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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 936

किंतु देशी बोलमें रंगकर । जान लेंगे गीता-पद मधुर ।
न होगा मूल न जानकर । एक पक्षीय ॥ ३६ ॥
और कहेंगे यदि मूल गा कर । बनेगा वह मूलका अलंकार ।
वैसे आएगा देशीमें भी सुंदर । गीतार्थ पूर्ण ॥ ३७ ॥
चार्वांगी पर न चढे भूषण । फिर भी वह शोभती जान ।
सुंदर तनुका बना भूषण । वह अति योग्य ॥ ३८ ॥
या मोतियोंकी ऐसी जाति । सुवर्णमें भी लाती कांति ।
या अपने रूपमें अति । सजते आप ॥ ३९ ॥
या मोतिया वसंतागमनका । खुला हो या गूंथा हुवा हो उसका ।
एकसा परिमल होता जिसका । उसी प्रकार ॥ १७४० ॥
मूल सहित भी जो है सजता । उसके बिना भी जो है शोभा लाता ।
रचा मैंने ऐसा लाभद गाथा । ओवी छंदमें ॥ ४१ ॥
इसमें अबाल सुबोध । ओवीके छंदमें प्रबंध ।
ब्रह्म-रसमें हैं सुस्वाद । गूंथे हैं अक्षर ॥ ४२ ॥
कभी चंदनका तरुवर । सुगंधके लिये फूलकर ।
फलने तक लगाके देर । बैठना पड़ता क्या ॥ ४३ ॥
यह प्रबंध जो सुनता । तत्क्षण समाधिमें जाता ।
कान व्यसन ही लगाता । व्याख्यान सुननेका ॥ ४४ ॥
तथा पाठ करनेसे नित्य । आता है पाठकमें पांडित्य ।
अनुभवनेसे है लालित्य । भूलेगा अमृत ॥ ४५ ॥
कवित्व हुवा ऐसे यह सरल । विश्रांति स्थान हुवा सुख-महल ।
श्रवण मननसे ध्यान निर्मल । जीतेगा यह ॥ ४६ ॥
स्वानंद भोग यह बढिया । देगा किसीको भी हो सदया ।
पोषित होंगी सभी इंद्रियां । सुनने केवल ॥ ४७ ॥
चंद्रामृत करके स्वाधीन । भोगता चकोर बुद्धिमान ।
किंतु पाते हैं चंद्र किरण । सभी लोग ॥ ४८ ॥
ज्ञानेश्वरी ८६४