ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 937, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंवैसे अध्यात्म शास्त्रमें निपुण । अंतरंगके अधिकारी जान ।
किंतु वाक्चातुर्यसे सभी जन । पाएंगे सुख ॥ ४९ ॥
वैसे श्रीनिवृत्तिनाथका । महान गौरव है नीका ।
ग्रंथ नहीं यह उनका । कृपा-गौरव ॥ १७५० ॥
इस ज्ञानकी आदि परंपरा—
क्षीरसागरका परिसर । माता शक्तिका कर्ण कुहर ।
बोला त्रिपुरारी श्रीशंकर । न जाने कब ॥ ५१ ॥
क्षीर कलोलमें रत । मकरोदरमें गुप्त ।
था यह उसके हाथ । आया सहज ॥ ५२ ॥
वह श्रीमत्स्येंद्र सप्त-शृंगपर । भग्न तन चौरंगीसे मिलकर ।
कृपासे किया उसको सशरीर । पूर्णांग पूर्ण ॥ ५३ ॥
फिर अखंड समाधि भोगना । उनको होनेसे यह वासना ।
दिया श्रीगोरक्षनाथको दान । वह मुद्रा ॥ ५४ ॥
उन्होंने योगाब्जिनी सरोवर । विषय विध्वंस एकैक्य वीर ।
उस पदमें वह सर्वेश्वर । किया अभिषेक ॥ ५५ ॥
फिर वह जो शांभव । अद्वयानंद वैभव ।
प्राप्त किया स-प्रभव । 'श्रीगहनीनाथने ॥ ५६ ॥
फिर वह कलिकाल ग्रस्त । भूतमात्रका करने हित ।
आज्ञा दी जो निवृत्तिनाथ । इस भांति ॥ ५७ ॥
यह जो आदि गुरु शंकर । से चला शिष्य-परंपरा ।
बोध लाभ आया है संसार । हम तक जो ॥ ५८ ॥
वह सब लेकर तू संपूर्ण । कलिसे ग्रस्त जीवोंका जीवन ।
संकटसे करने विमोचन । सहाय कर तू सत्वर ॥ ५९ ॥
पहले ही वह अति कृपालु । फिर है श्रीगुरु आज्ञाका बोल ।
मिला जैसे सहज वर्षाकाल । मेघोंको नित ॥ १७६० ॥
८६५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग
(94)