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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 938

पीडितोंकी करुणाके कारण । वर्षा हुई शांत रसकी मान ।
तभी है यह गीतार्थ प्रथन । हुवा उससे ॥ ६१ ॥
मैं केवल निमित्त मात्र हूं—
इतनेमें मैं आर्त चातक । स्वेच्छासे हुवा गुरु सम्मुख ।
बना यशका कारण एक । इस प्रकार ॥ ६२ ॥
ऐसे है गुरु परंपरागत । अपना समाधि-धन जो प्राप्त ।
दिया रचकर यह ग्रंथ । स्वामीने मुझे ॥ ६३ ॥
वैसे मैं हूं अपढ अशिक्षित । नहीं की स्वामी-सेवा अपेक्षित ।
कैसे हुवा रचनामें समर्थ । ऐसे ग्रंथके ॥ ६४ ॥
किंतु है सच ही श्रीगुरुनाथ । बनाके मुझे इसका निमित्त ।
ग्रंथ-रूपसे करते हैं हित । विश्वका चिरंतन ॥ ६५ ॥
फिर भी मैंने पुरोहित बन । किया हो कम अधिक कथन ।
मातृ-भावसे आप संत जन । सहन करें मुझे ॥ ६६ ॥
कैसे करना शब्दका वचन । या चढ़ते प्रमेयोंका व्याख्यान ।
नहीं मुझे इसका भी ज्ञान । अलंकार क्या है ? ॥ ६७ ॥
श्रीगुरुकी मैं कठपुतली । जैसे वे चलाते वैसे चली ।
मुझे आगे कर स्वयं ही बोली । गुरु-माता मेरी ॥ ६८ ॥
इसलिये मैं कोई गुण-दोष । विषयमें क्षमा बिना विशेष ।
आचार्य-संजात ग्रंथ अशेष । कहता हूं मैं ॥ ६९ ॥
यदि इसमें कोई न्यूनता रही तो इसका दायित्व आप पर है—
तथा आप संत समाजमें । यदि न्यून रहा हो इसमें ।
वह मिटा नहीं तो स्नेहमें । रूठेंगे आपसे ॥ १७७० ॥
होने पर भी पारसका स्पर्श । न मिटिती लोहेकी हीन दशा ।
तब इसका किसका है दोष । कहें आप ही ॥ ७१ ॥
नालेको यही करना । गंगा में जाके डूबना ।
फिर भी गंगा न बना । दोषि किसका ॥ ७२ ॥
ज्ञानेश्वरी ८६६