सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 943, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 943

महाराष्ट्रके दूसरे एक महान संत श्री एकनाथ महाराजने ज्ञानेश्वरी ग्रंथका
संशोधन करके इस ग्रंथके विषयमें निम्न अभिप्राय लिख रखा है ।
श्रीशक पंद्रह सौ छ उत्तर । आया तारण नाम संवत्सर ।
एका जनार्दनने अत्यादर । की ज्ञानेश्वरी प्रति शुद्ध ॥ १ ॥
पहले ही था ग्रंथ अति शुद्ध । पाठांतरसे था शुद्ध अबद्ध ।
शोधित कर वह एवं बिध । शुद्ध सिद्ध प्रति ज्ञानेश्वरी ॥ २ ॥
नमो ज्ञानेश्वर निष्कलंक । पढके उनके गीता टीका ।
ज्ञानी होंगे जो ग्रंथार्थि लोक । भाविक अत्यंत ॥ ३ ॥
बहुकाल पर्वणी गोमटी । भाद्रपदकी कपिला षष्ठी ।
प्रतिष्ठानमें है गोदा तटी । लेखन संपूर्ण ॥ ४ ॥
ज्ञानेश्वर - स्तुति - सुमन
सत - नामदेव
ज्ञानराज मेरी योगियोंकी माय । उनसे प्रकट हुवा निगमकाय ॥ १ ॥
गीता अलंकार नाम ज्ञानेश्वरी । प्रकट गई है ब्रह्मानंदलहरी ॥ २ ॥
अध्यात्म - विद्याका दिखाया है रूप । उजला दिया है चैतन्य - महादीप ॥ ३ ॥
देशी भाषाओंका किया है गौरव । छोड दी उसने भावार्णवमें नाव ॥ ४ ॥
श्रवण निमित्त बैठना आकर । स्वानंद पीठपे सुखसे निरंतर ॥ ५ ॥
नामा कहे श्रेष्ठ ग्रंथ ज्ञानेश्वरी । प्रतीत करो जी चितमें एक ओवी ॥ ६ ॥
८७१ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग