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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 939

इसलिये मैं अति भाग्यसे । आया संतोंके पगमें ऐसे ।
तमी विश्वमें मुझे इससे । खामी है किसकी ॥ ७३ ॥
जीवन कृतार्थ हुवा है आज—
अजी ! मेरे स्वामी नाथ । मुझे जोड दिये संत ।
हुवा सबमें कृतार्थ । इससे आज ॥ ७४ ॥
आपके साथ रहकर । फूटे मुझमें सुखांकुर ।
तथा ग्रंथका हठ पूरा । हुवा आज ॥ ७५ ॥
अजी ! अब कनकसे अखिल । ढाल सकेंगे यह भूमंडल ।
चिंता रत्नोंसे सप्त-कुलाचल । कर सकेंगे निर्माण ॥ ७६ ॥
अजी ! जो सागर सात । उनमें भरना अमृत ।
होगी तारोंसे तारानाथ । रचना सहज ॥ ७७ ॥
तथा कल्पतरुका आराम । लगाना नहीं विषम ।
किंतु है गीतार्थ मर्म । न होगा स्पष्ट ॥ ७८ ॥
एक मैं ऐसा सर्व-मूक । बोल करके देशी भाषा ।
आंखोंसे ही ले सके लोक । ऐसा करता हूं ॥ ७९ ॥
इतना बड़ा ग्रंथ सागर । उतार ले जाना पैलतीर ।
फड़काना यश-ध्वज फिर । वहां पहुंचनेका ॥ १७८० ॥
गीतार्थका बनाकर भवन । कलशका मेरू गिरि महान ।
उसमें मैं गुरुलिंग पूजन । करता हूं यह ॥ ८१ ॥
गीता है जो निष्कपट माता । उसे भूल शिशु भटकता ।
उसका यह मिलन होता । आपके पुण्यसे ॥ ८२ ॥
आप संतोंने जो कुछ दिया । वही सब मैं बोलता भया ।
यह वैसे अल्प कहा जाय । कहता ज्ञानदेव ॥ ८३ ॥
क्या बोलूं मैं अब बोल । पा लिया मैंने सब जन्म-फल ।
ग्रंथ-सिद्धिका यह जो निर्मल । देखा समारोह ॥ ८४ ॥
८६७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग