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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 935

जिसके अंगका अंश भर । तेज लेकर ही जो भास्कर ।
करता है विपत्तियां दूर । अंधारकी ॥ २४ ॥
समुद्रको जिसका तोय । तोयको जिसका माधुर्य ।
माधुर्यमें जो है सौंदर्य । उससे ही ॥ २५ ॥
पवनको जिसका बल । जिससे आकाश विशाल ।
तथा ज्ञान भी उज्ज्वल । उससे सार्वभौम ॥ २६ ॥
जिससे हैं वेद सुभाष । सुख है जिससे सोल्हास ।
रहने दे जो है रूपस । विश्व उससेही ॥ २७ ॥
सर्वोपकारी वह समर्थ । सद्गुरु है श्रीनिवृत्तिनाथ ।
बैठ कर मुझमें ही स्थित । है निरंतर ॥ २८ ॥
उसी श्रीगुरुसे है गीता-ज्ञान । मिला मुझे किसी श्रम बिन ।
करना देशीमें वह कथन । इसमें क्या आश्चर्य ॥ २९ ॥
श्रीगुरूके नामसे मृत्तिका- । मूर्ति रख वनमें विद्याका ।
टेव कर डंका श्रेष्ठताका । बताया भिल्लने ॥ १७३० ॥
जो चंदनसे वेष्टित । होते चंदनसे सुगंधित ।
वसिष्ठकी काठी प्रकाशित । हुई सूर्यसी स्पर्धासे ॥ ३१ ॥
और मैं हूं यहां चित्त संपन्न । कृपा-दृष्टिसे होता पदासीन ।
ऐसा श्रीगुरु है सामर्थ्यवान । सिरपे मेरे ॥ ३२ ॥
सहज ही है जो स्वच्छ दृष्टि । उसे मिलती सूर्यकी पुष्टि ।
वह न देखता ऐसी गोष्टि । क्या है विश्वमें ॥ ३३ ॥
इसीलिये है मेरे नित्य-नूतन । श्वासोच्छ्वास करते काव्य कथन ।
गुरुकृपासे सभी संभव जान । कहता ज्ञानदेव ॥ ३४ ॥
ज्ञानेश्वरी ग्रंथके विषयमें—
लाया मैं इसी कारण । गीतार्थ देशीमें जान ।
किया है इसका जन- । दृष्टिका विषय ॥ ३५ ॥
८६३ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद-योग-