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सर्वकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 730

बनके रहेंगे यदि मेरे दास । नहीं तो करूंगा मैं उनका नाश ।
अथवा मानो विश्वमें मैं हूं ईश । चराचरका सब ॥ ५३ ॥
इस भोग-भूमिका मैं प्रधान । सब सुख-भोगका मैं हूं स्थान ।
इंद्र भी देखके मनही मन । करेगा ईर्षा ॥ ५४ ॥
चाहूंगा मैं काया वाचा मन । होगा वह निश्चित संपन्न ।
मेरे बिना नहीं कोई जान । ऐसा आज्ञा-सिद्ध ॥ ५५ ॥
न देखा जब तक मेरा बल । तब तक बली है वह काल ।
मैं हूं सुखका सदन निश्चल । एक ही एक ॥ ५६ ॥
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥ १५ ॥
आसुरी लोगोंके अभिमानका रूप —
होगा कुबेर महा संपन्न । किंतु नहीं है मेरे समान ।
संपन्नतामें मेरे समान । लक्ष्मीपति भी नहीं ॥ ५७ ॥
मेरे कुलकी उज्ज्वलता । जाति-गोतमें जो श्रेष्ठता ।
उसके सन्मुख अल्पता । दीखती ब्रह्माकी भी ॥ ५८ ॥
अपनी बढाई वे इस प्रकार । ईश्वरादिको भी व्यर्थ मानकर ।
अपनेको सर्व-श्रेष्ठ बताकर । करते रहते हैं ॥ ५९ ॥
लोप हुवा अब अभिचार । करूंगा उसका जीर्णोद्धार ।
प्रतिष्ठा करूंगा पर-मार । यज्ञकी अब ॥ ३६० ॥
मेरे गुण-गीत जो गायेंगे । नाट्यादिसे मुझे रिझायेंगे ।
जो मांगेंगे उसे वह देंगे । सभी वस्तु ॥ ६१ ॥
मादक अन्न पेय पानमें । प्रमदाओंके आलिंगनमें ।
बनूंगा मैं तीनों भुवनमें । आनंद-रूप ॥ ६२ ॥
मैं हूं कुलीन संपन्न कौन है मुझसा कहां ।
यज्ञ-दान-विलासी मैं मानते अज्ञ मोहसे ॥ १५ ॥
ज्ञानेश्वरी १५८