ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 942, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ें—:श्रीगुरुका प्रसाद-दान ग्रंथ लेखनका स्थान काल:—
ऐसे यह कलियुगमें । है महाराष्ट्रमंडलमें ।
गोदावरीके किनारेमें । दक्षिणका जो ॥ १ ॥
या त्रिभुवनैक पवित्र । अनादि पंचक्रोश क्षेत्र ।
जगका जहां जीव-सूत्र । है महालया ॥ २ ॥
वहां यदुवंश विलास । जो सकलकलानिवास ।
न्यायसे पोसता क्षितीश । श्रीरामचंद्र ॥ ३ ॥
वहां महेशान्वय संभूत । है जो श्रीनिवृत्तनाथ सुत ।
गाया ज्ञानदेव ये गीत । देशीका भूषण ॥ ४ ॥
एवं श्रीभारतकी गोदमें । प्रसिद्ध भीष्मनाम पर्वमें ।
श्रीकृष्णार्जुनने वैभवमें । गोष्टि जो की है ॥ ५ ॥
उपनिषदका है सार । सब शास्त्रोंका मातृ-घर ।
परम-हंस सरोवर । करते सेवन ॥ ६ ॥
उस गीताका यह कलश । संपूर्ण हुवा है अष्टादश ।
कहता श्रीनिवृत्तिका दास । ज्ञान देव ॥ ७ ॥
पुनः पुनः आगे भी इससे । इस ग्रंथ पुष्प-संपत्तिसे ।
सर्वभूत सर्वतोमुखसे । होना है संपूर्ण ॥ ८ ॥
श्रीशक बारह शत बारा । टीका बोला यह ज्ञानेश्वर ।
सच्चिदानंद बाबा सादर । हुवा लिपिक ॥ ९ ॥
ॐ
ज्ञानेश्वरी ५७१