ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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कल्पतरुके हो चलते उपवन । गांव हो चैतन्य चिंतामणिके खान ।
सतत अमृत-सिंधु सम वचन । मिले परस्पर ॥ ९७ ॥
चंद्रमा हो यहां अलांछन । तथा मार्तंड हो ताप हीन ।
सदा प्रिय हो सभी सज्जन । सबसे आप्त ॥ ९८ ॥
अथवा पाये सभी सुख । पूर्ण होकर तीनो लोक ।
और भजे आदि पुरुष । अखंडित ॥ ९९ ॥
तथा है इस लोकमें जिसे । यह ग्रंथही जीवन उसे ।
पाये पूर्ण विजय इससे । दृष्ट अदृष्ट पर ॥ १८०० ॥
तब कहे श्रीगुरु महान । मिलेगा यह प्रसाद-दान ।
इससे सुखी मनही मन । हुवा ज्ञानदेव ॥ १ ॥
गीता श्लोक ७८
ओवी १८०१
ज्ञानेश्वरी संपूर्ण
ॐ
८६९ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग