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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 934

पंखेरू फूटा हुवा पर । न उड़ता नभमें स्थिर ।
गगनाक्रमी जो सत्वर । गरुडमी वहीँ ॥ १२ ॥
राजहंसका चलना । पृथ्वीपे उत्तम माना ।
तो क्या औरोंका चलना । मानना क्या वर्ज ॥ १३ ॥
अजी ! अपनेमें लेकर आकाश । जल भरलेता बहुत कलश ।
कुल्लेमें होता है अल्पसा आकाश । आता न उतना पानी ? ॥ १४ ॥
मशालका आकार विशेष । देता वह बहुत प्रकाश ।
बाति भी अपना-सा तेजस । देती है न ? ॥ १५ ॥
अजी ! समुद्रका विस्तार है जैसा । उसमें आकाश आभास वैसा ।
छोटेसे डबरेमें पड़ता वैसा । बिंब भी छोटा ॥ १६ ॥
जैसे व्यासादिककी महामती । इस ग्रंथको बखानने आती ।
हमने भी मानके यही युक्ति । कही अपनी भी ॥ १७ ॥
सागरमें जहां जलचर । संचरते हैं पर्वताकार ।
वहां जानता हूं मैं शफर । तरना जानता ॥ १८ ॥
पास ही रहकर अरुण । करता है सूर्यका दर्शन ।
तब भूतलकी चींटी जान । न देखता क्या सूर्य ॥ १९ ॥
इसीलिये हम हैं प्राकृत । देशी आकारमें लाते गीता ।
यह करना है अनुचित । कैसे भला ॥ १७२० ॥
बाप जहां आगे चलता । पुत्र ही वही अनुगमता ।
पुत्र वहां न पहुंचता । नहीं कोई कारण ॥ २१ ॥
वैसे व्यासका कर अनुकार । भाष्यकारोंसे राह पूछ कर ।
अयोग्य वहां न पहुंचकर । जाऊंगा कहां मैं ॥ २२ ॥
श्रीगुरु निवृत्तिनाथकी महिमा—
तथा पृथ्वी है जिसकी क्षमा । न ऊबती स्थावर जंगमा ।
जिसके अमृतसे चंद्रमा । देता विश्वको शांति ॥ २३ ॥
ज्ञानेश्वरी ८६२