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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 732

वहां असि-पत्रके तरुवर । पलते अंगारके डोंगर ।
तपे हुए तेलके सागर । उछलते हैं ॥ ७३ ॥
यातनाके जो नित नये प्रकार । समझानेके वहां यही आधार ।
मिलते हैं जो सदैव भयंकर । नरक-लोकमें ॥ ७४ ॥
ऐसे नरकके लिये भयंकर । जनम लिये जो लेके अधिकार ।
करते हैं वे भ्रममे पड़कर । यज्ञ याग ॥ ७५ ॥
वैसे यज्ञादिककी है जो क्रिया । देती अपना फल धनंजय ।
किंतु नाटकका-सा स्वांग लिया । पाया कुफल ॥ ७६ ॥
पतिका करके जो आश्रय । प्रियकरकी होकर प्रिय ।
मनमें मानती धनंजय । सौभाग्यवती आप ॥ ७७ ॥
आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।
यजंते नामयज्ञैस्ते दंभेनाविधिपूर्वकम् ॥ १७ ॥
उपहार लूटनेके लिये यज्ञ करते हैं—
अपने आपको मन ही मन । पूजके अपना महंतपन ।
फूलता जाता है असाधारण । अहंमन्यतामें ॥ ७८ ॥
नहीं जानते झुकना कैसे । लोहेके ढले हुये स्तंभ जैसे ।
या गगन-चुंबी शिखर जैसे । खडे हैं पाषाणके ॥ ७९ ॥
अपनी ही सज्जनतासे आप । मनमें ही संतुष्ट हो अमाप ।
तिनकासा मानते परंतप । सारे विश्वको ॥ ३८० ॥
धनकी मदिरा फिर । पीनेसे मस्त हो कर ।
कृत्याकृत्य भूलकर । सबसे होते भिन्न ॥ ८१ ॥
जहां जुटी संपदा इस भांति । वहां यज्ञकी बात कैसे आती ।
किंतु पगलेको क्या न सूझती । किस समय ॥ ८२ ॥
स्वयं-पूजित गर्विष्ठ मदांध धन-मानमें ।
नामके करते यज्ञ दंभसे अन्यवस्थित ॥ १७ ॥
ज्ञानेश्वरी ३६०