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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 729

जाल पाश तीर कुकर । भाला बाज छुरा लेकर ।
चला मानो चिडियामार । शिकार करने ॥ ४५ ॥
पालनेके लिये एक पेट । चिडियों पर ढाते संकट ।
ऐसा ही आचरण निकृष्ट । करते ये लोग ॥ ४६ ॥
कर पर-प्राण घात । कमाकर लाते वित्त ।
उससे हो कैसे चित्त । संतुष्ट किसका ॥ ४७ ॥
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥ १३ ॥
भोगार्थ असीम आशा और वैर—
कहता है आज अर्जुन । कर लिया सबका धन ।
सहज अपने स्वाधीन । धन्य हूं मैं ॥ ४८ ॥
आत्म-श्लाघा भाव यह उत्पन्न । होनेसे बहता उसका मन ।
लूटूंगा कल औरोंका भी धन । कहता ऐसे ॥ ४९ ॥
ऐसे यह जुटाया मैने इतना । इसका आधार बनाके अपना ।
लाभमें पाऊंगा रही सही नाना । संपदा विश्वकी ॥ ३५० ॥
ऐसा विश्वका सब धन । करूंगा अपने स्वाधीन ।
फिर जिसके हो नयन । मिटा दूंगा ॥ ५१ ॥
असौ मया हतः शत्रुईनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥ १४ ॥
मारे मैंने शत्रु जो कुछ । मारूंगा कल बचे जो तुच्छ ।
करूंगा शासन बन उच्च । अकेला ही मैं ॥ ५२ ॥
जुटाये आज ये लाभ जुटेंगे और भी कल ।
यह है वह भी होगा मेरी ही सब संपदा ॥ १३ ॥
मैने वह शत्रु मारा मारूंगा दूसरा फिर ।
स्वामी मैं और मैं भोक्ता सुखी मैं सिद्ध मैं बली ॥ १४ ॥
(31) ६५७ देवासुर-संपद्विभाग-योग