्रकट की। गोपियों को मेरा प्रेम अत्यन्त प्रिय था। एक ही घाव से
पुत्रस्नेह का त्याग कर विधि को पैरों तले कुचल कर गोपियों ने मेरे प्रेम के लिये मुझे त्वरित प्राप्त कर लिया।
उसी प्रकार गायें भी मुरली के स्वर में बेहोश हो गयीं। मेरी मुरली के स्वर में तल्लीन होने के कारण बछड़े
स्तनपान करना भूल गये। वे मेरे ध्यान में इतने तल्लीन थे मुँह का ग्रास मुँह में ही रह गया। मेरी मुरली का नाद
सुनकर बाघ, हिरन भी परस्पर बैरभाव भूलकर एक-दूसरे के शरीर पर गर्दन टेक कर मुरली के नाद में तल्लीन
हो गये। मैंने जिन यमलार्जुन (वृक्ष) को उखाड़ा वे भी यदि तर गये तो इसमें आश्चर्य कैसा? लेकिन वृन्दावन
के वृक्ष, तृण आदि भी मेरे साहचर्य से तर गये इसे ध्यान में रखो। मैंने मोर के पंख धारण करने के कारण मोर
भी तर गये। वृन्दावन में स्थित छोटे वृक्ष, बेलें, तृण, पाषाण आदि जड़ और मूढ़ वस्तुओं का भी मेरे सान्निध्य से
उद्धार हुआ। मेरी संगति में अनन्य प्रीति होना यही उनकी शुद्ध भक्ति है। इसीलिये सचमुच कृतकृत्य होकर वे
मुझ तक पहुँच पाये। अत्यन्त दुराचारी कालिया सर्प का भी मेरे पैरों के प्रहार के कारण उद्धार हुआ। अन्य नाग,
नागिनें आदि समस्त सर्प परिवार का मेरे कारण उद्धार हुआ। अपनी जो निजप्राप्ति है, वह सचमुच मेरी संगति के
बिना दुर्लभ है। श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं।
यं न योगेन सांख्येन दानव्रततपोऽध्वरैः।
व्याख्यास्वाध्यायसंन्यासैः प्राप्नुयाद् यत्नवानपि ॥ ९॥
योग, याग, व्रत, दान, वेदाध्ययन, तप, तीर्थ, ध्यान, भक्तिभाव से संन्यास ग्रहण करना आदि जो अनेक
साधन हैं, उनका निष्ठापूर्वक पालन करने पर भी यदि मन में दुराशा है तो कितना भी प्रयत्न करने पर भी वह
प्राप्त नहीं होते। इस प्रकार के साधन कर थक जाने पर भी मेरी प्राप्ति नहीं हो पाती। लेकिन गोपियों ने सत्संग
के कारण मुझे अनायास ही प्राप्त कर लिया। उन गोपियों के मन में मेरे प्रति अत्यन्त प्रेम था और मेरी संगति
यही उनकी सत्संगति थी। सचमुच सत्संगति से ही आत्मपद की प्राप्ति होती है। गोपियों की प्यार में कैसी
अवस्था थी इसका अनुभव तुम्हें गोकुल में हो ही चुका है। लेकिन उनकी प्रीति कैसी थी इसका तुम तर्क भी
नहीं कर सकते। वह मैं तुम्हें बताऊँगा। गोपियों के असीम प्रेम का वर्णन श्रीकृष्ण अपने ही मुख से करने लगे।
उद्धव का भाग्य कितना महान था कि भगवान गोपियों के प्रेम का रहस्य बताने लगे।
रामेण सार्धं मधुरां प्रणीते श्वाफल्किना मय्यनुरक्तचित्ताः।
विगाढभावेन न मे वियोगतीव्राधयोऽन्यं ददृशुः सुखाय ॥ १०॥
अक्रूर सचमुच मुझे बलराम के साथ मथुरा ले गया उस समय गोपियों को जो दुःख हुआ उसका मैं वर्णन
भी नहीं कर सकता। उनकी उस अवस्था का वर्णन करते हुए अभी भी मेरा संयम टूट जाता है। यह कहते समय
भी भगवान का गला भर आया। भक्तों के सच्चे प्रेम का वर्णन करते समय श्रीकृष्ण प्रेम से पसीज उठे क्योंकि जो
भक्तिकामना का कल्पतरु है ऐसे श्रीकृष्ण को भक्तों की करुणा निरुपम थी। मुझे मथुरा जाते देख उनकी आँखों
से अश्रुधाराएँ फूट पड़ीं। मेरे लिये उनका हृदय भर आया और वे जमीन पर लोटने लगीं। उनके अंतःकरण का
प्रेम अत्यन्त उत्कट था इसलिये मेरे प्रयत्न करने पर भी वे पीछे नहीं हटीं। मेरे पैर नहीं छोड़ रही थीं। मेरे लिये
व्याकुल हो रही थीं। उनके हृदय की भक्ति अपूर्व थी। उन्होंने मेरे रूप को आलिंगन किया, मैंने उसे छुड़ाने का